छत्तीसगढ़ के बालोद जिले का जनास्था पर आधारित - जय गढ़ियादेव बाबा मंदिर


लेख :
// लोकास्था का केन्द्र : जय गढ़ियादेव बाबा मंदिर //
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          छत्तीसगढ़ की वसुधा आस्था एवं विश्वास का ठौर है ; तभी तो यहाँ बहने वाली नदियों को माँ व देवी की संज्ञा प्राप्त है । पहाड़-पर्वत , पठार व शिलाखण्ड देवतुल्य माना जाता है । जनसामान्य के हृदय-तरंगिणी में श्रद्धा-भक्ति की अविरल धारा प्रवाहित होती है , जिससे उन्हें सुख , शांति व सुकून का अहसास होता है । सुंदर-सौम्य धर्म-धरा छत्तीसगढ़ में तैंतीस कोटि देवताओं का वास है ; और इसीलिए तो जनमान्यता कहती है कि यहाँ त्रेतायुगश्रेष्ठ श्रीरामचंद्र जी अपने वनवास काल में अपनी भार्या भगवती सीता एवं अनुज शेषावतार लक्ष्मण जी के साथ इन देवी-देवताओं का आशीष लेने पधारे थे । इसी परिप्रेक्ष्य में छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के आदिवासी बाहुल्य विकास खण्ड - डौण्डी के एक नामी गाँव - घोटिया के समीप स्थित गढ़ियादेव बाबा मंदिर स्थल अरण्यसंस्कृति को समेटे लोकास्था का केन्द्र बना हुआ है ।

गढ़़ियादेव बाबा : नामकरण :-
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          हमारे छत्तीसगढ़ का इतिहास बहुत प्राचीन है । छोटी-छोटी रियासतों का गढ़ रहा है छत्तीसगढ़ । ये रियासतें बड़े वीर व प्रतापी राजाओं की शासितभूमि रही हैं , जिन पर समूचे छत्तीसगढ़ का इतिहास गौरवान्वित महसूस करता है । इसी परिप्रेक्ष्य में जय गढ़़ियादेव बाबा मंदिर की निर्माण-संरक्षण समिति के एक जानकारी पत्रक के मुताबिक गढ़़ियादेव बाबा की व्युत्पत्ति काल बारहवीं शताब्दी रहा है । समस्त अंचल हिन्दू गोड़वाना कालिन राज्यसीमा क्षेत्र के गोड़वाना प्रांत पाना-बरस मोहला अंचल से सम्बंध रखता है ।  इस गोड़वाना प्रांत के प्रथम शासक राजा बलादसाह ने बलादगढ़ नामक राज्य की स्थापना की। कालान्तर में बलादगढ़ ही बलऊद हुआ , जो वर्तमान में बालोद शहर ( छत्तीसगढ़ का एक जिला ) के नाम से जाना जाता है । कहा जाता है कि राजा बलादसाह की सात रानियाँ थीं । राज्य की प्रतिकूल परिस्थिति आने पर सातों रानियों ने जल में डूबकर सती होने का प्रयास किया । छः रानियाँ डूब गयीं । दमयंती नाम की एक रानी को जीवित अवस्था में लेकर सात माँझी ( देवदूत ) प्रकट हुए । चूँकि रानी गर्भवती थी ; अतः उन्होंने उसे सुरक्षित स्थान देवपाण्डूम ले गये । वहाँ उन्होंने विश्राम किया , पर उन्हें उक्त स्थान रानी के अनुकूल नहीं लगा । फिर वे पारस पत्थर बहुतायत वैभवपूर्ण स्थान गुनियागढ़ चले गये । इसी जगह रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया , जिसका नाम दानेसिंह राय  रखा गया । पतिव्रता व सती रानी माँ दमयंती एवं सात दिव्य पुरुषों के संरक्षण तले राजकुमार दानेसिंह राय का बचपन बीता ; यौवन बीता । समय के साथ दानेसिंह राय गुनियागढ़ के वीर व प्रतापी राजा हुए । उनके पुत्र कल्याण साह व प्रपौत्र श्यामसाह ने वंश को आगे बढ़ाया । इसी काल में कुल चौदह गढ़ की स्थापना हुई , जिसमें आमागढ़ , कचारगढ़ व धनोरागढ़ प्रमुख हैं ।

