अव्यस्क बच्चों के द्वारा असावधानीपूर्वक व शरारती अंदाज में बाइक ड्राइविंग करने पर उन्हें कुछ नसीहतें देती हिन्दी बालकहानी


बालकहानी :
                            // बाइक ड्राइविंग //
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                      अक्सर मुहल्ले वाले कहा करते थे कि पता नहीं यह लड़का अपने आपको क्या समझता है । बड़ा अजीब लड़का है भाई । पंद्रह-सोलह बरस का है और ऐसा बाइक चलाता है कि पूछो ही मत । सड़क तो क्या गली-मुहल्ले को भी कुछ नहीं समझता । जब कुछ होगा ही , तभी समझ आएगा , लगता है । ऐसी ही तरह-तरह की बातें सुनकर मम्मी-पापा बहुत परेशान ही नहीं ; दुखी थे । पर वे क्या करते इकलौते बेटे सौन्दर्य को समझाइश से फर्क ही नहीं पड़ता । हर किसी की बात को सौन्दर्य यूँ ही मजाक में उड़ा देता ; या फिर ध्यान नहीं देता ।

                      सौन्दर्य यथा नाम , तथा रूप वाला कक्षा दसवीं का छात्र था । हृष्ट-पुष्ट शरीर । यथा आयु कद-काठी ।आदत-व्यवहार भी बढ़िया । पढ़ाई-लिखाई में नम्बर वन । पर उसकी एक बात सबके समझ से परे थी ; और वह है उसकी बाइक ड्राइविंग । दरअसल कुछ सीखने-करने की अपनी शौकीन प्रवृत्ति के चलते वह बहुत जल्दी बाइक चलाना सीख गया ; और सीखा भी ऐसा कि फुल स्पीड । स्पीड चलाना अपनी शान समझता था । ओवर टेकिंग करने की उसकी बहुत बुरी आदत थी । अपनी इस बुरी आदत की वजह से उसके साथ छुट-पुट घटनाएँ घट चुकी थीं । कई बार वह बाल-बाल बच चुका था । मम्मी-पापा को अपने बेटे सौन्दर्य के कारण दूसरों से खरी-खोटी सुननी पड़ती थी ।

                     आज सौन्दर्य सुबह स्कूल की छुट्टी के बाद घर आया । खाना खाया । सोफे पर बैठ कर अखबार के पन्ने उलट रहा था , तभी अचानक फोन आया । दो-चार मिनट बात हुई । फोन आॅफ करते हुए बोला - " मम्मी , मैं दिव्यांश के घर जा रहा हूँ । जल्दी ही आ जाऊँगा । फिर आपको जलेश्वर मन्दिर ले जाऊँगा । ज्यादा टाइम नहीं लगेगा । "
                  " अभिच् जा रहा है क्या रे..? " किचन से ही मम्मी की आवज आई - " तू फिर बाइक लेकर जा रहा है क्या रे...? तू चला जाता है और तेरे कारण मैं सुनती हूँ तेरे पापा से । आराम से जाना और अपने पापा के आने से पहले आ जाना । जा...। "  " ओ के मम्मी । आ जाऊँगा । " कहते हुए सौन्दर्य बाइक लेकर चला गया ।

                    सौन्दर्य दिव्यांश के घर पहुँचा । दोनों खुश हुए । कुछ देर तक इधर-उधर की बातें करने के बाद साल्हे गाँव से लगे गोंदली जलाशय देखने जाने का मन बनाया । बाइक से जाने की तैयारी होने लगी । दिव्यांश सौन्दर्य की बाइक ड्राइविंग से वाकिफ था । बोला - " यार सौन्दर्य , हम लोग हमारी बाइक से जाएँगे । हमारी बाइक नई भी है । अच्छी दौड़ेगी । उसका फ्रिरोड टैस्ट भी हो जाएगा । " अपने जूते का लेस बाँधकर दिव्यांश बाइक की चाबी ढूँढ़ने लगा ।

                   " नहीं दिव्यांश , मैं तो अपनी बाइक लेकर आया हूँ । मेरी बाइक से जाएँगे । डोन्ट वरी यार । स्लो चलाऊँगा ना । तू पीछे बैठना । चल जल्दी कर , टाइम हो रहा है । " सौन्दर्य अपनी तर्जनी पर की-रिंग घुमाते हुए बोला ।

                   " अच्छा चल ठीक है । " दिव्यांश तैयार हुआ , फिर उसे याद आया - " भाई , हेलमेट रख लेते हैं यार । तू नहीं लाया है तो हमारा ही पहन ले । हेलमेट लगाना जरूरी है । दूर का रास्ता है । बिज़ी रोड है । ट्रैफिक भी पड़ेंगे । जगह-जगह स्पीड ब्रेकर्स भी हैं । "

                   " छोड़ ना यार , वैसे भी मैं हेलमेट नहीं पहनता । अच्छा नहीं लगता मुझे । " सौन्दर्य दिव्यांश की बातों को अनसुनी करते हुए अपनी जिद पर उतर आया - " हेलमेट की जरूरत ही नहीं है । आदत ही नहीं है हेलमेट पहनने की । मैं हेलमेट लगाऊँगा ही नहीं । " फिर दोनों फ्रेंड्स अपने-अपने बैग लटकाए निकल पड़े ।

