संपादकीय - संस्कृति की परिभाषा




संपादकीय

विद्वानों के अनुसार मनुष्य की अमूल्य निधि उसकी संस्कृति है। संस्कृति में रहकर व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी बनता है और अपने अनुकूल बनाने की क्षमता अर्जित करता है। सामान्य अर्थ में  संस्कृति सीखे हुए व्यवहारों की सम्पूर्णता है। लेकिन संस्कृति की अवधारणा इतनी विस्तृत है कि उसे एक वाक्य में परिभाषित करना संभव नहीं है। वास्तव में मानव द्वारा अप्रभावित प्राकृतिक शक्तियों को छोड़कर जितनी भी मानवीय परिस्थितियाँ हमें चारों ओर से प्रभावित करती हैं, उन सभी की सम्पूर्णता को हम संस्कृति कहते हैं। दूसरे शब्दों में संस्कृति एक व्यवस्था है जिसमें हम जीवन के प्रतिमानों, व्यवहार के तरीकों,  परम्पराओं, विचारों, सामाजिक मूल्यों, मानवीय क्रियाओं और आविष्कारों को शामिल करते हैं। मानव जीवन के आचार-विचार, जीवन शैली तथा कार्य व्यवहार ही संस्कृति कहलाती है। मानव समाज के धार्मिक, दार्शनिक, कलात्मक, नीतिगत विषयक, कार्य.कलापों, परम्परागत प्रथाओं, खान-पान, संस्कार इत्यादि के समन्वय को संस्कृति कहा जाता है। अनेक विद्वानों ने संस्कार के परिवर्तित रूप को ही संस्कृति स्वीकार किया है। संस्कृति जीवन की उन अवस्थाओं का नाम है जो मनुष्य के अन्दर व्यवहार, लगन और विवेक पैदा करती है। यह मनुष्यों के व्यवहारों को निश्चित करती है उनके जीवन के आदर्श और सिद्धान्तों को प्रकाश प्रदान करती है। शिष्ट व्यवहार, ज्ञानार्जन, कलाओं के आस्वादन इत्यादि के अतिरिक्त किसी जाति की अथवा वे समस्त राष्ट्रीय क्रियाएँ एवं कार्य-कलाप जो उसे विशिष्टता प्रदान करते हैं संस्कृति के अंग है। संस्कृति मानव जीवन में उसी तरह व्यापत है जिस प्रकार फूलों में सुगन्ध और दूध में मक्खन। इसका निर्माण एक या दो दिन में नहीं होता, युग-युगान्तर में संस्कृति निर्मित होती है। भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्ध संस्कृति है। अन्य देशों की संस्कृतियाँ तो समय की धारा के साथ-साथ नष्ट होती रही हैं, किन्तु भारतीय संस्कृति आदि काल से ही अपने परम्परागत अस्तित्व के साथ अजर-अमर बनी हुई है। इसी तरह छत्तीसगढ़ अंचल की भी अपनी संस्कृति है, वर्तमान में हमारी संस्कृति में अस्तित्व का खतरा मंडराने लगा है जिसे हमारे लिए अच्छा संदेश नहीं कहा जा सकता। इसी संस्कृति को सहेजने का काम मैंने किया है तथा अपनी धरोहर को बचाए रखकर जन समक्ष लाने का प्रयास है। आशा है आप सभी लेखकों और पाठकों के सहयोग से जितना हो सके अच्छा से अच्छा करेंगे।
जय जोहार....


संपादक
गोविन्द साहू (साव)
लोक कला दर्पण 
contact - 9981098720

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