            जनश्रुति के अनुसार एक बार गुनियागढ़ में मुगल सम्राटों का आक्रमण हुआ । भंयकर युद्ध हुआ । युद्ध के दौरान गोड़ नरेश गुनियागढ़ की पहाड़ी पर चढ़कर मुगल बादशाहों के हमले का जवाब दिया करते थे । पहाड़ी के नीचे विशाल पत्थर-खोल है , जिससे वे स्वयं की रक्षा करते थे ; साथ ही अपने अस्त्र-शस्त्र को छिपाने के लिये इसी खोल का उपयोग किया करते थे । यहाँ स्थित शिलाखण्डों की आड़ से शत्रु दल पर आक्रमण करते थे । चूँकि गोड़ नरेश भगवान शंकर जी के उपाशक थे । दृढ़ मूर्तिपूजक थे । युद्ध विश्राम के समय अपने ईष्ट देव शंकर जी के प्रति आस्था रखते हुए एक जगह पाषाणखण्ड को स्थापित कर पूजा-अर्चना करते थे । गुनियागढ़ राज्य के प्रति अपनी मातृभूमि स्नेह व ईष्टदेव भगवान महादेव के दैवीय आस्था के समन्वयक रूप विशाल प्रस्तरखण्ड को गुनियागढ़ देव के रूप में स्थापित किया । समय के साथ गुनियागढ़देव ही गुढ़ियागढ़देव हो गया और फिर गढ़ियादेव के नाम से जाना जाने लगा ; जिसे आज ' गढ़ियागढ़देव बाबा ' की संज्ञा प्राप्त है ।


पहुँच मार्ग :-
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          जिला मुख्यालय बालोद ( छत्तीसगढ़ ) समीपस्थ दक्षिण-पूर्व में स्थित प्रसिद्ध धार्मिक स्थल गंगा मइया मंदिर - झलमला से धमतरी मार्ग-चौक से घोटिया-डौण्डी मार्ग पर स्थित है - गढ़ियादेव बाबा मंदिर स्थल । इस पथ पर बालोद से तेरह किमी की दूरी पर अंचल-मशहूर दर्शनीय स्थल माँ रानीमाई व सियादेवी मंदिर स्थित हैं । यहाँ से आठ किमी की दूरी पर ग्राम - आमाबाहरा चौक , जहाँ पर एक चमत्कारिक जलकुण्ड मालीपानी स्थित है , की बाईं ओर गढ़ियादेव बाबा वाली पहाड़ी सीना ताने खड़ी है ।


भौगोलिक स्थिति :-
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          गढ़़ियादेव वाली पहाड़ी की ऊँचाई समतल भूमि से लगभग दो सौ फीट है । चार एकड़ के वृत्ताकार घेरे पर स्थित गढ़़ियादेव बाबा के मंदिर परिसर की दीवारें चट्टानों से बनी हैं । मंदिर-परिसर के प्रवेश द्वार की बाईं ओर उत्तर-पूर्व में गढ़़ियादेव का मूलरूप पाषाण खण्ड स्थित है । बगल में ही तीस फीट की दूरी पर ज्ञानदायिनी माँ वागीश्वरी का भव्य मंदिर है , जिसे सरस्वती शिशु मंदिर के प्रधानाचार्य श्री युधिष्ठर साहू ने बनवाया है । परिसर से लगभग तीन सौ फीट की दूरी पर पश्चिम में बालोद जिले की जीवनदायिनी तरंगिणी ताँदुला प्रवाहित है । गढ़़ियादेव मंदिर परिसर में हरे-भरे पेड़-पौधे एवं नीली-नीली गिरि श्रृँखलाओं से निर्मित नयनाभिराम दृश्य देखने को मिलता है । ऊँची पहाड़ी से समतल धरा की सतह की प्राकृतिक छटा बड़ी निराली लगती है । कलरव करते खगदल , कल -कल करती सरिता , खुशबू बिखेरते हुए विभिन्न काननपुष्प व विविधरंग तितलियाँ गढ़़ियादेव बाबा के मंदिर-परिसर के सौन्दर्य को और निखारते हैं । इस सघन वन्यक्षेत्र में कभी-कभार हिरण , बारहसिंगा , नीलगाय , भालू , खरगोश व कोयल , मोर जैसे वन्यपशु-पक्षी देखने को मिलते हैं । प्रवेश-द्वार के दक्षिण-पश्चिम में अज्ञात काल से  निर्मित एकछोटी सी बावली स्थित है । दक्षिण में देवेंद्र कुमेटी द्वारा निर्मित देवाधि देव महेश्वर का मंदिर है । इसके ठीक बगल में भगवान रूद्रेश्वर हनुमानजी का मंदिर है , जिसे प्रो. कमल राम साहू जी , प्राध्यापक ( महाविद्यालय - माहुद बी ) ने बनवाया है । परिसर के मुख्य द्वार पर दाईं ओर गढ़़ियादेव बाबा युवा-श्वेत अश्व पर सवार हैं । बगल में दो सिंहों की आकर्षक प्रतिमाएँ लगी हुई हैं ।


