हिन्दी के पाठ्यक्रम में शामिल हो ग़ज़ल - इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी


ग़ज़ल मूलतः फारसी की विधा है। हिन्दुस्तान में आने के बाद धीरे-धीरे यह उर्दू भाषा में इस तरह समाहित हुई कि उर्दू की विधा बन गई। आज ग़ज़ल उर्दू की विधा मानी जा रही है, यह ग़ज़ल की लोकप्रियता का प्रमाण है। लोकप्रियता यहीं तक नहीं रुकी, उर्दू में घुलने-मिलने के बाद इसने कई दूसरी भाषाओं पर भी अपना जादू बिखेरा। आज ग़ज़ल हिन्दी भाषी लोगों के काफी करीब हो चुकी है, बल्कि हिन्दी भाषी लोगों से इस कदर घुल-मिल गई है कि तमाम लोग इसे हिन्दी की विधा समझने लगे हैं। हिन्दी के अलावा भारत की अन्य भाषाओं तेलुगु, कन्नड़, बंगाली और मराठी के साथ विदेशी भाषा चीनी व फे्रंच में भी ग़ज़लें खूब लिखी जा रही हैं।

आज हिन्दुस्तान में ग़ज़ल को उर्दू से ज्यादा हिन्दी भाषा के जानकार लिख और पढ़ रहे हैं। ये और बात है कि कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोग इसे उर्दू भाषा की विधा समझते हुए छूत समझते हैं और एक तरह से बहिष्कार करने की भी कोशिश करते हैं और दूसरी ओर जापानी विधा हाइकु को बिना किसी हिचक के हिन्दी भाषी विधा के रूप में स्वीकार कर लिया है। हालांकि इस संकीर्ण मानसिकता के बीच बहुत से साहित्यकार हिन्दी-उर्दू को अलग-अलग भाषा न मानकर एक साथ मिलजुल कर काम कर रहे हैं। आज तमाम स्थानों पर कवि सम्मेलन और मुशायरा एक ही मंच पर एक साथ किया जा रहा है। ऐसे में मंच पर एक साथ पढ़ने वाला व्यक्ति जब ग़ज़ल पढ़ता है तो यह भेद करना बेहद मुश्किल होता है कि मंच पर खड़ा होकर पढ़ने वाला व्यक्ति हिन्दी का कवि है या उर्दू का शायर। कहने का मतलब यह है कि ग़ज़ल को अधिकतर हिन्दी भाषियों ने तहेदिल से अपना लिया है। ये लोग इसे अपने से अलग बिल्कुल भी नहीं समझते। ऐसे हालात में यह चर्चा जोर पकड़ने लगी है कि ग़ज़ल को हिन्दी के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया जाए।

इसके पक्ष में कई तक दिए जा रहे हैं, तो विरोध करने वालों की भी तादाद कम नहीं है। विरोध करने वाले कहते हैं कि ग़ज़ल शु़ुद्ध रूप से उर्दू की विधा है, इसलिए इसे हिन्दी के पाठ्यक्रम में क्यों शामिल किया जाए, विरोध करने वाले बहुत से लोग समझते हैं कि उर्दू विदेशी या मुसलमानों की भाषा है। मगर, यह बात सच्चाई से परे है। मुसलमानों की अगर कोई भाषा हो सकती है तो वह अरबी है, क्योंकि इस्लाम की सबसे प्रतिष्ठित पुस्तकें कुरआन और हदीस मूलतः अरबी भाषा में हैं।

 उर्दू भारत की ही भाषा है और भारत में पली-बढ़ी है। अंग्रेजों ने भारत के
लोगों को भाषागत आधार पर भी बांटने का षड़यंत्र रचा था, जिसमें वे काफी हद तक कामयाब भी रहे। अंग्रेजों ने हिन्दू धर्म की बातें हिन्दी में और मुसलिम धर्म की बातें उर्दू में अनुवाद करवाई। आज़ादी के बाद जहां भारत में राष्टृीय भाषा को लेकर अभी विचार विमर्श चल रहा था, वहीं पाकिस्तान ने आनन-फानन में उर्दू को राजभाषा घोषित कर दिया।

पाकिस्तान में मुसलमान बहुमत में हैं तो भारत में हिन्दू। यही वजह है उर्दू को बहुत से लोग मुसलमानों की भाषा समझने लगे। ग़ज़ल का विरोध कई लोग इस वजह से भी करते हैं कि उन्हें इसके छंद को लेकर परेशानी है। इसका बेहद जटिल छंद समझ में न आने के कारण बहुत से लोग झल्ला जाते हैं और कहते हैं कि इसका छंद बदला जाना चाहिए। इनका अपना तर्क है कि रटे-रटाए छंद में ही ग़ज़ल कब तक कही जाती रहेगी, अब कुछ नया होना चाहिए। इसी दलील के तहत कई लोग अनाप-शनाप और बिना किसी छंद के ग़ज़ल लिख रहे हैं और इसे नई विधा बता रहे हैं। यहां कई चीजें समझने की जरूरत है। पहली तो यह कि ग़ज़ल की अपनी एक पहचान है, और यह पहचान इसके अपने छंद और लय के कारण ही है।

