छत्तीसगढ़ी कविता - *शिवनाथ नदी के पिरा*


गंगरेल कस मुहाटी जघा - जघा ले बंधातेव।
महू शिवनाथ भुइयां के पियास ल बुझातेव।
होतिस कंहू मुहू त बोल के बतातेव।
290 कि.मी. बिरथा नई बोहातेव
परिया परे खेत खार म अन्न  उपजातेव।।
महू शिवनाथ ............

कोडगुल गोडरी ले गिरत हपटत आथव।
सरलगहा बोहा जाथव कंहू नई थिराथव।
मोंगरा के धार बोहावत मोहारा म जाथव।
नांदगांव के मनखे ल पानी पियाथव।
भरे गरमी म मय ह सुख्खा पर जाथव।।
महू शिवनाथ..........

गरीबी जरत भोम्भरा के दुख होथे तुंहर भारी।
मोर कोरा म पानी छेकव बोवव बखरी बारी।
हरियर लुगरा महतारी ल देवव बोके धान ओनहारी।
जतन कर ले भुइयां के "दुलरवा" होही तोर चारी।
शिवनाथ कहा के अनाथ हव बोहा के जाथव दूसर दुवारी।।                     
                  ✍............
             
              दुर्गेश सिन्हा "दुलरवा"
               दुर्रे बंजारी (छुरिया)
                  राजनांदगांव 

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