ग्रामीण परिवेश के अंतर्गत एक निश्छल औरत , सरल-सहज व्यक्ति एवं एक सच्चा मित्र के मानवीय व्यक्तित्व को उजागर करती छत्तीसगढ़ी कहानी


नवा बिहान


" का करत हस भवजी...? " हूँद करावत रोहित ह पदुम घर निंगीस । वो जानत-राहय की पदुम अभी घर मं नइ कहिके । वोत्काच्जान वोला दतुअन चाबत तरिया जावत रोहित ह देखे राहै । परछी के बिजली बोर्ड मं फँसे चारजर मं अपन मोबाइल ल लगाइस । दू-चार ठन मेथी-डेंटरा ल मुरकेटत रँधनी कुरिया ले रूपा भवजी हर निकलीस  - " बइठ मास्टर बाबू बइठ । अभिच् तोर संगवारी ह ये दे सेम्ही ल टोर के चन्नी मं रखिस हे । अउ तरिया गियीस तइसे लागथय , काबरकि टावेल मोला माँगिस हे । कुरसी मं माढ़े हँसिया ल टारिस । कुरसी ल फरिया मं पोंछिस । रोहित बइठीस । रूपा ह रोहित के टूप-टूप पाँव परत कथय - " सब बने-बने बाबू , कब आयेस , हमर देरानी अउ लइका मन घलो आय हे ? मुस्कवात पूछते राहय की होगे , तुमन रहिथव तेन गाँव के मड़ई हर होगे ।  हमर गाँव के मड़ई ह परन दिन हवय तइसे लागथय । काली तरिया मं गोठियावत रिहिंन की मड़ई के हाँका पर गे कहिके । " रोहित ह रूपा के गोठ ल सुन-सुन के मुस्कावत राहै । रूपा के तो मुहूँ रितच न इ राहै । हाँसते-हाँसत गोठियाय अउ गोठियाते-गोठियात हाँसै । रोहित ल घलो कोनों अस्कट नइ लागत राहै । वो तो जानत राहय की रूपा हर अबड़ गोटकारिन आय तेन ला । मुस्कई अउ वोकर हँसई चेहरा ला सब जानै । वो कभू कुछू जिनीस के रोना नइ रोवय । वोला कोनों ले कोई सिकैत नइ राहै । थोरिक टाइम ले रोहित बइठीस । गोठे-गोठ मं रूपा अबड़ गोठिया डारिस । चहा घलो बन गे । पियीस रोहित ह अउ , " बइठ भवजी , पदुम आही त आहूँ । मोबाइल ह चारजर मं लगे भवजी... " काहत घर ले निकलीस ।

               घर आ के दुवार मं रोहित ओइरछा के खाल्हे मं बइठीस । उही मेर माढ़े एकठिन कार्ड मं वोकर नजर गीस । छट्ठी-नेवता के कार्ड आय । कार्ड ल पढ़त-पढ़त वोला हुरहा पदुम अउ रूपा के सुरता आगे । एकोझन लोग-लइका नइ राहय इँकर । सतरा बछर पूरा हो जाही इही अपरेल आही ताहन , इँकर बिहाव होय । रोहित ल पक्का सुरता हे की , इँकर अउ अपन बिहाव के , एके लगन मं मँड़वा गड़े रिहिस हे । येमन दूनों एक-दूसर के बरात नइ जा पाय रिहिंन । आज पदुम अउ रूपा के लोग-लइका रतिंन ते , रोहित के लोग-लइका के उमर के होतिन । पदुम अउ रूपा ल देख के रोहित ल बड़ा दुख लागै । रोहित के दाई ह ये मन याने पदुम अउ रोहित ल छै-छै महिना के नान्हें-बड़े बताय । इँकर घर के छानी बिल्कुल जुड़े राहै । एक्केठन घर असन लगै । संघरा पलिंन , बढ़िंन , खेलिंन संघरा । दूनों संघरा पढ़िन घलो ।कक्छा दसवीं मं पदुम फेल होइस , ताहन पढ़ई छोंड़दीस ।  पदुम अपन बाप-महतारी सन काम-काज मं लग गे । वोकर माँ-बाप घलो आरुग सिधुवा । एक साल के सावन मं गा्व मं हैजा फइलीस । पदुम के बाबू सरजू हर बीमारी के चपेट मं आगे । अबड़ इलाज-विलाज कराइन । नइ बाँचिस । महतारी भर रहिगे । दूनों महतारी-बेटा राहँय , खेती-किसानी , रोजी-मजूरी करैं । तेईस बरस के उमर मं पदुम के बिहाव होइस । तीन झन होगे अब । कमावन-खावन लागिंन ।