ग़ज़ल की लोकप्रियता भी इसके छंद और के चलते हीे है। ऐसे में यह कहना कि ग़ज़ल के छंद को ही बदला जाए, किसी भी हिसाब से मुनासिब नहीं हो सकता। ठीक उसी तरह, जैसे यदि कोई व्यक्ति पैजामे को पैंट कहना शुरू कर दे, और दलील दे कि यह नया अंदाज है मैं तो इसे ही पैंट कहूंगा। जैसे दोहे का अपना एक निर्धारित छंद है, उसी तरह ग़ज़ल के अपने पैमाने हैं जिसके साथ छेड़छाड़ करके शायरी करना और उसे ग़ज़ल बताना सही नहीं कहा जाएगा और न ही किसी कीमत पर इसे मान्यता मिल सकती है। जब ग़ज़ल को हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात आती है तो इसके चाहने वाले अपना तर्क देते हैं। इनका कहना है कि विधा
की कोई भाषा नहीं होती हैै। जब ग़ज़ल हिन्दी भाषियों के बीच अपना मुकाम बना चुकी है तो इसे हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल करने में कोई हर्ज नहीं है।

गौरतलब है कि भारत के कई विश्वविद्यालयों के हिन्दी पाठ्यक्रम में ग़ज़ल को शुमार किया गया है जो छात्र-छात्राओं के बीच काफी लोकप्रिय भी है। महाराष्टृ और मध्य प्रदेश के कई विश्वविद्यालय इनमें अग्रणी हैं। अब जरूरत इस बात की है कि उत्तर प्रदेश सहित अन्य प्रदेशों के विश्वविद्यालयों में भी ग़ज़ल को हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। इसके लिए साहित्यकारों के बीच रायशुमारी कराई जा सकती है। किसी विधा को भाषा विशेष से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उर्दू के विभागाध्यक्ष रह चुके प्रो. फजले इमाम कहते हैं कि ग़ज़ल को हिन्दी पाठ्यक्रम में ज़रूर शामिल करना चाहिए क्योंकि ग़ज़ल सांस्कृतिक परम्पराओं से प्रभावित है। इसको हिन्दी विधाओं में शामिल करना लाभकारी भी होगा और ज्ञानवर्धक भी। ग़ज़ल को स्वरूप है, ग़ज़ल के जो प्रत्यय एवं प्रतिमान है, उनका हिन्दी काव्यधारा में समावेश होना चाहिए क्योंकि ग़ज़ल अपनी सम्पूर्ण कलात्मकता के साथ जिन बिन्दुओं को प्रस्तुत करती है वो गीत से संबंधित हैं। गीत जो गेय धातु से बना हुआ है, उसके सम्पूर्ण आयाम से संबंधित है। ग़ज़ल लिखने एवं सोचने दोनों की कविता है, इसलिए ग़ज़ल का जो मूल रूप है, उसे हिन्दी की काव्य-धारा में निश्चित रूप से शामिल करना चाहिए। इस बारे में प्रो. वसीम बरेलवी कहते हैं,‘ ग़ज़ल अगर हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है तो यह एक अच्छा कदम होगा।

हमारे यहां भक्तिकाल-रीतिकाल, ये तमाम परिवर्तन हिन्दी के अंदर हुए हैं। तो ग़ज़ल ने अपने आपको अमीर खुसरो के समय से आज तक भिन्न-भिन्न परिवेश के हिसाब से हर जमाने में अपने आपको बदलने की कोशिश की है। हिन्दी और उर्दू, दोनों ही भाषाएं अमीर खुसरो को अपना पहला कवि-स्वीकार करती है।’

 डाॅ. राहत इन्दौरी कहते हैं कि अगर ग़ज़ल को हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल किया जाता है तो मेरी नज़र में यह अच्छी बात होगी, इससे देश के किसी विधा को बढ़ावा ही मिलेगा। उर्दू हिन्दुस्तान की भाषा है, ईरान की नहीं और उसमें ग़ज़ल को जोड़ दिया गया। बाद में ग़ज़लें हिन्दी, गुजराती, मराठी, तमिल एवं अन्य भारतीय भाषाओं विषेशकर पंजाबी में लिखी जाने लगी हैं, आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हमारे मध्य प्रदेश में कई क्षेत्रीय बोलियों में ग़ज़लें खूब कहीं जा रही हैं।


- इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
123ए, हरवारा, धूमनगंज, प्रयागराज-211015
मोबाइल नंबर- 9889316790

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