किसान मन के जिनगी के आस होथे आषाढ़



लकलक लकलक जरत भुइयाँ मानसून के हबरे ले वइसने जुड़ हो जथे, जइसे कोनो भभकत अँगेठा या आगी म गघरा भर पानी उल्दा जथे। रिमझिम रिमझिम पानी जब आषाढ़ धरके आथे, तब सबले जादा खुशी किसान मन ल होथे। अउ काबर नइ होही, इही आषाढ़ म किसान मन अपन महिनत ले सपना रूपी धान के बिजहा ल धरती दाई के कोरा म छितथे। आसाढ़ के आय ले धरती महतारी हरियर सवांगा म सजगे मुसुर मुसुर मुस्काये ल लग जथे। डारा पाना पुरवाही म हाथ हला हला के नाचथे। बादर के गरजई घुमरई अउ कड़कड़ कड़कड़ बिजुरी किसान मन बर एक ताल के काम करथे, जेखर सुर ताल म किसान मन अपन जाँगर अउ नाँगर ल साज के धरती दाई के कोरा म करमा ददरिया के तान छेड़त...ओहो तोतो के अउ खन खन बाजत बइला के घुँघरू संग एमगन होके महिनत करत नाचथे। फेर आने मनखे मन बर आसाढ़ या मानसून सिर्फ गर्मी ले राहत आय। वो मन गर्मी ले हदास खा जथे, फेर किसान उही जरत-भभकत गरमी म मानसून के रद्दा जोहत किसानी के जम्मो जोरा ल करथे। मेड़ पार अउ मुही ल बाँधना, खँचका-डिपरा ल बरोबर चालना, काँटा खूँटी ल बिनना, काँद दूबी ल खनना ये सबो बुता ल तो उही भभकत गर्मी म साजथे। अउ घर म घलो उही गर्मी म आषाढ़ के आये के पहली पैरा धरथे, परदा भाँड़ी म पंदोली देथे, बखरी बारी ल रंग रंग के साग भाजी बोय बर चतवारथे, नार बियार ल चढ़ाये बर ढेंखरा लानथे। चौमास बर लकड़ी छेना ल भितराथे, छानी परवा ल घलो उही गर्मी म छाथे। अइसन घर बन के जम्मो बूता ल साध के किसान मन आशा के जोती बारे मॉनसून अउ आषाढ़ के अगोरा करथे। अउ जब पानी के पहिली बूँद मूड़ म परथे तब मार खुशी म नाचे ल धर लेथे। ताहन का पूछना, भिनसरहा उठ के बइला ल खवा पिया के नाँगर धरके खेत कोती पाँव बढ़ाथे। बइला ल जब किसान भिनसरहा कोटना म पानी पियाथे तब ओखर गला के घण्टी अउ किसान के मुख ले निकले सुघ्घर सिसरी मनभावन लगथे। एखर आनंद उही ले सकथे जेन कभू गाँव म सुने होही या देखे होही।


आसाढ़ म किसान सँग ओखर पूरा परिवार नाचत झूमत खेती किसानी म लग जथे। बाँवत के बेरा के वर्णन कोनो बढ़िया कैमरा ले फोटू खींचे कस लगथे। चारो मुड़ा खेत-खेत म सइमो-सइमो करत कमइया, टुकनी बोरी म माढ़े धान, हरिया भर नाँगर नाँस म बनत सुघ्घर कूँड़, बइला के गला के खनकत घण्टी, किसान के मुख ले बरसत करमा ददरिया अउ ओहो तोतो के आवाज, निंदईया महतारी मन के हाथ के खनकत चूड़ी, खार म रटत पपीहा, पड़की अउ तीतुर के सुघ्घर बोल मन ल मोह लेथे। नान्हे नान्हे लइका मन हाथ म कुदारी धरे मन माड़े कूदत नाचत टोकन कोड़थे। ये सब दृश्य मन म अपार खुशी भर देथे। एखर आनंद भी उही मनखे उठा सकथे जेन बाँवत के बेरा म कभू सपड़े होही। लिख के कवि या लेखक घलो वो मनोरम दृश्य अउ आनंद ल नइ दे सकय। ये परम आनंद के अनुभूति सिर्फ उही मेर मिल सकथे। कतको बूता करे कखरो तन मन म थकासी नइ दिखे। बिहनिया ले सँझा काम बूता म लगे किसान पाछू बरस के जम्मो दुख पीरा ल भुलाके आसाढ़ म नवा आस जगाके जाँगर टोर महिनत करथे।


आषाढ़ के पहली बारिस जब भुइयाँ ल चुमथे तब माटी महतारी सौंधी महक म महकेल लग जथे। वो महक ल लिख के बया करना असंभव हे। उही पहली बारिस के संग भुइयाँ म पड़े जम्मो लमेरा,बन-बिजहा धीरे धीरे अपन आँखी उघारथे। जेमा रंग रंग के काँदी, चरोटा, लटकना,धनधनी, उरदानीअउ छिंद, परसा, बोइर, आम, जाम, अमली, बम्हरी, कउहा, करंज के फर पिकी फोड़के जागे बर धर लेथे। आषाढ़ मास म करिया करिया राय जाम पेड़ उप्पर कारी घटा कस दिखथे। लइका मन ओला टोरे बर टोली बनाके ए रुख ले वो चिल्लावत फेरा लगाथे। हाट बाजार म घलो ये फर अब्बड़ बिकथे। गाँव के गौठान म गरुवा गाय आषाढ़ के संग सकलायेल लगथे, काबर की डोली म धान पान बोवाथे। हरियर हरियर चारो मुड़ा चारा देखके गाय गरुवा के मन म घलो अपार खुशी होथे। गर्मी म लहकत लहकत दिन बिताये अउ सुख्खा काँद पात खाय के बाद आषाढ़ म हरियर चारा अउ पीये बर पानी सबो जघा गाय गरुवा म मिले ल लगथे।

