विद्वानों, बुद्धिमानों और सांस्कृतिक रूप से जाना जाता है राजनंदगांव

गजानन माधव मुक्तिबोध 
डॉ.बलदेवप्रसाद मिश्र 






हरी ठाकुर
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी 
ठाकुर प्यारेलाल सिंह
संपदाकीय
 विद्वानों, बुद्धिमानों और सांस्कृतिक रूप से जाना जाता है राजनांदगांव
राजनांदगांव जिला व शहर विद्वानों, बुद्धिमानों और सांस्कृतिक रूप से जाना जाता है। इसी कारण राजनांदगांव को संस्कारधानी भी कहा जाता है जिसमें शहर की महिमा और विरासत अब भी देखी जा सकती है। राजनांदगांव राज्य वास्तव में 1830 में अस्तित्व में आया था। बैरागी वैष्णव महंत ने आज राजधानी राजनांदगांव में अपनी राजधानी स्थानांतरित कर दी। शहर का नाम भगवान कृष्ण, नंद, नंदग्राम के वंशजों के नाम पर रखा गया था। हालांकि नाम जल्द ही राजनांदगांव में बदल दिया गया था। राज्य के आकार के कारण नंदग्राम आम तौर पर हिंदू देखभाल करने वालों द्वारा शासित था। राजनंादगांव के इतिहास में उन्हें वैष्णव के नाम से जाना जाता है। राज्य ज्यादातर हिंदू राजाओं और राजवंशों के अधीन था। महल व सड़कें राजनांदगांव के पुराने और ऐतिहासिक अवशेष पिछले युग की संस्कृति और महिमा दर्शाते हैं। जिला राजनांदगांव 26 जनवरी 1973 को तात्कालिक दुर्ग जिले से अलग होकर अस्तित्व में आया। रियासत काल में राजनांदगांव एक राज्य के रूप में विकसित था, यहाँ पर सोमवंशी, कलचुरी एवं मराठाओं का शासन रहा। पूर्व में यह नंदग्राम के नाम से जाना जाता था।  यह शहर राजनांदगांव भारत के ऐतिहासिक रूप से समृद्ध स्थानों में से एक है। गौरवशाली अतीत, सुंदर प्रकृति और संसाधनों की बहुतायत ने राजनंादगांव को भारत के उभरते शहरों के रूप में बनाया है। शहर का एक अच्छा इतिहास है।
राजनांदगांव अंग्रेजों के आने तक जीने के लिए एक सक्रिय स्थान था। 1865 में अंग्रेजों ने तत्कालीन शासक महंत घासीदास को राजनांदगांव के शासक के रूप में मान्यता दी। उन्हें राजनांदगांव के फ्यूडल चीफ का खिताब दिया गया और उन्हें बाद में समय पर गोद लेने का अधिकार दिया गया। ब्रिटिश शासन के तहत उत्तराधिकार वंशानुगत द्वारा पारित किया गया था। बाद में नंदग्राम के सामंती प्रमुख को ब्रिटिश बहादुर द्वारा राजा बहादुर के उपाधि से सम्मानित किया गया। उत्तराधिकार राजा महंत बलराम दास बहादुर, महंत राजेंद्र दास वैष्णव, महंत सर्वेश्वर दास वैष्णव, महंत दिग्विजय दास वैष्णव जैसे शासकों को पारित किया गया। राजनांदगांव के रियासत राज्य का राजधानी शहर था और शासकों का निवास भी था। समय बीतने के साथ राजनांदगांव के महंत शासकों ने ब्रिटिश साम्राज्य की कठपुतली बन गई। कहानी भारत के अन्य हिस्सों से अलग नहीं थी। एक बार भारत में समृद्ध और समृद्ध राज्य भारत में ब्रिटिश राज का एक रियासत फिर एक वर्चुअल ब्रिटिश शासित राज्य बन गया। साहित्य के क्षेत्र में गजानन माधव मुक्तिबोध, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और बल्देव प्रसाद मिश्र का योगदान विशिष्ठ रहा है। यहां इनकी स्मृति में त्रिवेणी परिसर स्थापित है जहां वर्ष भर साहित्यिक आयोजन होते रहते हैं। जिले में अनेक साहित्यिक संस्थाओं का आज सक्रिय होना इस बात का साक्षी है कि यह जिला साहित्य के क्षेत्र में काफी समृद्ध रहा है। रियासत कालीन समय का आकलन करें तो राजघरानों का यहां चलन रहा है। अनेक राजाओं ने यहां राजकर प्रजा हित में काम किया है।  इसी तरह खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय वास्तव में संगीत के क्षेत्र में विश्व विख्यात है। यहां के राजा ने अपनी बेटी इंदिरा के नाम पर इस विश्वविद्यालय की स्थापना की है। राजनांदगांव को सांस्कृतिक गढ़ भी कहा जाता है। यहां देश-विदेश से बच्चे कला में पारंगत होकर अंचल का नाम रोशन करने लगे हैं। इसी तरह आंचलिक लोक कला में राजनांदगांव जिले के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। यहां के नाचा के पुरोधा कलाकारों में दाऊमंदराजी का नाम आदर के साथ लिया जाता है। इनके सम्मान में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा पुरस्कार दिया जाने लगा है जो अंचल के लिए गौरव की बात है। इसी कड़ी में लोकमंच के पुरोधा के रूप में खुमान लाल साव के योगदान को हम रेखांकित करते हैं। वे चंदैनी गोंदा में लोकमंचीय प्रस्तुति में गीतों को संगीत के सुर में ढालते रहे। आज लोकमंचीय प्रस्तुति के जन्मदाताओं में दाऊ रामचंद्र देशमुख के साथ खुमानलाल साव को स्मरण करते हैं। लोककला की यात्रा अंचल में आज भी प्रवाहित हो रही है। अनेक कलाकारों ने हबीब तनवीर की टीम के साथ देश-विदेश में अपनी प्रस्तुति देकर जिले का नाम रोशन किया है।  मेरा भी सौभाग्य रहा है कि इस जिले में जन्म लेकर वरिष्ठ व मूर्ध्न्य कलाकारों के बीच मुझे काम करने का अवसर मिला। इससे संगीत के क्षेत्र में बंेजो वादन से अपनी कला यात्रा प्रारंभ कर संगीत निर्माण करने का तक का सफर मैंने तय किया है और आगे भी इसी क्षेत्र में मुझे काम करना है। आप सभी लोक कलाकारों और साहित्यकारों का आशीर्वाद सदैव मुझे मिलता रहा है। इसी का परिणाम है कि आज मैं अपनी साप्ताहिक पत्रिका के माध्यम से आप तक पहुंचने का प्रयास किया है। मेरी इच्छा है कि अंचल के कलाकारों को उनकी योग्यता के अनुरूप उन्हें इस अखबार के माध्यम से पहचान मिले, और कलाकारों को एक मंच के साथ सम्मान मिले। इस उद्देश्य से इस अखबार का प्रकाशन करने का बीड़ा उठाया है। आशा है आप सभी का सहयोग इस अखबार को मिलेगा जिससे अधिक उत्साह के साथ इस कार्य को अच्छे ढंग से करने में मुझे संबल मिले।
इसी आशा के साथ
जय जोहार...।


संपादक 
गोविन्द साहू (साव)
लोक कला दर्पण 
contact - 9981098720




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