                 पदुम के बिहाव होय पाँच बछर बीत गे । इही बीच मं महतारी अघनी घलो परलोक सिधार गे । अब दूनों परानी रहिगें । इँकर एकोझन लइका नइ आइस । रोहित के जोंड़ के संगवारी मन अकसर गोठियाँय की कइसे इँकर अतिक दिन ले बाल-बच्चा नइ आइस । रोहित के घलो हिम्मत नइ होइस , पदुम ल येकर बारे मं कुछू कहे या कुछू पूछे के , पर रोहित के जहुँरिया मन हर काहँय , की इँकर मन के बढ़िया जमथय , रोहित ल चाही की येकर सम्बंध मं कुछू बने असन रद्दा बतातिस नहिं पदुम ला , पर अइसन मामला मं कोनों ल कुछु कहवई मामूली बात नोहे , काबरकि कोनों मरद जात के अइसन बात ले वोकर मरदानगी ल ठेस पहुँचथय । काकरो उँगली करई , उँगली उठई , टीका-टिप्पनी करई , वोकर दिल-दिमाक ल झकझोर के रख देथँय । रोहित जानय , इँकर हिरदय के दुख ला , भले इँकर दूनों के बीच अइसन बात के सम्बंध मं कुछू बात नइ होवय । ये मामला मं पदुम घलो हमेसा चुप राहय , पर वोकर चुप्पी मं बेचयनी राहै । रूपा हर तो जनम के हँसोड़िन । लह-लहलहिन रूपा आय , पर कभू-कभू जब लोग-लइका के गोठ कहूँ हो जाय त रूपा के मुस्कान ह थोरिक बेर बर लुका जाय । हर माईंलोगिन के हिरदय के एक कोना ह अपन खुद के अवलाद बर होथय । महतारी बनई ह हर माईंलोगिन के सपना होथय । ये बात सोला आना सही ए की आवरत के कोख के हरियाये ले वोकर आवरतपना हर सारथक होथै ।

                   रोहित मने-मन सोंचत-गुनत कार्ड ल पठेरा मं मढ़इस । वोत्काबेर पदुम आइस माखुर गठत । रोहित करा आके झर्रइस । खर-खरा गे । रोहित छींक डारिस । " कइसे मजा आइस जी ...येला ला चबाके तो देख , कतिक सुवाद हे तेन ला , का मजा हे तेन ला । अड़बड़ गुन हवय येकर..." ठट्ठा करत हाँथ मिलइस । परछी के बेंच मं दूनों संगवारी बइठिंन । घर मं तो अउ कोनों नइ राहैं । रोहित के दाई ह बखरी मं राहै । पदुम ह रोहित ल हालचाल पूछिस । दूनों झन गाँव के गोठ गोठियाइन । येती-वोती के गोठ चलिस । दूनों-क-दूनों हाँस-हाँस के गोठियात राहँय , पर रोहित के दिमाक मं चलत राहय पदुम ल कुछु कहे के । ले-दे के रोहित ह अपन करेजा ल सोझियावत किहिस - " यार पदुम , अतिक दिन ले मँय तोला कुछू नइ कहेंव जी , गलत झन समझ बे । बूरा मत मान बे । काहँव का...? "
                  " ले ना  कहा ना , का बात ए ..जी..? " अपन दूनों हँथेली ल अपन जाँघ मं रखत किहीस । रोहित कथय - सोला-सतरा बरस होगे भाई , छट्ठी चाय कब पिया बे जी..? "