लोकमान्यताएँ :-
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               लोकांचल में काननसभ्यता व वन्यसंस्कृति के अनुरूप गढ़ियादेव बाबा के मंदिर परिसर के निर्माण एवं यथोचित संरक्षण के उद्देश्य से ' जय गढ़ियादेव समिति - घोटिया ( वन-पंडेल ) ' बनी हुई है , जिसमें क्षेत्र के बारह गाँवों - वनपंडेल , घोटिया ,पंडेल , सिंघनवाही , फागुनदाह , पद्देटोला , पेंन्ड्री , पचेड़ा , धोबनी , आमाबाहरा , मढ़वापथरा , मालगाँव के लोग तन-मन-धन से मंदिर निर्माण , सुश्रुषा व संरक्षण में लगे हुए हैं । सर्वविदित है कि अरण्यांचल की लोकसंस्कृति बड़ी रोचक व निराली होती है । पर्वत , पठार , नदी-नाले , तरु-दल व पाषाणखण्डों में जनविश्वास बसता है । लोकास्था रमती है । इसीलिए तो यहाँ विविध लोकमान्यताएँ खूब फूलती-फलती हैं । इसी तारतम्य में समिति-संरक्षक श्री चेतन साहू ग्रामपटेल घोटिया के अनुसार गढ़ियादेव बाबा की पूजा-अर्चना करने से अति व अल्प वृष्टि जैसे प्राकृतिक आपदाओं से अंचल की रक्षा होती है । वनपंडेल निवासी श्री प्रमोद सिंग्रामे ने बताया कि लोग अपनी दैनिक उपयोगी वस्तुएँ , मवेशियाँ आदि खो जाने पर गढ़ियादेव बाबा के शरण में जाकर श्रद्धापूर्वक श्रीफल व अगरबत्ती भेंट करते हैं ; फिर उन्हें सफलता हाथ लगती है । प्रसन्नता मिलती है । शिक्षक श्री रामचंद कौर ने संतान प्राप्ति की मनोकामना पूर्ण होने की बात बताई ; साथ ही मंदिर परिसर में महिलाओं का जाना वर्जित होने की जानकारी भी दी ।
               गढ़ियादेव बाबा जी के मंदिर परिसर में समिति सदस्य बारी अनुसार सप्ताह के प्रत्येक सोमवार व गुरुवार को सुबह-शाम दीप प्रज्जवलित करते हैं । वर्ष के क्वाँर व चैत्र मास के उगोना पाख के एकम् से नवमीं तिथि तक पूरा अंचल श्रद्धापूर्वक हर्षोल्लास के साथ नवरात्र का पर्व मनाता है । ज्योतिकलश की स्थापना होती है । मंदिर परिसर में अंचल की जस-सेवागीत मंडलियाँ अपनी प्रस्तुति देकर स्वयं को धन्य समझती हैं । दुर्लभ व सघन वन्यक्षेत्र में मंदिर होने के बावजूद श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है । मंदिर तक पहुँच न पाने की स्थिति में राह चलते लोग गढ़ियादेव वाली पहाड़ी को शीश नवाते हुए आगे बढ़ते हैं ।


सरकार से अपेक्षा :-
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               छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के प्रसिद्ध दैवीय दर्शनीय स्थल जय रानी माईं व सियादेवी मंदिर के ही मार्ग में होने के कारण तथा अपनी दैवीय लोकमान्यताओं के चलते गढ़ियादेव बाबा मंदिर अंचल में एक नामी देवस्थल के रूप में उभर रहा है । मंदिर परिसर के अधोतले विशाल प्रस्तरखोल पुरातत्व विभाग एवं प्राकृतिक शोधकर्ताओं के लिए एक अच्छा चुनिंदा विषय प्रकरण समेटा हुआ है । आधुनिक सुख-सविधाओं से जूझता हुआ यह दैवीय स्थल सरकार से यथोचित सहभागिता की अपेक्षा करता है , जिससे देवमंदिर-संरक्षण समिति को राहत मिल सकें ; तथा अंचल भी लाभान्वित हों ।                      
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@ टीकेश्वर सिन्हा " गब्दीवाला "
      व्याख्याता ( अंग्रेजी )
शास.उच्च. माध्य. विद्यालय- घोटिया
जिला - बालोद ( छ.ग. )

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