कविता - ज़िन्दगी


ऐ जिनगी के

कहां ले आना अउ कहां ले जाना हे

ऐ जिनगी के इया इहां न कोनो ठिकाना हे                          
                                                      मन ल हम सबला रमाना हे

कहां ले आना अउ कहां ले जाना हे

ऐ जिनगी के इया अब न कोनो ठिकाना हे

राम र के नाव ह जिनगी म हावय सार

इही में ही मन ल हम सबला रमाना हे

दया मया के लमावत डोरी हो...हो...हो....

कब कहां टूट जाना हे...

धन दौलत ले रे तिजोरी

देख वोला ललचाना हे

येकर मरम म फंसे जमाना

अपन संग सबे ल रमाना हे

सूते म देखत सुघ्घर सपना

पल म चूर चूर हो जाना हे

मीठ मीठ बोली ले र लेन झोली

इही ल ही सबों म बंटाना हे

कहां ले आना अउ कहाँ ले जाना हे

ज ले राम के नाव संगी

बाकी तो सब बेगाना हे...।
                               
                            डॉ. दीनदयाल साहू 

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