छत्तीसगढ़ी कविता - लहू लहू म कंहा कोनो भेद होथे।



लहू लहू म कंहा कोनो भेद होथे।
फेर ये समाज काबर जाती धरम के रोना रोथे।
लईका के बुध म अईसन बीज काबर बोथे।
कतको कुटका रियासत मिलगे फेर जात-पात नई मिटिस दुख होथे।
जाके पुछ वो महतारी ल जेकर नोनी बाबू नई होथे।
अउ जिनगी भर संतान के सुख बर रोथे।
खुवार होथे जिनगी अऊ बुड़हापा म बेसहारा होथे।
तब का कोनो समाज उंखर सेवा बर खड़े होथे।
होथे फेर कइसन, मरे के बाद भी पक्की भात बर पदोथे।
जुच्छा होथे तभो ले करजा कर के समाज बर दार फिजोथे।
फेर ये मालिक के भुंइया म अइसनो रक्तवीर होथे।
जेन जात धरम ले उप्पर उठ के पर पिरा बर लहु सिंच के खुस होथे।
तब का वो लहू ल लेय बर जात धरम के परीकसन होथे।
आज मोर अंतस ह गज़ब रोथे अउ पुछथो भगवान ले तोर दुनिया म ये का होथे।
कोन बईरी आय जेन जात धरम ल करगा के बीज कस बोथे।
ये तो वो भुइयां आय न जिंहा भगवान राम के राज म बेंदरा भालू घलो मनखे बरोबर होथे।
फेर ये मनखे मन परम्परा के रोना काबर रोथे।
हमन पढ़त आत हन वो परम्परा म बुराई हे त सती प्रथा घलो बन्द होथे।
फेर कतिक दिन ले चलही तुंहर ये फुटानी सबे बुराई के एक दिन अंत होथे।
खेती म बन्द मारे बर जइसे निंदा नाशक दवई होथे।

         दुर्गेश सिन्हा "दुलरवा"
          दुर्रे बंजारी (छुरिया)
             राजनांदगांव 


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