*वृन्दावती*



दृढ़निश्चयी थी वो नारी, वृंदावती एक राजकुमारी।
जो संग धरा जालंधर का,  जड़ हो गयी अबला बेचारी।।

भगवान ने जब ठगा भक्त को, श्राप से वो भी शील हुआ।
तुलसी को अपनाकर, मानव जीवन का कल्याण किया।

कितनी यातनायें सही, कितने उसने दर्द है पाले।
भरोसे के नाव में बैठी, अब मझधार से कौन निकाले।।

पति भी ना सुने उसकी, किसको व्यथा वो बताये।
धोखे की आग में जल, चित्त को अब रास ना आये।।

पतिव्रता के ताप से, जालंधर हाहाकार मचाये।
देव भी डरने लगे, सती को अब आंख दिखाए।।

दुनिया में व्याप्त पाप सेतु, देवता डर से सिर नवाये।
देव मानव की रक्षा हेतु, पालनकर्ता तब सामने आए।।

जालन्धर का अमरत्व वृंदा से, कौन युद्ध में उसे हराये।
विष्णु के अधम छल ने, सतीत्व पे उसके आँच लगाए।

रहस्य ज्ञात होने पर उसने, अपने पति की मृत्य पाया।
श्राप दिया गिरिवर को, स्वयं अग्नि कुंड समाया।

छलिया के छल से छलनी, उसने जीवन धिक्कार दिया।
श्रीहरि त्रयलोक संपदा, वृन्दा ने अस्वीकार किया।

देह भस्म जब बना तो, तुलसी का उदगार हुआ।
तुलसी को पाकर, मानव जीवन साकार हुआ।

निरंकार ने किया स्वीकार, बिन वृन्दा ना लेंगे आहार।
तुलसी मिटाए रोग विकार, सर्वत्र होगी जयजयकार।।

शिव कुलवधू को भक्ति का, अजर अमर प्रमाण मिला।
अमृततुल्य तुलसी होकर भी, गृह में नहीं स्थान मिला।।

है अभागी फिर भी, वो सब के कष्ट मिटाती है।
तुलसी शालिग्राम विवाह से, जग में कीर्ति फैलाती है।

वृंदा की पीड़ा हर युग में, हर नारी में दिखती है। देवताओं की भाषा में, परोपकारी हर स्त्री है।

गायत्री साहू

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