छत्तीसगढ़ी कविता - बिहाव बाजा के पिरा




तोर बिना नई तो बने कोन्हों ह दूल्हा राजा।
फेर तोर दुख ल कोन ह समझही रे बिहाव बाजा।।
मंगल धुन के तंय ह बजईया तोर बिन नई तो दिखे कोन्हों नचइया।
दुलहिन ल देवाथस तंय गोंसइया, फेर तोर पेट के नई हे कोन्हों पोसईया।।
तेलचघनी परघवनी सबे नेग ल तही ह सजाथस।
बिहाव के झरत ले रे बाजा तही तो बजाथस।।
गजब मिठाथस बज के रे तंय गड़वा बाजा।
दोहा नई परे तोर बिन मड़वा म बिहाव बाजा।।
ढेड़हीन ढेंड़हा के बदल जथे तोर बजे ले बानी।
भांवर नई परे दुलहिन दुलहा नई पिये ममा मामी पानी।।
काबर समाये रे कोरोना, रोना होगे बाजा के जिनगानी।
ये बछर ह बर बिहाव बिन लगत हावे जइसे बेईमानी।।
मोहरी कहे सांस ह मोर टूटत हे, बिन बाजे परान ह मोर छुटत हे।
डफड़ा कहे कोन करिस ये लफड़ा, कलप कलप मन मोर पुछत हे।।
डमऊ कहे कब होही मोर समउ,बर बिहाव कोरोना म घुंचत हे।
बठेना कहे कब ठोंकहु बिहाव पार  मोरो जिनगी होगे अंधियार।
गोला कहे का होगे ये दुनिया ल भोला, तंही बता दे आज मोला।
लॉकडॉउन बढ़ा बढ़ा के हमला धरा देस भगवान तंय जुच्छा झोला।।
गुदुम कहे बिन बाजे दिन नई पहावत हे, दुख ह धरे नई सहावत हे।
बेंजो कहे धुन बाजतेंव महु आनी बानी, बिते बछर ह सुरता आवत हे।।
बजनिया के हांथ खाली होगे रोज कोरोना ल खिसियावत हे।
कलाकार मन के सुध ले ले सरकार "दुलरवा" ह गोहरावत हे।।

         दुर्गेश सिन्हा "दुलरवा"
          दुर्रे बंजारी (छुरिया)
             राजनांदगांव 

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