सावन के बदरा


सावन के बदरा झुमके लाए बहार
आग हे संगवारी हरेली तिहार।।
सावन के माह भोले के तिहार
बेल पाती और धतूरा के सिंगार
हरीयर लुगरा पहन की धरती करे श्रृंगार।।
बादर हा टूट के, धरा ला देथे पानी
रिमझिम रिमझिम बरसत हे पानी।।
टर्र टर्र नरियावत हे,मेचका ह करत हाका पारत हे, आगे का संगी  बरखा ए रानी, किसान के दानी, ।।जब्बर हे किसानी ग भैया
रेगत हे नागर ,बैला,  तुतारी धर के।
अब आगे का खेती,किसानी के बारी।
हरियर हरियर रूख हरिया गे, नदिया नरवा कल - कल बोहावत हे।
गेड़ी चढ़इइया लइका, मन हा गली खोर म नाचत गावत शोर मचावत हे।।


हरेली तिहार में संगी, चिला चौसेला, गुलगुला भजिया ला भोभला बंबा खावत हे।
गांव मा राउत भैया हा, माता देवाला डाहन जावत हे।
तेल हरदी ला चढ़ावत हे  गांव ला बनावत हे।।
हमर बहनी मनहा फुगड़ी, गुल्ली-डंडा ,तिरीपासा, गोटा,रेसटीप,अटकन मटकन खेलत हे,
प्रकृति के रंग मा रंग के,हरियर लुगरा, हरियर चुरी अव तन मन ला हरियर करके, हर हर भोले ला मनावत हे।
सावन के बदरा झुमके लाए बहार आगे का संगी हरेली तिहार।। 


                                सीमा साहू दुर्ग भिलाई✍️📝

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