आलेख - *अख़बार,कलम और पाठक*




छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद प्रिंट मीडिया के अख़बार ग्रामीण क्षेत्रों में साहित्य से जुड़े कलमकारों को समय के साथ नित नए अवसर व मंच प्रदान कर रहे है । दैनिक अख़बार व साप्ताहिक पत्र पत्रिकायें पाठककों को जन सामान्य की ख़बर से रुबरु कराने के साथ ही आज साहित्य की विभिन्न विधाओं से भी लोगों का जुड़ाव व छत्तीसगढ़ साहित्य के प्रति अख़बार अपनी जिम्मेदारी सतत दे रही है। इससे हमारी छत्तीसगढ़ की भाषा साहित्य को सम्बल प्रदान हो रही है।और आज के आधुनिकता के दौर में हमारी परम्परायें संस्कृति इन अखबारों के माध्यम से युवाओं तक पंहुच रही है। और नई पीढ़ी छत्तीसगढ़ को करीब से समझ पा रहे है। साथ ही साहित्य लेखन में जुड़े कलमकार केवल कल्पनाओं में ही कलम नही चला रहे, बल्कि वनांचल की आदिवासियों की बदहाल जिंदगी का भी सुध ले रहे है। व उन आदिवासियों की परम्पराओ से जुड़ी नई नई घटनाए व रोचक बातें हम तक पहोंच रही है।और मानवीय पहुंच से दुर ऐतिहासिक स्थलों को भी निरंतर जन पटल में ला रहे है। और नये-नये पर्यटन स्थल, प्रकृति की अनुपम कारीगरी की जानकारी लोगों तक प्रसारित कर रहे है।

साहित्यकारों का अखबार से जुड़ाव तो पहले से ही रहा है परंतु  अधिकांश शहरों तक ही सीमित रहा है। लेकिन आज ग्रामीण क्षेत्रों से कलमकार जुड़ रहे है इसकी सबसे बड़ी फ़ायदा ग्रामीण अंचल के लोकलाकारों को मिल रही है। जो केवल मंचिय प्रस्तुतियों तक सीमित है और अपनी आर्थिक तंगहाली से गुरज रहे है। आज भी मीडिया की पहुंच से दूर है और सरकार की उदासीनता और उपेक्षा के शिकार है। जिनके बारे में अधिकांश कलमकार प्रखर रुप से लिख कर अपनी साहित्य के प्रति कर्तव्यनिष्ठ व जवाबदेही, जिम्मेदारी को निभा रहे है। और साहित्य के प्रति समर्पण की मूल भाव को जीवंत रखे हुए है। ऐसे जरूरतमंद या प्रतिभाशाली कला साधकों को अपनी आलेखों के माध्यम से जनमानस के आम पाठकों तक व सत्ता में काबिज लोगों तक अपनी संदेश अपेक्षा अनुरूप पहुंचा रहे है।
इस कार्य को मूर्तरूप देने में प्रमुखता से छत्तीसगढ़ के अखबारों व पत्र पत्रिकाओं में अग्रिम पंक्ति में दिखाई देने वाले प्रिंट मीडिया के प्रमुख अखबारों में हरिभूमि का साप्ताहिक चौपाल अंक, दैनिक भास्कर का साप्ताहिक संगवारी अंक, देशबंधु का साप्ताहिक मड़ई अंक, पत्रिका का साप्ताहिक  पहट अंक और दैनिक दावा में प्रकाशित प्रति दिन का विश्लेषण अंक जिसमें पुरी तरह से छत्तीसगढ़ की साहित्य को पोठ करने की बीड़ा उठाई है। वंही राजनांदगांव से मार्च माह से प्रकशित केवल और केवल कला और साहित्य को समर्पित साप्ताहिक पत्रिका लोककला दर्पण जो सहज रुप से पाठकों तक उपलब्ध हो जाती है और खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जुड़ाव भी सुलभ है। वैसे तो छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी साहित्य को समर्पित अनेक और भी पत्र पत्रिकाएं है। जो इस ओर निरन्तर कार्य कर रहे है।

समय के अनुरूप अखबार भी आज के आधुनिक टेक्नोलॉजी के साथ अपनी अस्तित्व को बरकरार रखी हुई है। लेकिन हमें प्रिंट मीडिया की उस पहलू पर भी विचार करना होगा की हमारी अख़बार आज व्यपारिक दृष्टि से देखे तो आर्थिक रुप से कमजोर हो रही है। क्योंकि आज का दौर मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इर्दगिर्द केंद्रित है।
इस पर शासन स्तर पर सार्थक व अखबारों के हित में उचित क़दम उठाये जाये ताकि निकट भविष्य में अखबार और पाठकों के बीच निरन्तर सेतु समन्वय बनी रहे।

                      -  आलेख -
               दुर्गेश सिन्हा "दुलरवा"
                दुर्रे बंजारी (छुरिया)
                    राजनांदगांव 

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