               रोहित के गोठ ल सुन के पदुम मुस्स ले कर दीस । वोकर मुस्कई मं एक पीरा लुकाय अस दिखीस । रोहित फेर कथय -  " नहीं...का हे कि...कुछू... कोनों बात होही ते बताना गा , देख भाई गलत झन समझ बे । कुछू कहे के लइक हो ही अउ बताना चाहत होबे तभे बताबे भाई ....येमा कोनों...? "

              " नहीं... नहीं... अइसे कउनों बात नइ हे..." काहत बेंच मं पालकी मार के बइठीस । यार रोहित ,  बहुत इलाज करायेंन जी हमन । गाँव के डाक्टर मेर चल देये हन । वोकरो करा ले अबड़ दवई- बूटी खायेंन । नवाँगाँव के बंगाली डाक्टर करा घलो चल देये हन । मुँड़पार के ठेठवार डाक्टर करा ले घलो आगे हन । बइगा-वइगा के चक्कर काँट डारे हन । भठरी करा गिरहा टोरवा डारेहन । देव-धामी मं बदना बद डारे हन । अब कायेच् करबोंन  , हमर किसमत खराब हे तेन ला । अब हमर तकदीर मं बाल-बच्चा के सुख नइ हे जी । " गोठियात-गोठियात वोकर जुबान मं नरमी छागे । थोरिक बेर ले दूनों चुप रिहिंन । रोहित के भाखा फेर निकलीस - " ठीक हे पदुम , बहुत इलाज-पानी कराय हव । एक कोसिस अउ कर लेव । का हे की..." काहत रोहित चुप होइस । पदुम तको कलेचुप राहै । पता नहीं रोहित ल अइसे लागत राहय की इँकर इलाज बने ढंग ले नइ होय हे । अच्छा सही ढंग ले ये मन ल कोनों ठीक-ठाक बतइया नइ मिलिन। रोहित अहू घलो सुन डारे राहय की इँकर जात-गोतियार मन ये मन ल निपूती जोंड़ी कहिके ताना मारैं । बटइत मन के इँकर सम्पत्ति मं नजर राहै । पदुम के काकी-कका मन हर ये मन ल अपन खानदान के कलंक कहिके घलो सुनावैं । बटइत देरानी-जेठानी अउ दिगर माईंलोगिन मन रूपा ल बाँझ काहैं । सुन-सुन के चुप्पी ल अपन जिंनगी मं सामिल कर लेये रिहिस हे रूपा हा , अउ फेर तभो ले खुस । तभेच् रोहित ल अपन इस्कूल गाँव बासीन के एकझन रिटायर्ड गुरुजी देसलहरा जी के बात के सुरता आगय - इस्त्रीरोग बिसेसग्य आय - डाॅ. संगीता नायर के । कथय - " चल एक घाँव , तुमन एक प्रयास करके देख लव । वो डाक्टर ले मिल लव । किस्मत ल मत कोस जी । एक अउ कोसिस करे मं काय हे जी । "

