जन्म से लेकर मरत तक घुस देवत म जिन्दगी पहा जाथे

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जन्म से लेकर मरत तक घुस देवत म जिन्दगी पहा जाथे

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हमर देश ह अंग्रेज मन के 200 साल तक गुलाम रहिस हावय, लेकिन ओ समय म नियम कानून कायदा डर भैय रिती रिवाज तको हर अति रहिस हावय। कोनो कुछु करतीस त सोचे बर तको पड़य सन 1947 15 अगस्त के दिन हमर भारत देश आजाद होगे तेकर बाद म…

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आज के संदर्भ में ‘गुरुपूर्णिमा’ का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि दुनिया भौतिकता के पीछे पागलों की तरह दौड़ रही है। ‘आध्यात्मिकता’ से पलायन ही ‘भौतिकता’ की शुरूआत होती है और यह भी सर्वविदित है कि भौतिकता आपको सुख तो दे सकती है, स्थाई आनंद नहीं। स्थाई आनंद…

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हमर देश ह अंग्रेज मन के 200 साल तक गुलाम रहिस हावय, लेकिन ओ समय म नियम कानून कायदा डर भैय रिती रिवाज तको हर अति रहिस हावय। कोनो कुछु करतीस त सोचे बर तको पड़य सन 1947 15 अगस्त के दिन हमर भारत देश आजाद होगे तेकर बाद म हमर देश हर कतका कन मुसिबत दुख: परसानी ल लड़के अपन पैर म खड़ा होईस अउ हमर देश ल सोन के चिराई कहे लागिस, काबर कि पुरा भारत देश के निवासी मन ज्यादा गांव म रहिथे अउ अपन तन मन धन लगाके खेती काम ल करके अपन देश गांव राज ल गांव ल खुशहाल बनात रहिस। समय बीते लागिस अउ बदले लागिस रहन सहन खान पान चारो तरफ लुटमार ठगी धोखा घड़ी शुरू होगे।

