देश-विदेश में प्रस्तति देते हैं हरमुख जी संगीत के प्रति समर्पण इनके उददेश्यों में


छत्तीसगढ़ अंचल में अनेक कलाकारों ने अपनी माटी का नाम देश-विदेश में रोशन करने में कोई कमी नहीं की। अनेक कलाकार कई बार अपनी कला की प्रस्तुति के लिए विदेशों की यात्राएं की। देश ही नहीं विदेश के लोग हमारी लोक कला को आसानी से समझकर आत्मसात करते आ रहे हैं। यही कारण है कि पंडवानी जैसी लोक विधा को पूरे भारत में विशेष ख्याति मिली। इसी तरह अनेक विधाओं में कलाकार अपनी कला की प्रस्तुति से दर्शकों का मनोरंजन करते आ रहे हैं। इसी कड़ी में दुष्यंत कुमार हरमुख जी का नाम भी आता है। आपने देश ही नहीं विदेशों में भी संगीत का परचम लहराते हुए काफी समय से लोककला के क्षेत्र में अपना योगदान दे रहे हैं-

जानें इनकी कला सेवा को यहां-


पारिवारिक वातावरण

आप मूलत: ग्रामीण परिवेश से अपनी जीवन की शुरूआत की। आपको अपने पिता रामेश्वर प्रसाद हरमुख तथा माता का नाम सुशीला देवी हरमुख का सानिध्य मिला।  आपका जन्म ग्राम सकरौद ,पो- राहूद, जिला- बालोद (छ.ग) में हुआ। शुरू से ही संगीत के प्रति आपका लगाव रहा। घर में आपको संगीत के प्रति कार्य करने के लिए प्रोत्साहन मिला और लगातार अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे। आप संगीत के क्षेत्र में शास्त्रीय संगीत में निपुण रहे  बिजुली पांडा व्याख्याता (इ.क.सं.वि.वि खैरागढ़) के साथ ही लोक संगीत के पुरोधा महासिंह चंद्राकर व खुमान लाल साव को अपना सांगीतिक गुरू मानते हैं। आप वर्तमान में भिलाई इस्पात संयंत्र में अपनी सेवाएं देते हुए वर्तमान में मरोदा सेक्टर भिलाई नगर जिला-दुर्ग में निवास कर रहे हैं।


सांगीतिक योगदान

आपने संगीत में बी.ए (आनर्स), सितार में इंदिरा कला संगीत वि.वि खैरागढ़, जिला- राजनांदगाँव से शिक्षा प्राप्त की। इसके साथ ही बांसुरी और हारमोनियम वादन करते हैं। इसी तरह गायन के क्षेत्र में भी आपको महारत हासिल है। वर्तमान में आप संगीत निर्देशन व संयोजन भी करते हैं। आप आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से सुगम संगीत व लोक संगीत में उच्च श्रेणी के मान्य कलाकार हैं। 

प्रस्तुतियां

आप दस वर्ष की उम्र से रामायण के माध्यम से विभिन्न मानस मंचों में हारमोनियम बजाकर भजन गाते थे। इसी तरह महान धर्नुधर एकलव्य का अनुशरण करते हुए आपने बांसुरी बजाने का अभ्यास शुरू किया। 13 वर्ष की उम्र में आते आते छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक मंचों में जैसे तुलसी चौरा, अंजोरी रात में बांसुरी वादन की शुरूआत की। मैट्रिक पास करने के बाद संगीत की विधिवत शिक्षा हेतु एशिया के एकमात्र संगीत वि.वि खैरागढ़ में प्रवेश लिया। तत्पश्चात छत्तीसगढ़ के महान संगीतकार महासिंह चंद्राकर एवं खुमान लाल साव के सानिध्य में सोनहा बिहान व चंदैनी गोंदा तथा लोक रंग, कारी ,गम्मतिहा, हरेली, रंग सरोवर सांस्कृतिक मंच के माध्यम से देश के विभिन्न स्थानों में बांसुरी वादन व गायन की प्रस्तुति देते रहे। 14 फरवरी 2009 से स्वयं के निर्देशन में प्रवेश के स्वर कोकिला श्रीमती ममता चंद्राकर व प्रसिद्द फिल्म निमार्ता निर्देशक श्री प्रेम चंद्राकर के संचालन में तीस कुशल कलाकारों के साथ सुप्रसिद्ध सांस्कृतिक संस्था चिन्हारी का मंचन जारी रहा। अब 9 जुलाई 2017 से अपने स्वतंत्र संचालन एवं निर्देशन में एक नई संस्था रंग झरोखा का निर्माण एवं मंचीय प्रदर्शन कर रहे हैं।


मूर्धन्य कलाकारों का सानिध्य

लोक संगीत व लोक मंचों के अलावा सुगम संगीत में भी देश के अनेक प्रसिद्ध कलाकारों जैसे सर्वश्री अनूप जलोटा व उनके पिता पुरुषोत्तम दास जलोटा, अहमद हुसैन, मोहम्मद हुसैन,पं जगन्नाथ भट्ट तथा भिलाई के प्रसिद्द भजन एवं गजल गायक प्रभंजय चतुर्वेदी के साथ संगीत समारोहों में आपने बांसुरी वादन किया है।

उपलब्धियाँ-

लगातार 32 घंटे भजन गायन के लिए गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नामबद्ध होने वाले समूह का सदस्य हैं। अनेक छत्तीसगढ़ी फिल्मों में संगीत निर्देशन के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का खिताब आपको मिला है। सन 2007 में भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा आयोजित लोक कला महोत्सव में संयंत्र कर्मी लोक कला साधक सम्मान मिला। आपके संगीत निर्देशन में एल्बम-ममता के मया, सुरता, चिनहा, सोनहा बिहान, गौरा गौरी, मया के मड़वा, सुवा, मोर आजा सजन, देखँव रे तोला, मया म झूम के, लोक रंजनी, मया के गीत, माता जस गीत इत्यादि का निर्माण किया है। इसी तरह धारावाहिक व टेली फिल्म- मयारुक चंदा, त्रिकाल का काल, सास बहु के झगरा, सुम्मत और कौशिल्या का निर्माण आपने किया है। लाइट एंड साऊंड के माध्यम से-कथा एक कुम्भ की (राजिम महोत्सव) ,अथ श्री भोरमदेव (भोरमदेव महोत्सव), देवी महिमा (जगदलपुर महोत्सव), राजिम से राजिम तक (राजिम महोत्सव), राजा चक्रधर (चक्रधर महोत्सव,रायगढ़), हमर छत्तीसगढ़ रायपुर की प्रस्तुति दी है। आपने फीचर फिल्म-मया देदे मया लेले, तोर मया के मारे, कारी, मया के बांटा, मया देदे मयारू, सजना मोर, बईरी के मया, अब्बड़ मया करथों, मोर मन के मीत का निर्माण किया। आप अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने सांगीतिक यात्रा में बैंकाक, मलेशिया, ओमान और दुबई में प्रस्तुति दी है। वर्तमान में आप सन 1996 से भिलाई इस्पात संयंत्र में कलाकार के पद पर कार्यरत हैं। आगे भी आप छत्तीसगढ़ के संस्कार एवं सांस्कृतिक प्रतिष्ठा को संगीत के माध्यम से बनाये रखने प्रतिबद्ध हैं।

 प्रस्तुति
 डा. दीनदयाल साहू
 भिलाई नगर

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