                   " पर हमन तो नइ देखे हन... " पदुम के कुछू अउ कहे की पहिली ले रोहित कथय - " ये ला मोर उपर छोंड़ । बस तुमन तइयार हो जाव । दिल-दिमाक ले नकारात्मक बात ल तो हटावव । मँय लेग हूँ तु मन ला । पइसा-वइसा के फिकर घलो झन करव । सब बन ही । आय-जाय मं परेसानी हो ही त मँय कब काम आहूँ यार । " थोरिक देर ले ये डहर -वो डहर के बात होवत रिहिस । तभेच् रोहित के दाई हर चहा लाइस । पियींन । ताहन " ले ठीक हे रोहित... तें काहत हस ते जरूर जाबोंन , ले बइठ..." काहत पदुम अपन घर गियीस । रोहित घलो बासीन वापसी तियारी मं लग गे ।
              पंदरा दिन के गेये ले सनिचर के दिन रोहित फेर अपन गाँव आइस । इतवार के संझाकुन ओन्हारी-सियारी देख के खेत ले आवत राहय , तभे बगीचा मं पदुम सन भेंट होइस । राम-रमउवा होइस । गोठियात-गोठियात उही मेर आमारुख के खाल्हे मं बइठिंन । बात चलिस । पदुम ह अपन दूनों परानी के बात ल बताइस । डाक्टर करा जाय के डर अउ संकोच ल रख डारिस । रोहित ह पदुम ल बाते-बात मं मानसिक रूप ले वोला तइयार करीस । उदाहरन देवत गियीस सकारात्मक परिनाम के । कोसिस के फल बताइस । लोगन के रंग-रंग के गोठ ल बिसरे बर किहिस । गोठियाते- गोठियात वो मेर ले उठिंन । गोठे-गोठ मं हाँसी-मजाक घलो चलय । हासँय दुनो-क-दूनों । दिन बूड़त घर आइन ।

                  हफ्ता भर बाद पदुम अउ रूपा दूनोंझन बासीन पहुँचीन । मंगलवार के दिन आय । संझा-संझा के बेरा ए । इस्कूल ले आके रोहित चाय पीयत-पीयत रेडियो मं युववानी सुनत राहै । रोहित घर के मास्टरिन लता ह वो दूनों झन ल  गोड़ धोय बर पानी दीस । पाँव-पलयगी होइस । गाँव-घर के हाल-चाल के गोठ होइस । सब झन खाइन-पियींन । टी. वी. देखत रोहित हर बात निकालिस - " पदुम , काली डाक्टर ह बइठ ही । गियारा बजे ह वोकर टाइम ए । हमन इहाँ ले नौ बजे निकलबोंन । लता तको जाही । तुमन अपन पुराना परची ल पकड़ ले राहू । सरीर के बारे मं साफ-साफ बता हू । येमा संकोच , लाज-सरम , झिझक के कउनों बात नइ हे । का हे कि डाक्टर ल सब बताना जरूरी हे , तभे बन ही । "

            दूसर दिन सबोझन मनोरम क्लिनिक पहुँचीन । डाक्टर आइस । वो डाक्टर के बारे मं रोहित सुने राहय की बहुत बढ़िया इस्त्रीरोग बिसेसग्य आय । सब ले बढ़िया ये राहय की पति-पत्नी दूनों झन डाक्टर राहैं । अपन क्लिनिक के एके चेम्बर मं बइठें । दूनोंझन एम.डी. , लंदन रिटर्न राहैं । पंदरा मिनट के बाद इँकर नम्बर लग गे । पदुम अपन दूनोंझन अंदर गियींन । करीबन बीस-पचीस मिनट के बाद बाहिर आइन । दूनों के चेहरा मं खुसी के थोरिक लहर दिखीस । मामला सकारात्मक लागिस । अब उहाँ ले जल्दी निकलई उचित समझिंन । इँकर मेर परयाप्त समय राहै । पावर हाऊस घूमे बर गियींन । थोड़-बहुत खरीददारी करीन । टेम्पो मं बइठ के दुरुग आइन । चंडी मंदिर के बारे मं तो रोहित-लता हर सुने राहँय अउ देखे तको राहैं , पर पदुम अउ रूपा देखे नइ राहैं , त सोंच-बिचार के सब झन मंदिर गियींन । दरसन करीन । घर लहुँटिन ।
            संझाकुन रोहित अउ पदुम घूमे बर निकलिन । पदुम ह अपन हो के बतावन लागिस - " रोहित , डाक्टर तो वइसे ठीक-ठाक बताइस , पर वोकर कहना रिहिस की हमन इहाँ आये बर बहुत देर कर देयेंन । हम दूनों के सरीर ल चेक करीन दूनों डाक्टर हा । हमु-मन अपन हर बात ल बतायेंन । डाक्टर मोला बीच-बीच मं चमकाय घलो यार । कलेचुप राहँव । दूनोंक सरीर मं कुछ-कुछ दोस बताइन , कमी बताइन । डाक्टर मन लम्बा इलाज के बात किहींन । मोर पियई-खवई के बारे मं घलो चेताइन हे । नसा-पानी , गुटका-सुटका सब ला छोंड़े बर किहींन हे यार । " रोहित ह पदुम के गोठ ल सुन-सुन के , हुँ..हुँ..काहत मुड़ी डोलावत राहै । पदुम के बताय के इस्टाइल ले रोहित ल हाँसी आवत राहै । गोठियात-गोठियात दूनोंझन घर आइन । ये दूनोंझन ल आवत देख के लता अउ रूपा ह चुप होइन । रोहित समझ गे इँकर गोठ-बात ला । वोत्काबेर टी. वी. मं रामायन सीरियल चलत राहै । रामजन्म के प्रसंग राहै , सबो झन देखीन ।