समय बदले लागिस कलयुग हर अपन असर ल देखाये लागिस हावय जब हमर माई लोगन मन पेट म रहिथे त दवाई गोली खाथे और तीर के अस्पताल म देखाये बर जाथे त नर्स डॉ. मन ओला जाच्थे त पैसा मागथे काबर की तोर घर म नवा पहुना आवत हावय काई के सरकारी अस्पताल म थोड़ कन म हो जाथे नही त प्राइवेट वाला दवाखाना म ज्यादा लगतिस कई के रिस्वत लेथे जब लईका होये के बेरा आथे त अस्पताल म भरती के बेरा म डॉ. नर्स हर पलग देहे अउ तुरन्त इलाज करे बर पैसा मागथें नही त परछी अउ भुईया म सुते ल पड़ही कईथे फेर रिसवत देहे ल पड़थे लई का हो जाथे त मीठाई बर फेर पैसा देथे घर म आये के बेरा छुट्टी होथे त जनम प्रमाण पत्र देहे के बेरा फेर ले पैसा मांगथे घर म आके रहे लागथे अउ फेर महीना मसुजी लगाये के बेरा आथे त नर्स मन तको पैसा मांगथे जब लईका बड़का हो जाथे त स्कूल म दाखिला करे के बेरा म गुरूजी मन हर जगा नई हावय कई के पैसा मागथे तत्का बेर फेर रिश्वत देहे ल पड़थे लईका मन मन लगाके नई पड़य लिखय अउ परीक्षा म अटक जाथे त दाई ददा मन लईका ल पास करे बर फेर स्कूल जाथे घुस देथे त ओला पास कर देथे गांव के सुसाईटी म राशन कार्ड म नाम जोड़े बर फेर ले सरकारी मनखे मन ल पैसा देबे त नाम ल जोड़थे अउ 18 बछर के होथे त चुनाव म अपन नाम जोड़वाये बर तको घुस देहे ल पड़थे लईका बाड़ जाथे त घर हर छोटे पड़े लगथे त घर बनाये बर नकशा खशरा बी वन परचा बनाये बर पटवारी ल लेके नगर पंचायत और ग्राम पंचायत म सब्बो कोई ल घुस देवे त ओहर घर बनाये बर अनुमति  देथे फेर पानी बर अउ बिजली बर खम्भा ल तार लगाये बर फेर पैसा देबे त कनेकशन जोड़थे शादी करबे त रात के बाजा बजाये बर अनुमती लेहे बर पुलिस मन ल पैसा देबे नही त चोगा बक्सा डीजे ल उठा के ले जाथे बरात जाबे त बस म ज्यादा मनखे कई के पुलिस गाड़ी रोक के पैसा लेथे ससुराल म रात के परगहनी करबे त लईका संगी साथी मन खा पीके नाचथे अउ लड़ाई झगड़ा होथे त चैकी थाना म ओला घुस देथे फेर ओला बाहर निकालथे आदमी हर जब बीमार होजाथे त अस्पताल म भरती होथे त खुन के कमी होथे त खुन लेहेबर पैसा लगथे अउ अच्छा इलाज करे बर डॉ. नर्स अलग ले पैसा मागथे जब जीव हर छुट जाथे त लास ल लाये के बेरा मरचुरी घर म रखईया काम करईया ल तको पैसा देबे त मुरदा घर ले जाथे अउ शव वाला गाड़ी म लाश ल गांव लाबे तभो गाड़ी चलईया ल दारू, पानी, नास्ता बर तको रिश्वत देहे ल पड़थे बेरोजगार मनखे मन रोजगार कार्यलय म नाम जोड़वाथे तीहा लाईन मत लगाये बर पड़य कई के पैसा देथे नौकरी म भरती करे के बेरा अपन नाम ल शामिल करे बर तको रिश्वत देथे घर बर गैस चुल्हा के गेस खत्म होथे तभो टंकी नई हावय कईथे त पैसा ले के ओला तुरंत देथे रेलवे स्टेशन म अपन सीट राखे बर रेल के टी.टी ल तको रिश्वत देहे बर पड़थे। गांव के जीवनदास मानीकपुरी हर कश्मीर ले कन्याकुमार अउ जगनाथपुरी ले द्वारिकाधीस घुम के आगेहे तैउन हर बताथे छोटे ले बड़े मंदिर हर जगह 2 ठन लाईन रहिथे 1 ठन नियम वाला रहिथे 1 ठन वी.आई.पी रहीथे जेमा पैसा देहेबर तुरंत दर्शन होथे अगर हमन पढ़ लिख के बड़े बन जाथन और पेपर टी वी विज्ञापन मोबाईल इंटरनेट म कुछु पद बर परीक्षा दिलाथन ओकर नियुक्ति पत्र डाक म आथे त डाकिया हर मिठाई बर पैसा मंागथे कोर्ट कचहरी म कई बछर बीत जाथे मुड़ी ले चुन्दी झर जाथे मेछा दाड़ही पाक जाथे अउ गोड़ हाथ तको खिया जाथे जक फैसला आथे ओकर नकल बर बाबु ल पैसा देबे त कोम होथे। हमर जीवन म कुछु न कुछु गलती हो जाथे पुलिस थाना के चक्कर म पड़ जाथन जैसे गाड़ी चलाये के बेरा कोनो हर पुजागे त हमन तीर ल पुलिस कागजात कम हे कई के घुस लेथे जेकर लागे रहिथे तेकर तीर गाड़ी वाला ल सजा देवाबो कई के लेथे खेत म कोनो के मेड़ ल कोनो काट देथे जेकर मेड़ रहीथे तैउन हर रिपोर्ट करथे त मर्म कायम करेबर कोकर तीर लेथे जउन मेड़ काटे रखिथे तेला बचाये बर पैसा लेथे सरकारी विभाग म परीक्षा होथे लिखित पास कर लेथे त शारीरिक नाप बर पैसा देथे शारीरिक नाप हो जाथे त साक्षातकार बर पैसा देहेबर पड़थे साईकील ले के कार, ठोक, बस, जीप सब्बो के जाच होथे सब्बो कुछु सही रहिथे त पुलिस कईथे पुरा कागजात साथ मे क्यो रखते हो यह गलत हैं। कई के घुस ले लेथे। अदालत म वकील हर अपन ग्राहक ल लागत गाय बरोबर दुहिथे पेशी उपर पेशी मीलथे एक ठन हाना हावय जतका के घाघर नई हावय ततका के पुदगौवनी देहे बर पड़थे। मतलब जेकर बर लड़बे ओकर कई गुना समय रूपया पैसा शरीर हर लग जाथे शहर नगर म अपन खुन पसीना ल लगा के कोनो मनखे हर भुईया लेथे जैउन हर अपन सपना के घर बलाये बर शुरू करथे अउ आखरी तक बन जाथे जेमा सरकारी मनखे मन ओला जोक अईसन चुहक डालथे जीवन के आखरी पड़ाव मरनी काम होथे जेमा श्मसान घाट जाये पहली पोस्टमार्टम बर स्वीपर ल दारू मुर्गा बर पैसा देबे त छीनी हथौड़ी म मुरदा ल फोड़ही चीरही ओकर दुरगती करे के बाद श्मसान घाट जाबे जीहा ल लाईन लगाबे जल्दी जलाये बर डोम ल पैसा देबे रात के शव ल कुछु कुकुर बीलाई मत नुकसान पहुचाय कई के अलग ले अउ देबे अश्थी ल गंगा जी म सेराय बर पण्डा नाउ डोगा वाला ल सब्बो ल पैसा देवत जाबे त राख हर ठण्डा होथे ओतको म पानी भीतरी मनखे मन सोना चांदी पैसा के लालच म राख ल रोक देथे मनखे के आत्मा मरे के बाद अउ जनम लेवत ले मोल भाव म अपन जिन्दगी ल पहा देथे।

