आलेख - उत्कृष्ट कला नक्काशी के लिए मशहूर है राजिम के मंदिर



आवरण कथा                      
प्राचीन कालीन राजिम नगरी में 84 मंदिरों का उल्लेख मिलता है। यहां के मंदिर सातवीं सदी से लेकर 14वीं सदी के मध्य बनाए गए हैं। प्रत्येक मंदिरों में उत्कृष्ट कला नक्काशी की गई है जो देखते ही बनती है। खासतौर से इतिहासकार, कलानुरागी व वास्तु शास्त्रियों के लिए यह कौतूहल का विषय बन जाता है। शैव, शाक्त एवं वैष्णव धर्मावलंबी बड़ी संख्या में राजिम पहुंचकर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। माघ पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक 15 दिनों के लिए प्रदेश का सबसे बड़ा राजिम पुन्नी मेला लगता है। जिसमें श्रद्धालु गण कुं मेला जैसे अवसर प्राप्त करते हैं। संतों का प्रवचन, स्नान, दान, दर्शन, पूजन, आरती, परिक्रमा इत्यादि गतिविधियां लोगों को धर्म अध्यात्म में डुबो देती है।



                                
प्रसिद्ध राजीवलोचन मंदिर 
                         
संगम के तट पर पूर्व दिशा में गवान श्री राजीवलोचन का व्य मंदिर छत्तीसगढ़ के प्राचीन मंदिरों में से एक है। ईटों का यह मंदिर राजीवलोचन अर्थात गवान विष्णु का है इसके विमान के द्वार की चौखट सुहावटी तथा सामने का गोपुर बहुत सुंदरता से उत्कीर्ण है। मंदिर के अंदर दो शिलालेख है जिनमें एक नलवंशी नरेश विलास तुंग का है भित्ति पर प्रदर्शित दक्षिण कौशल के परिवर्ती नल वंश का एकमात्र ज्ञात अभिलेख है इसमें विलास तुंग द्वारा अपने स्वर्गवासी पुत्र की पुण्याभिवृद्धि व उनकी स्मृति को अच्क्षुण्ण बनाए रखने के लिए विष्णु के विशाल मंदिर के निर्माण का वर्णन है। प्रारं में सरस एवं वमय स्तुति है इसके पश्चात महाभारत में वर्णित  नरेश राजा नल की कीर्ति का वर्णन करते हुए विलासतुंग के वंश का सह सम्बन्ध निरूपित किया गया है। तिथि रहित इस अभिलेख की भाषा संस्कृत तथा लिपि कुटिल नागरी में है। लिपि के आधार पर इसे सातवीं सदी ईसवीं मानी जाती है। दूसरा शिलालेख संवत् 896 अर्थात 1148 ईसवी के माघ मास शुक्ल पक्ष की रथाष्टमी दिन बुधवार को लिखा गया है। महामंडल 12 खंभों से टिका हुआ है जिसमें श्रेष्ठ मूर्तिकला का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है।  दायीं ओर राधा कृष्णा, श्रीजय, नृसिंह अवतार, गंगा मैया, सीता माता, त्रिजटा, तारा देवी और बायीं में लक्ष्मी मांए श्री विजय, वराह अवतार, जमुना मैया, कल्याणी देवी, मां दुर्गा एवं सामने गरुड़ जी बैठे हुए हैं। गर्भागृह में गवान राजीवलोचन खड़े मुद्रा में विराजमान है जो देखते ही बनती है। मंदिर में परिक्रमा पथ के लिए विशेष स्थान दिया गया है परिक्रमा पथ में भी देव विराजमान है। तथा रसोई कमरा की भी व्यवस्था की गई है। ललाटबिंब में मूर्तिकला का सर्वश्रेष्ठ नमूना है। 
              