             समय निकलत गीस । पदुम अउ रूपा के नियमित इलाज सुरू होगे । हर महिना आवँय । कभू रोहित घर रूकँय , त कभू समय देख के गाँव चल देवैं । रोहित ल इँकर दूनों मं अच्छा समझ लागिस । बने सुन्ता दिखय दूनों मा । दूनोंक दूनों खुस घलो दिखँय । भठरी-सठरी , बइगा-वइगा , महराज-सहराज ले जयराम की होइन । रोहित घलो गाँव आवत-जावत राहै । हाल-चाल पता चल जाय । पदुम के पियई-खवई , नसा-वसा सब छूट गे । गाँव मं अब तरा-तरा के गोठ चलै । पदुम दूनों झन सब ल सुनै ,  सब ला निकालैं । जानँय की मनखे जात के बेमतलब खुल्ला मुहूँ कनवजी बर भगवान ह कउनों परई-तोपना नइ बनाय हे । दूनोंझन अपने मं रम गें । समय कटत छै महिना बीत गे । साल भर घलो होगे । इलाज चलते रिहिस । इँकर इलाज ल डेढ़क् साल होवन लागै । एक दिन रोहित इस्कूल ले आवत राहै । वोकर मोबाइल बाजिस । बाइक खड़े करीस । हेलमेट निकालिस । फोन रिसीव करीस , पदुम आय । मोबाइल ले अवाज आइस - " रोहित , हमन तुँहर घर आवत हन यार , आज तो मजा आगे भाई । "  रोहित पुछिस - " काय होगे जी ? "

               " रोहित , तें कका बनइया हस...। "  पदुम के उत्ता-धुर्रा सुरू होवत राहय तइसने मा ,  " चुप ना...तहूँ हर ...घर मा नी...गोठियातेस...! "  रूपा ह पदुम ल मीठ-मीठ चमकइस । फट ले मोबाइल बंद होगे । 
          आज तो पदुम अउ रूपा बड़ खुस नजर आवत राहैं ।
रूपा ह लता ल सरी बात ल बता डारे राहै । रोहित ल चहा देवत लता ह दिल्लगी करीस - " अब चाय तो मिलबे कर ही , अउ एक कप नहीं , बल्कि दो-दो कप मिल ही साहू गुरुजी । " चहा पियई के बात ल तो रोहित समझ गे , पर दो-दो कप हर वोला घुमावत राहय तइसना मं पदुम कथय - " डाक्टर ह जाँवर-जींयर के बात बताय हे यार रोहित । दू-झन आवत हें । "