लेखक
राजेश पाण्डेय मल्हारगढ

शाश्वत सत्य के पथ-प्रदर्शक गुरु

आज के संदर्भ में ‘गुरुपूर्णिमा’ का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि दुनिया भौतिकता के पीछे पागलों की तरह दौड़ रही है। ‘आध्यात्मिकता’ से पलायन ही ‘भौतिकता’ की शुरूआत होती है और यह भी सर्वविदित है कि भौतिकता आपको सुख तो दे सकती है, स्थाई आनंद नहीं। स्थाई आनंद के लिए आपको ‘आध्यात्मिकता’ का सहारा लेना ही पड़ेगा। अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि ‘आध्यात्मिकता’ के विषय में हमें कौन बताएगा? किस दिशा में जाने से यह जीवन में फलीभूत होगी? इसका बहुत सरल सा उत्तर है – गुरु । गुरु के माध्यम से ही हमारे जीवन में अध्यात्म घट सकता है। गुरु ही इस दिशा में हमारा पर्याप्त मार्गदर्शन कर सकते हैं। अध्यात्म के क्षेत्र में गुरु का महत्व सर्वोपरि होता है।

अध्यात्म के प्रति यदि शिष्य के मन में प्रबल जिज्ञासा होगी तो ही ‘गुरु’ इस क्षेत्र में शिष्य को लेकर आगे बढ़ेगा अन्यथा गुरु शिष्य की ज्ञान पिपासा दूसरे ढ़ंग से शांत करेगा। स्वामी विवेकानंद में ‘अध्यात्म’ को लेकर अनगिन जिज्ञासाएँ थीं। यही कारण है कि श्री रामकृष्ण परमहंस उन्हें विशिष्ट आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान करते हैं। यही शिक्षा विवेकानंद को शीर्ष पर पहुंचाती है। उन्हें विश्व वंद्य बनाती है। ईश्वरीय चेतना के संवाहक और प्रतिनिधि के रूप में गुरु का स्थान सुनिश्चित है। शिष्य यदि लौकिक शिक्षा प्राप्ति के ही योग्य होगा तो गुरु उसे उसी दिशा में ले जाएंगे और यदि शिष्य ‘विवेकानंद’ की तरह होगा तो गुरु की शिक्षण पद्धति अतिविशिष्ट हो जाएगी। गुरु शिष्य को असीमित श्रद्धा से भर देता है और उसे इस विश्वास से बचाता है कि ‘सत्य’ दूसरों से मिलता है। गुरु शिष्य को यह समझाता है कि तुम्हें ही सत्य की खोज करनी पड़ेगी। सत्य का अन्वेषण तुम्हारा ही कार्य क्षेत्र है। जिस सत्य की खोज विवेकानंद ने की, उस सत्य को श्रीरामकृष्ण परमहंस चाहते तो पहले ही उद्घाटित कर देते परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। विवेकानंद ने अपने अथक प्रयासों से ‘सत्य’ का साक्षात्कार किया। तो गुरु शिष्य को अध्यात्म की शिक्षा देता है। कोई और इस दिशा में शिष्य का मार्गदर्शन नहीं कर सकता।

शिष्य में शिष्यत्व को केवल गुरु ही जान सकता है। शिष्य स्वयं को तो पात्र समझता है; यह उसकी दृष्टि हो सकती है परंतु शिष्य की पात्रता कितनी है यह गुरु ही तय करते हैं। ‘शिष्यत्व’ के सहारे ही गुरु अपने शिष्य को ‘शिवत्व’ की ओर ले जाते हैं। ‘शिवत्व’ से आशय है शिष्य की अंतर्निहित शक्तियों का सम्यक जागरण। इस जागरण से ही शिष्य गुरु के कार्यों को आगे बढ़ाता हुआ स्वयं ‘अध्यात्म’ के क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धियां हासिल करता चला जाता है। अत: प्रश्न यह उभरता है कि ऐसे गुरु कहाँ मिलेंगे? इसका उत्तर है – पात्रता। यदि शिष्य सुपात्र होगा तो गुरु उसे ढूंढते हुए पहुँच जाएँगे। शिष्य को गुरु तक जाने की आवश्यकता नहीं है। बिना पात्रता के हम गुरु के लिए पूरी आयु भटकते रहेंगे किंतु हमें गुरु कभी नहीं मिलेंगे।

गुरु की महिमा असीमित है। अपरंपार है। शिष्य के प्रति वे महान उपकार करते हैं। चर्म चक्षुओं के स्थान पर ज्ञानचक्षु खोलने का कार्य करते हुए शिष्य को दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं। संत कबीर कहते हैं – “लोचन अनंत उघाडिया,अनंत दिखावन हार।” आज की युवा पीढ़ी के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है –
मातु पिता गुरु प्रभु के बानी
बिनहि बिचार करइ सुभजानी
गोसाईं जी ने सूक्ष्म संकेत किया है माता-पिता। अब जिन्हें यह लगता है कि उनके जीवन में योग्य गुरु का अभाव है तो ऐसे लोग बिना संशय ‘माता-पिता’ को अपना गुरु मान स्वयं का कल्याण कर सकते हैं क्योंकि जितनी क्षमता एक योग्य गुरु में होती है उससे कहीं अधिक क्षमता माता और पिता में भी होती है। प्रश्न श्रद्धा का है क्योंकि ज्ञान वहीं ठहरता है जहाँ एकनिष्ठ श्रद्धा होती है।
लेखक
डॉ. लोकेश शर्मा
गायत्री नगर
राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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