बस्तर की पीड़ा

मैं बस्तर की मिट्टी हमेशा सबके लिए अनमोल रही हूँ। वनों से आच्छादित मैं हवाओं में सांसें घोल रही हूँ। ना जाने कितने दर्द सहे मैंने पर आज बोल रही…
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“छत्तीसगढ़ी कविताओं में वसंत”

कल से लेकर आज तक : “छत्तीसगढ़ी कविताओं में वसंत” भारतवर्ष में तीन मुख्य ऋतुएँ ग्रीष्म, वर्षा और शीत होती हैं। चार उप-ऋतुएँ भी होती हैं – शरद, हेमन्त, शिशिर…
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कविता “तुरते-ताही”- डॉ.अनिल भतपहरी

बोहाय ल तर-तर आँसू अउ सुसके ल फुलुक-फुलुक कछुच बुता हर नइ बनय अब तो चढ़ के छाती मं बैरी के जीभ सुरर इही हर चोखा हरय करेन घाद चिरौरी…
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*पिंवरी पहिर सरसों झूमे* – डॉ.पीसी लाल यादव

*पिंवरी पहिर सरसों झूमे*   पिंवरी पहिर सरसों झूमे। तितली भौंरा मया म चूमे।।     अरसी ह बांधे अईंठी मुरेरी पागा।   बटरा तिंवरा ढिले, पिरीत के तागा।।  …
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छत्तीसगढ़ी कविता – जुन्ना फसल ल नवा करा

  **जुन्ना फसल ल नवा करा**   कोदो दिखय न राहेर संगी,  न तिवरा, उरीद ओन्हारी।  अरसी भर्री खार न दिखय,  न बर्रे, कुसयार बारी।।    पल्टू परेवा धान नंदागे, …
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