*झन काटव पेड़*

 

कट जाथंव तभो ले मय उलहो के  हवा देथंव।
रुख राई अंव जी झन काटव मोला बीमारी ले बचे के दवा देथंव।।
तुंहरे परान बचाय बर मय फोंकिया के  डारा  नवा देथंव।
मउंहा देथंव झउंहा देथंव फेर तुंहर मन ले मय का लेथंव।
बिगड़े हवा करिया धुंवा ल अपन आप म सोंख लेथंव।।
रोज दिन मोला काटत हव फेर अपनेच लईका आय कहिके समोख लेथंव।
बारी बियारा ल रुंधे बर रुंधना देथंव डबका के पानी भात रांधे बर अंधना देथंव।।
बर बिहाव बर मुंड़ा अऊ नांगर फांदे बर जुंड़ा देथंव।
राखत रहिथव घर ल तुंहर बन के खइरपा बेड़ी।
लईका मन बर बांस के सुघ्घर बंथव मय गेंड़ी।
आमा देथंव अमली देथंव अऊ देथंव बम्भूर म फरे पइरी।
बेटी बेटा कस समझव महुं ल तुंहर टंगिया आरी म तन मोर पिराथे गज़ब बइरी।।
               


                                      ✍️ रचना✍️
                               दुर्गेश सिन्हा "दुलरवा"
                                दुर्रे बंजारी (छुरिया)
                                     राजनांदगांव

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