                  बाइक ताँदुला नगर से होते हुए कुंदरुपारा निकली । मेनरोड पर आते ही अब सौन्दर्य की बाइक स्पीड पकड़ने लगी । साथ ही , दोनों की गप्पें भी चलने लगीं । कभी मुहल्ले की बातें होती तो कभी स्कूल की । कभी फिल्मों की , कभी क्रिकेट की । उन्हें बड़ा मजा आ रहा था । रंगीन चश्मे पहने इन्हें पेड़-पौधे भी रंगीन दिख रहे थे । सौन्दर्य की बाइक की स्पीड और फास्ट होने लगी ; तभी दिव्यांश उसे टोकते हुए कहा - " धीरे भाई धीरे । इत्ती जल्दी भी क्या है । अब तो ज्यादा दूर भी नहीं है । पहुँच जाएँगे । "

                   " यार दिव्यांश , मुझे अपने पापा जी के आने से पहले घर आ जाना है । इधर जाने वाली बात मेरी मम्मी को भी मालूम नहीं है । " सौन्दर्य ने फिर बाइक का एक्सीलेटर घुमाया । वे अपने शहर डौण्डी से बहुत दूर निकल चुके थे ।

                  गोंदली जलाशय की दूरी अब अधिक नहीं थी । बस पहुँचने ही वाले थे । टुरिज्म एरिया होने की वजह से रोड एकदम व्यस्त थी । बाइक अपनी गति पर तो थी ही  , साथ ही दोनों बातचीत व गप्पे मारने में मशगूल थे । बाइक आवारी नाले के पास पहुँची । वहाँ पर रास्ता घुमावदार था । इन्हें सामने आ रहा ट्रक नहीं दिखा । नजदीक आने पर ट्रक से बचने के चक्कर में सौन्दर्य ने बाइक की हैंडिल लेफ्ट मूव किया । बैलेंस बिगड़ गया , सो बाइक डगमगा गई । स्पीड कम तो हुई , पर बाइक नाले के ड्वाईडर से टकरा गई । दिव्यांश छिटक कर नाले के कीचड़ में जा गिरा । दलदल में गिरने पर दिव्यांश कम चोटे आईं । उठने की कोशिश कर रहा था , पर वह उठ नहीं पा रहा था । सौन्दर्य की हालत बहुत खराब थी । उसका एक पैर बाइक के नीचे दबा था । कोहनी में खरोचें आई थीं । चेहरा छिल गया था ; गनीमत है कि सर पर चोट नहीं आई थी । उसे अंदरूनी चोट लगी थी । दर्द से कराहने लगा । आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा । अचानक बेहोशी छा गई । उन पर राह चलते लोगों की नजर पड़ी । दौड़ कर आए । एक व्यक्ति ने दिव्यांश को कीचड़ से बाहर निकाला । एक युवक ने बाइक उठाई । सौन्दर्य को उठाकर पेड़ के नीचे ले जाया गया । लगभग आधे घंटे बाद स्वास्थ्य विभाग की आपातकालीन सेवा वाहन संजीवनी 108 आई ।

                   सौन्दर्य और दिव्यांश को डिस्ट्रिक्ट हाॅस्पिटल लाए गए । प्रायमरी ट्रीटमेंट होते तक दोनों के मम्मी-पापा पहुँच चुके थे । दिव्यांश को जनरल वार्ड में शिफ्ट किया गया । दोनों के मम्मी-पापा बहुत परेशान थे । खबर मिलते ही परिजन हाॅस्पिटल पहुँचने लगे । पास-पड़ोस के लोग आने लगे । रिश्तदारों का ताँता लग गया । सभी उनके मम्मी-पापा को सम्हालने में लगे हुए थे । दोनों बच्चों की शीघ्र स्वास्थ्य की कामना के साथ उनके मम्मी-पापा को ढाँढस बंधाए जा रहे थे । सौन्दर्य की क्रिटिकल कंडीशन को देखते हुए डाॅक्टरों ने उसे अन्यत्र रिफर करना उचित समझा ।

                    घटना के दूसरे दिन शाम को सौन्दर्य को जब होश आया तो उसे पता चला कि वह भिलाई के एक निजी हॉस्पिटल मनोरम क्लिनिक के आई. सी. यू. में है । फिलहाल उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था । शरीर भर दर्द हो रहा था । आक्सीजन मास्क व अन्य मेडिकल इंस्ट्रूमेंट्स देख उसे घबराहट हो रही थी । तभी उसकी नजर कुछ ही दूरी पर डाॅक्टर से बात करते हुए मम्मी-पापा  पर पड़ी , तब उसे ठीक लगा ।

                    तत्पश्चात डाॅक्टर के इशारे पर सौन्दर्य के मम्मी-पापा उसके बेड के पास गए । सौन्दर्य को मम्मी-पापा की परेशानी समझ आ रही थी ; साथ ही , अपनी हालत देख उसे गलती का अहसास हो रहा था , पश्चाताप तले दबा जा रहा था ; सच आज बहुत दुःख हो रहा था उसे ; आँखों से लगातार आँसू झर रहे थे ।

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                            @ टीकेश्वर सिन्हा " गब्दीवाला "
                                 घोटिया-बालोद ( छ.ग. )

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