छत्तीसगढ़ी कविता - कोन ओधा म रही जातेंव




चिरई  चिरगुन कस मंहू गोधा म रही जातेंव।
घर कुरिया मोर फुट गेहे जाने कोन ओधा म रही जातेंव।
चीज बस नई हे मोर कर नही ते ये दुख ल सही जातेंव।
हमर असन गरीब के भाखा कंहा कोन सुनथे, नही ते महु कही जातेंव।

जिनगी भर ब संउक मोर बुतागे, देखाय आवास के सपना अब पानी के रेला कस बोहागे।
माटी के घर बने रिहिस मोर फेर कोन जनि आवास योजना म कइसे मन मोर मोहागे।

गलती काखर हे तेला मय नई जानव फेर आज मने मन मय सोंचत हंव।
पानी बादर म भी झिल्ली ढांक के रहिथव अऊ रोये आंसू ल पोंछत हंव।
कभू कोरोना ल त कभू सरकार ल मय रोज दिन कोंसत हंव।

दुख ल मोर का कहव धरे नई धरावत हे।
करजा वाले मन मांगे बर रोज घर म आवत हे।
सेठ साहूकार मन घलो अब ब्याज ल बढ़ावत हे।
महिला समूह ले निकाले हंव पइसा त रोज दिन वहू मन चरचरावत हे।
का होगे रे आवास के पइसा ल खाता म नई तो आवत हे।

सचिव सरपंच कर जाथो त अधिकारी ल बताथे।
अऊ नेता मन कर जाथो त दुरिहच ले भगाथे।
बड़े बड़े काम करत हन कहिके सरकार अब बड़का पोस्टर लगाथे।
आने काम ल रोक लेते सरकार दुख हमर अब सहे नई जाथे।
समझाथंव मंहु कोरोना ल सरकार, तोरो कर कंही ले पइसा नई आथे।
फेर ऊंच निच करके घर ल मोरो बनाते, काबर की अब सांप बिच्छु के डर सताथे।

करजा ले बुड़े मय थोकन खाथव नई भरे मोर पेट।
कोन बताही मोला आवास के पइसा अउ कतिक हे लेट।
दुख ल मोर बतातेंव मोदी जी जब होतिस तोर सन भेंट।
मोदी जी मय देवत हंव नेवता आवव मोरो राचड़ के टूटहा गेट।
तुमन तो देवता हरो हमर बर त काबर करत हो अतका लेट।
अब दुलरवा घलो नई लिख सकय, सरकार कर दव थोकन चेत।

        दुर्गेश सिन्हा "दुलरवा"
         दुर्रे बंजारी (छुरिया)
            राजनांदगांव

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