कुलेश्वरनाथ महादेव मंदिर 
                               
सोंढुर, पैरी एवं महानदी के बीच में कुलेश्वर नाथ महादेव का व्य मंदिर निर्मित है। नदी के बीच में मंदिर का निर्माण अपने आप में एक विलक्षण उदाहरण है। यह शिवलिंग पंचमुखी है इनका दर्शन विश्व के गिने-चुने स्थानों में ही होती है। 17 फुट ऊंची अष्टभुजाकार जगती के ऊपर यह मंदिर निर्मित है। मंदिर में मुख्य रूप से तीन अंग है महामंडप, अंतराल और गर्भागृह। महामंडप में एक शिलालेख उत्कीर्ण है जो वर्तमान में स्पष्ट नहीं है। इस लेख की पांचवीं पंक्ति में संगम का उल्लेख मिलता है। एक ही महामंडप से संबंध दो गर्गृह वाले वस्तुओं की यह योजना अपने आप में सर्वथा विलक्षण है। छ: खंम्भों में महा मंडप टिका हुआ है जिसमें काल भैरव, महाकाली, मां शीतला, मां पार्वती, श्याम कार्तिकेय एवं शनिदेव की प्रतिमा प्रतिस्थापित है। गर्गृह में कुलेश्वर नाथ महादेव लिंग रूप में विराजमान है। माना जाता है कि सीता मैया रामायण काल के दरमियान लोमस ऋषि से मिलने के लिए राजिम पहुंचे और अपने आराध्य देव की आराधना के लिए सुबह स्नान कर रेत से शिवलिंग का निर्माण किए और जल डालकर उनका अभिषेक किया। अभिषेक पांच ओर से बहने लगे जिसके कारण इसका नाम पंचमुखी कुलेश्वर नाथ महादेव पड़ा। 

                

                                  
आदि शक्ति दुर्गा माता

कुलेश्वरनाथ महादेव मंदिर से ही लगा हुआ दूसरा गर्गृह में मां दुर्गा अष्टभुजाकार बैठी हुई है और क्तों को आशीष दे रही है।  इसी से लगा हुआ गंगा मैया, बजरंगबली और करीब ही राम जानकी की प्राचीन कालीन मूर्ति प्रतिष्ठित है। घंटियों की झंकार से यह स्थल हमेशा गुंजित रहता है।

पांच सौ वर्ष पुराना पीपल का वृक्ष 

ईश्वर ने सबके लिए आयु का निर्धारण किए हैं लेकिन कुलेश्वर नाथ महादेव के चबूतरा में करीब 550 वर्ष पुराना पीपल का वृक्ष है जो इनकी सुंदरता में चार चांद लगाए हुए हैं। पीपल वृक्ष के चारों कोण में देव विराजमान है जिसमें प्रमुख रूप से गंगा मैया, विष्णु जी एवं बजरंग बली आदि देवता विराजमान हैं।                

पालथी मारकर बैठे हैं नंदी                                नंदी जी गवान भोलेनाथ का सवारी  है जहां जहां भोलेनाथ की उपस्थिति रहती है वहां नंदी जी भी रहते हैं और भोलेनाथ के कार्यों को सरलता से करते हैं। विद्वानों का कथन है कि भोलेनाथ से जो मन्नत मानी हो उसे यदि नंदी जी के कान में चुपके से जाकर कह दे तो मनौती अतिशीघ्र पूरी होती है इसलिए क्तगण जब भी भोलेनाथ के दर्शन करते हैं नंदी को अपनी बात बताना नहीं भूलते और इनकी भी पूजन अर्चन करते हैं।                           
जगती में तीन तरफ सिढ़ी 
                        
कुलेश्वर नाथ महादेव मंदिर का चबूतरा सीढ़ियों से घिरा हुआ है। प्रवेश करने के लिए पूर्व दिशा में सीढ़ी है तो उत्तर दिशा में भी सीढ़ी है और छोटे आकार में दक्षिण दिशा में भी सीढ़ी बनी हुई है अर्थात तीन और से भोलेनाथ तक पहुंचा जा सकता है। भोलेनाथ हमेशा अपने माथे पर तीन लकीरों वाली त्रिपुंडी  लगाते हैं। भोलेनाथ पर तीन पत्तियों वाली बेलपत्र भी चढ़ाया जाता है। तीन का संकेत बड़ा ही शु माना गया है।                                                         
साक्षी गोपाल मंदिर 
                              