            पदुम के गोठ ल सुनके रोहित ल बड़ा अच्छा लागिस । चुमकही मारिस - " देख बाबू , एक घाँव मं हमन ल तें कवर कर देयेस । " ताहन रोहित अउ लता अइसन समय के बात ल रखते गीन । पदुम अउ रूपा घलो बताते रिहिंन की डाक्टर ह अबड़ सावधानी रहे के बात बताय हे । गोलिच-गोली देये हे ।दू-ठिन टानिक सीसी हावय । घर मं जेचकी बर तो बिलकुल मना करे हे । कुछ भी लागही ते तुरते सम्पर्क करे , अउ नहिं ते सीधा क्लिनिक आय के बर कहे हे । बहुँते-जादा एमरजेंसी  हो ही ये नजदीक के पराथमिक सुवास्थ केन्द्र मं जरूर सम्पर्क करे ला कहे हावय । रोहित ह अपन दूनों कोई पदुम अउ रूपा ल डाक्टर के कहे मुताबिक परहेज , सावधानी , चेक-वेक के बात ल दोहराते रिहिंन ।

                  अब तो रूपा के अम्मल होय के बात ह बोहारडीह गाँव मं बनेच गाँव-गोठ होगे राहै । कोनों ल अचरज त कोनों ल खुसी लागै। ठट्ठा-दिल्लगी घलो होवै । पदुम अउ रूपा के समय कटत राहै । काम-कारज सब ठीक-ठाक । हर महिना डाक्टर करा जाँय । बीच-बीच मं गाँव के हास्पिटल मं घलो जाँच करावँय । चार ले पाँच महिना होगे । रूपा ल कभू थोरिक डर असन लागय ताहन लता सन फोन गोठिया के अपन डर ल दुरिहावय । लता ह घलो रूपा ल हिम्मत बंधावँय । बने-बने सोंचे-बिचारे के बात बतावँय । सात ले आठ महिना होगे । इही बीच रूपा हर सधौरी घलो खा डारिस । नव्वाँ महिना के आखिरी हफ्ता के चौबीस दिसम्बर के तारीख आगे । रतिहा जेवन जे-जुवाके सुते-बइठे के तियारी चलत राहय , तइसने मं रूपा ल पीरा जनाइस । परोसीन काकी रामकली ल ले के गाँव के हास्पिटल मं गीन । थोरिक बेर बाद मितानिन घला आगे । रात बीतत राहै । रूपा के पीरा  बढ़त राहै । रात बीते के संगे-संग सब के कोसिस चलत राहै । आखिर मं उत्ती मं लाली लिये सुरुज उइस । निरासा अउ अकर्मन्यता के घोर अंधियारी ल चीरत आसा अउ धीरज के अनगिनत किरन बगर गे । पदुम अउ रूपा ल एक नवाँ बिहान के दरसन होइस । सुग्घर एक नोनी अउ एक बाबू जनम धरिन ।

               समय हवा अस होथै । एक जगा माढ़े नइ राहै । येसो के मांघ मं दूनों लइका मन चार बछर के होगें । इन्ला गाँव के एकठिन पराइवेट इस्कूल मं भरती करा देये राहैं । एक दिन रोहित हर गाँव पहुँचीस । घर के मुँहाटी मं बाइक ल खड़े करीस । तभेच् रूपा ह बोरिंग ओंटत-ओंटत रोहित ल देख परिस , लइका मन ल चिल्लाइस , ताहन लइका मन आइन दँवड़त-दँवड़त - " मासटर चच्चा आगे...मासटर चच्चा आगे...। " ये दूनों लइका मन मं बाबू धीरज हर बिल्कुल पदुम के सकल मा , अउ नोनी आसा ह तो रूपा असन एक नम्बर के चटरी राहै ।


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                    @ टीकेश्वर सिन्हा " गब्दीवाला "
                      घोटिया , जिला - बालोद ( छ. ग. )

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