धरती दाई आषाढ़ म अपन नरी के पियास बुझावत ससन भर पानी पीथे। रझरझ रझरझ पानी बरसे ले तरिया, बाँधा, कुँवा बउली म पानी भरे ल लग जथे। नरवा, नँदिया, झरना म धार बढ़े ल लगथे। चारों मुड़ा खोचका डबरा म पानी भर जथे। गली खोर म चिखला घलो मात जथे। कोनो साहब बाबू सूट बूट पहिरे चिखला पानी के डर ले पँवठा म पाँव मड़ावत धीर लगाके चलथे त उही म किसान मनखे बिन चप्पल के चभरंग चभरंग गीत गावत खुशी म बढ़थे।
लइका मन मनमाड़े खुशी म चिल्लावत चिल्लावत आषाढ़ के बरसा के मजा लेवत घड़ी घड़ी भींगथे। अउ रंग रंग के खेल खेलथे, गोल गोल घानी मूंदी घूमथे। बरसा के धार म पात पतउवा ल बोहा के थपड़ी पीटत अबड़ मजा करथे। फाँफा फुरफुन्दी के पाछू पाछू भागथे।अउ सबले खास बात जम्मो लइका मन खेलत खेलत-

घानी मूंदी घोर दे...
पानी दमोर दे...
कहिके चिल्लावत फिरथंे। इही मास म स्कूल घलो खुलथे। ममादाई के घर गरमी छुट्टी बिताये के बाद कापी बस्ता धरके फेर स्कूल म पढ़े लिखे बर जाथे। घुरवा, डबरा, तरिया, नरवा, कुँवा, बउली के पानी म मछरी मन मेछरायेल लगथे। तरिया के घठोंदा बाढ़े बर धर लेथे। कहे के मतलब ये की तरिया म पानी भरे ले घाट घठोंदा उपरात जाथे। मेचका अउ झींगुर रट लगाये ल लग जथे। बरसा के पानी पाके तलमलावत साँप, बिच्छी, केकरा अउ कतको कीरा मकोड़ा अपन अपन बीला ले बाहिर निकलथे। पिरपिटी साँप जोथ्था जोथ्था इती उती देखे बर मिल जथे। ये मउसम म ये सब जीव मनके अब्बड़ डर रहिथे। कभू कभू घर कुरिया म घलो घूँस जथे। रंग रंग के कीरा ये मउसम म जघा जघा दिखथे। बउग बत्तर रतिहा अँजोर ल देख अब्बड़ उडि़याथे। संगे संग रंग रंग के फाँफा फुरफुन्दी घलो उड़थे। झिमिर झिमिर बरसत पानी म कौवा काँव काँव करत पाँख फड़फड़ावत छानी म बइठे रहिथे। त गौरइय्या ह दल के दल अँगना म बरसा म भींगत भींगत चिंव चिंव करत दाना चरथे।

आषाढ़ ले सबला आस रहिथे। चाहे छोटे से छोटे जीव रहे या कोनो बड़का हाथी। आषाढ़ के बरखा सबला नवा जीवन देथे। आषाढ़ म किसान मन हम सबके पेट के थेभा धान के खेती करथे, उँखर महिनत ले ही सबके पेट बर दाना मिलथे। जइसे पेट भरे के बाद ही जीव मन आने काम ल सिधोथे वइसने खेती म ही दुनिया के आने सबो बूता टिके हवे। आषाढ़ आय के बाद किसान म अपन देवी देवता ल मनाये बर कतको अकन तिहार घलो मानथे। जेमा जुड़वास पहली तिहार होथे, जेन आषाढ़ मास के अँधियारी पाँख म अष्ठमी के मनाये जाथे। ये दिन किसान मन अपन गाँव के शीतला दाई म तेल हरदी जघा के खेती किसानी अउ गाँव के समृद्धि बर बारम्बार पूजा अर्चना अउ वंदना करथे। ओखर बाद बारो महीना तीज तिहार के क्रम चलत रहिथे। हमर भारत भइयाँ म तिहार बार खेती के हिसाब ले चलथे। सावन महीना के हरेली ल पहली बड़का तिहार केहे जाथे। आषाढ़ के बोहावत पानी ल बचाये बर घलो हम सबला उदिम करना चाही ताकि भूजल  स्तर म बढ़ोतरी होय। तरिया,नदिया, बँधिया म पानी भरे रहय। अउ बछर भर पानी के तंगई झन होय। आषाढ़ के बने बरसा बने किसानी के निसानी आय अउ बने किसानी सुखमय जिनगानी के निसानी आय। 

जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"
बालको कोरबा 

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