राजीवलोचन मंदिर  से लगा हुआ साक्षी गोपाल का  मंदिर है। साक्षी गोपाल का मंदिर राजिम में होना इस बात को प्रमाणित करता है की आपका दर्शन कभी निरर्थक नहीं जाएगा। गवान राजीवलोचन व अन्य देव के दर्शन के पश्चात साक्षी गोपाल का दर्शन बहुत ही शु माना गया है।                                         
महाप्रभु जगन्नाथ मंदिर  
                            
राजीव लोचन मंदिर से करीब 50 फीट की दूरी पर द्वितीय परिसर में उत्तर दिशा की ओर जगन्नाथ का प्राचीन मंदिर है। गर्गृह में बलद्रए सुद्रा एवं जगन्नाथ गवान विराजमान है। इनकी मूर्तियां देखते ही बनती है जो मन को मोह लेती है। करीब डेढ़ फीट जगती पर निर्मित इस मंदिर में परिक्रमा पथ के लिए रपूर स्थान दिया गया है। भूमि विन्यास की योजना के अनुसार यह मंदिर वास्तु परंपरा में बनाया गया है। राजीव लोचन के दर्शन  पश्चात जगन्नाथ का दर्शन करना अनिवार्य माना जाता है। जो प्रसाद उड़ीसा के जगन्नाथ में चढ़ाया जाता है वही राजिम के राजिवलोचन मंदिर में भी चढ़ते हैं अर्थात राजिम और पूरी में बहुत कुछ समानताएं देखने को मिलती है।                        

चारों कोण में स्थित है मंदिर 
                           
राजीव लोचन मंदिर के चारों कोण में मंदिर विराजमान है जिसे चारों धाम कहा जाता है। उत्तर में बद्रीनारायण, पूर्व में वामन अवतार, दक्षिण में वराह अवतार, पश्चिम में नृसिंह अवतार गवान का मंदिर बना हुआ है। मंदिर की ऊंचाई करीब 25 से 30 फीट तक है मंदिर के द्वार में श्रेष्ठ मूर्ति कला का उदाहरण देखने को मिलता है, इसमें महामंडल व अलग से ललाट बिंब के लिए कोई स्थान नहीं दिया गया है। गर्गृह में देव की मूर्तियां बड़ी आकार में है जो मन को मोह लेती है।                                                    
राज राजेश्वर नाथ महादेव मंदिर
                         
राजीव लोचन मंदिर के सामने प्राकार से बाहर तथा द्वार प्रकोष्ठ से हटकर पूर्वाभिमुख अवस्था में यह मंदिर निर्मित है। गर्गृह में महादेव लिंग रूप में विराजमान है इन्हें स्वयंभू शिवलिंग कहा जाता है। यहां आने से मन को शांति मिलती है। प्रतिदिन यहां पूजन अर्चन का कार्यक्रम चलता रहता है।                             
दान-दानेश्वर नाथ महादेव 
                
राजीवलोचन मंदिर के दूसरा परिसर में राज राजेश्वर नाथ महादेव मंदिर के दक्षिण में लगग सेट कर दान-दानेश्वर नाथ महादेव का मंदिर जगती दल के ऊपर निर्मित है। मंदिर के सामने नंदी महाराज बैठे हुए हैं जो शैव क्तों को हमेशा अपनी और आकर्षित करती है। इसके चार अंग है नंदी मंडप, महामंडप, अंतराल और गर्गृह।                                                    
भूतेश्वर नाथ महादेव मंदिर  
                       
