मोबाइल के नसा by Dr.Dindayal sahu



मोबाइल के नसा


मनखे के जिनगी म...
जब ले मोबाइल ह आए हे...
छोटे होय ते बड़े...
बाहिर भीतरी  म समाए हे...
कइसे बाचन ऐकर ले...
मित मितानी के बगरे जिनगानी ह दू बीता होगे...
मोह माया के लमाय डोरी ह फीता होगे...

बिहनिया होवय ते होवय रतिहा...
सबके सुते भाग  ल एहा जगाए हे...
अब्बड़ हे नसा एमा मोहनी कस...
सबला देखन अपने म लगाए हे...
मोह माया के लमाय डोरी ह फीता होगे...

कोनो ल कुछु आए चाहे झन आए...
मोबाइल ह सबे ल सब समझा देथे...
पढ़े लिखे या अनपढ़ हा होवय...
हर कोनो एला अपन गला ले लगा लेथे...
सब में भले  मनखे ह हारे फेर ऐमा जीता होगे...

सरी संसार ह एमा समाए...
धरम होय या जिनगी के मरम...
इही ल देख देख के...
जम्मो करत हवय...
बिसरगे देवता धामी मंदिर इही ह भागवत  गीता होगे...

बेरा के फेरा म लोग इही म अरझे...
कोनो ह काकरो कर काबर जाय...
घर बइठे मनखे के जानो मानोे...
सरी करम धरम हा देखते हो जाए...
का कहन हमर जब्बर छाती अपने बर रीता होगे...

डॉ.दीनदयाल साहू 

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