यह मंदिर नदी तट पर पंचेश्वर नाथ महादेव मंदिर के बाजू में स्थित है। कलचुरी कालीन मंदिर वास्तुशिल्प की परंपरा के अंतर्गत चौदहवीं शताब्दी में बनाया गया है। गर्गृह में 3 से 4 फुट ऊंची शिवलिंग है। यह प्रयागराज का सबसे बड़ा शिवलिंग है, इनकी उपासना करने से आत्मिक शांति मिलती है।                              
पंचेश्वर नाथ महादेव मंदिर   
                  
यह मंदिर नदी के तट पर स्थित है प्राचीनता की दृष्टि से यह रामचंद्र देवल के बाद का माना जाता है। अन्य मंदिरों की भांति चबूतरे पर बनाया गया है इसका निर्माण कलचुरी काल में बनाए गये  वास्तुशिल्प  का श्रेष्ठ उदाहरण है। गर्गृह में शिवलिंग स्थापित है तथा सामने तुलसी का पौधा पल्लवित हो रही है। इसे मामा भांचा मंदिर भी कहा जाता है।  
                    
रामचंद्र देवल                                            रामचंद्र का मंदिर राजीव लोचन मंदिर से अलग हटकर करीब 500 गज की दूरी पर बनाया गया है। यह मंदिर चित्रकारी वास्तुशिल्प आदि की दृष्टिकोण से अत्यंत मनमोहक है महामंडप में प्रत्येक मूर्ति कला पर श्रेष्ठ नमूना प्रस्तुत किया गया है। गर्गृह में राम, लक्ष्मण एवं सीता मैया की मूर्तियां स्थापित है यहां भी परिक्रमा पथ के लिए स्थान दिया गया है। प्राचीनता की दृष्टिकोण से इस मंदिर को अत्यंत प्राचीन माना गया है। मंदिर के सामने ही हनुमान जी का मंदिर छोटे आकार में है तथा कुछ खंडित मूर्तियां भी सामने रखी हुई है।                                                           
सोमेश्वर नाथ महादेव मंदिर
                       
ब्रह्मचर्य आश्रम के प्रांगण में सोमेश्वर नाथ महादेव की अति प्राचीन मंदिर में शिवलिंग विराजमान है यह स्थान पुराणों में उल्लेखित स्वर्ण तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। महादेव जी अपने समस्त रूद्र परिवार के साथ पधारे हैं श्री काल, गणपति, नंदी, योगिनी, यक्षिणी, उत्तराभिमुख गणपति, दक्षिणाभिमुख हनुमान जी और नागों की सुंदर प्रति मा को गरूड़ अपने पंजों में बांध रखा है। एक प्राचीन ग्रंथ के अनुसार यहां राजा सोम द्वारा किए जाने वाले यज्ञ का भी उल्लेख मिलता है। मंदिर के सामने गुफा है जिसमें मां काली विराजमान है तथा द्वार पर पार्श्र्वनाथ गवान की मूर्ति है। जैन धर्मावलंबी इनकी पूजा-अर्चना करने के लिए प्रतिदिन आते ही रहते हैं।  
                 
लक्ष्मी नारायण मंदिर 
                             
राजीव लोचन मंदिर के मुख्य द्वार से डेढ़ सौ गज की दूरी पर स्थित लक्ष्मी नारायण मंदिर को अन्य मंदिरों से बाद में बनाया गया है। इसमें चित्रकारी आधुनिक है मंदिर की सुंदरता अत्यंत मनमोहिनी है। गर्गृह में लक्ष्मी नारायण गवान की प्राचीन मूर्ति विराजमान है। यहां परिक्रमा पथ के लिए भी स्थान दिया गया है और मंदिर के पीछे में बावली है। सिढ़ी से उतरकर श्रद्धालु गण बावली के पानी को पवित्र मानकर पान करते हैं।                                                    
दत्तात्रेय मंदिर                                           
गरियाबंद रायपुर रोड पर स्थित दत्तात्रेय मंदिर महामाया चौक में स्थित है। बताया जाता है कि यह मंदिर 400 वर्ष पुराना है। संत ज्वालानंद गिरी गोस्वामी ने इस मंदिर का निर्माण किया था जहां गोस्वामी समाज के साथ ही पर्व में नागा साधु आकर इनकी पूजन आराधना में तल्लीन रहते हैं। गर्गृह में गवान दत्तात्रेय विराजमान है। शास्त्रों में बताया जाता है कि दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाए थे और उन्होंने यह बताने का प्रयास किया कि ज्ञान जहां से मिले उसे प्राप्त कर लेना चाहिए। 

आदिशक्ति मां महामाया मंदिर                                    
महामाया मंदिर में देवी क्त हमेशा आकर पूजन अर्चन कार्य में लगे रहते हैं यह मंदिर अत्यंत सुंदर है ईट व पत्थरों से  मंदिर का निर्माण किया गया है। द्वार पर पड़े पत्थरों का उपयोग किया गया है। गर्गृह में मां महामाया की मूर्ति है जो अपने क्तों पर हमेशा कृपा बरसा रही है। नवरात्र के दोनों पर्व पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के द्वारा आस्था की ज्योत जलाई जाती है। पुन्नी मेला में 15 दिनों के लिए यहां खासतौर से पूजन आराधना की जाती है।                       
बाबा गरीबनाथ महादेव मंदिर 
                          
गरीबनाथ महादेव मंदिर रानी धर्मशाला में स्थित है शिवलिंग समतल भूमि से 2 फीट नीचे है। जहां बाबा गरीबनाथ लिंग रूप में विराजमान है। जनश्रुति है कि एक बार रानी श्यामकुमारी देवी जनता के हित की बात को लेकर भोपाल जा रही थी तभी वह इस स्थान पर रुकी थी यहां उन्होंने बाबा गरीब नाथ के शिवलिंग को देखा तो वह प्रभावित हो गई और यहां पर उन्होंने व्य मंदिर का निर्माण कराया। शिवलिंग के उद्भव के संबंध में चर्चा है कि एक किसान इस स्थल पर हल चला रहा था, भी उनको यह शिवलिंग दिखा और धीरे-धीरे बात फैल गई। लोगों ने इन्हें गरीबों का शिवलिंग कहा और इनका नाम गरीबनाथ पड़ गया।                               
राजिम भक्ति तेलीन मंदिर
                            
यह मंदिर पश्चिम दिशा से प्रवेश द्वार से लगा हुआ है। इस मंदिर के लिए अलग से स्थान दिया गया है इनका निर्माण शैली को देखते हुए इन्हें कलचुरी काल के बाद का माना जा सकता है। महामंडल बड़े आकार में हैं वहीं गर्गृह में राजिम तेलीन के द्वारा कोल्हू के बैल से तेल निकालते हुए शीलापट्ट पर चित्र दर्शाया गया है तथा महादेव के शिवलिंग भी है। माना जाता है कि राजिम तेलीन के नाम से ही इस नगर का नाम राजिम पड़ा, जिन्हें गवान राजीवलोचन की मूर्ति शीला रूप में मिली थी और वह उसे घर ले आई। बाद में यही मूर्ति राजीव लोचन मंदिर में स्थापित किया गया।
                                   
छोटे राजीव लोचन मंदिर 
      
रामचंद्र देवल से तकरीबन 200 गज की दूरी पर बना हुआ है मंदिर व्य है तथा यह मूर्ति पद्मा तालाब में खुदाई के दौरान मिली थी जिसे मंदिर में लाकर बिठाया गया है और इनका नाम छोटे राजीव लोचन है। यहां प्रतिदिन दर्शन पूजन कीर्तन इत्यादि के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु क्तगण उपस्थित होते रहते हैं।                    


                                                                                                           संतोष कुमार सोनकर मंडल
                                                                                                          
चौबेबांधा-राजिम                         
                                                                                                    
पोस्ट बरोन्डा, जिला-छत्तीसगढ़, पिन- 493885  
                                                                                                            मोबाइल-89599 89419
                                                       

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