अनेक गाथाओं को संजोया अंचल का कबीरधाम


आंचलिक गौरव




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छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में भोरमदेव क्षेत्र अपने पुरातत्विक समृद्धि के लिए प्रसिद्ध है। प्राप्त शिलालेखों से 9वी से 16वी शताब्दी के लगग इस क्षेत्र में फणिनागवंश के शासकों के साम्राज्य होने के साक्ष्य मिलते हैं। भोरमदेव के मुख्य शिव मंदिर, मड़वा महल, छेरकी महल के अलावा भी आसपास के क्षेत्रों में मैकल श्रेणी के समानांतर इस राजवंश के शासनकाल के ध्वंशावशेष मलते हैं। इनमें गंडई, घटियारी, सहसपुर, राजाबेंदा, सिली पचराही प्रमुख हैं


                                                      इसके अलावा भी उस काल की मूर्तियां, शिल्प खण्ड, ईंटो के अवशेष जगह-जगह बिखरे पड़े हैं। कई स्थल आज भी उत्खनन की बाट जोह रहे हैं। पचराही जिला मुख्यालय कवर्धा से 45 किलोमीटर तथा ब्लॉक मुख्यालय बोड़ला से 17 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर-पश्चिम दिशा में हाफ नदी के दाहिने किनारे पर स्थित है। पचराही का तो सर्वप्रथम नाम  ही आकर्षित करता है। एक सामान्य अर्थ जहां पांच रास्ते आकर मिलते हो या जहां से पांच रास्ते निकलते हो। लोक मान्यता में ये पांच रास्ते जिनको जोड़ते हैं वे हैं-रतनपुर, सहसपुर, भोरमदेव, मंडला और लांझी। उत्खनन से प्राप्त अवशेषों से यह बात सही लगती है कि यहां अपेक्षाकृत बड़ी बसाहट रही होगी। स्वर्ण-रजत सिक्कें, महल, मंदिर के अवशेष यहां सम्पन्न व्यक्तियों अथवा राजपुरुषों के निवास करने को भी प्रमाणित करते हैं।




इतिहास के अनुसार

पचराही के पुरातात्विक अवशेषों की जानकारी लोकमानस के अलावा इतिहासकारों, सर्वेक्षणकतार्ओं को भी काफी समय से रही है। आसपास के लोक जीवन मे प्रसिद्ध कंकाली टीला देवी मूर्ति के कारण कंकाली देवी  नाम से जाना जाता रहा है। इस क्षेत्र का सर्वप्रथम सर्वे सर आर जेनकिन्स द्वारा 1825 के लगग किया गया, जिसकी रिपोर्ट एशियाटिक रिसर्चेस वॉल्यूम 15 में प्रकाशित हुआ। उन्होंने अपने रिपोर्ट में दो शिलालेखों की प्राप्ति का उल्लेख किया है जो उन्हें ध्वस्त मंदिर के पास प्राप्त हुआ था।  इनमें से एक तीन हिस्सों में खण्डित था जिसमे कोई तिथि अंकित नही थी। दूसरे शिलालेख में 849 अंकित था। जेनकिन्स के बाद सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1881-82 में इस क्षेत्र का पुरातात्विक सर्वेक्षण किया जो आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के वॉल्यूम 17 में रिपोर्ट आॅफ अ टूर इन द सेंट्रल प्रोविंसेस एंड लोवर गंगेटिक दोआब के नाम से प्रकाशित हुआ। कनिंघम ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि कंकाली की मूर्ति ध्वस्त मंदिर के बाहर रखा हुआ है जो एक वीरान किले के अंदर है। कंकाली टीला, पचराही ग्राम बोरिआ के निकट होने के कारण बहुत जगह पचराही की अपेक्षा बोरिआ नाम का उल्लेख हुआ है। कंनिंघम को जेनकिन्स द्वारा उल्लेखित श्तीन हिस्सों में खंडित शिलालेख तथा 849 अंकित शिलालेख भी प्राप्त नही हो सका। लेकिन उन्हें एक शिलालेख प्राप्त हुआ जिसे उन्होंने सम्वत 910 पढ़ा। यह शिलालेख दाढ़ीयुक्त हाथ जोड़े राजपुरुष की मूर्ति के पादतल चौकी में अंकित है। श्री धानूलाल श्रीवास्तव अष्टराज अंभो1925 के अनुसार यह वही अभिलेख है जिसे जेनकिन्स ने 849 पढ़ा था। बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि यह अभिलेख युक्त मूर्ति वर्तमान में बूढा महादेव मंदिर कवर्धा में है। इसके अलावा एक बिना तिथि का अभिलेख मिला जिसमे श्री जसराज देव अंकित है। यह मूर्ति भी बूढ़ा महादेव मंदिर कवर्धा में रखी हुई है। तीसरा अभिलेख जो उन्होंने देखा उसमे केवल देवदास अंकित है। यह अभिलेख धानू लालश्रीवास्तव के समय 1925 तक पचराही में था।



विद्वानों की राय में

राय बहादुर हीरालाल की इस्क्रिप्सन ऑफ सी पी एंड बरार 1916 से लिया है जिसके अनुसार पचराही से दो सती स्तं भी लाया गया है जो कवर्धा में करपात्री पार्क के पास स्थित मंदिर में मार्ग शीर्ष शुक्ल द्वादशी सोमवार सम्वत 1414 अर्थात 5 दिसम्बर सन 1356 ई सोमवार महाराजा श्री रामदेव का शासनकाल लिखा है। तथा दूसरे में ज्येष्ठ सुदी 13 संवत 1422 सोमवार अर्थात 13 मई सन 1364 ई अंकित है। इसमें यह उल्लेख है कि परलोकगत नामक महादेव की तीन पत्नियां थी-मेताई, नौरवाई और दिवमाई। इनमें से केवल मेताई सती हो गई और यह स्तं उसके समानार्थ निर्माण किया गया। इन स्तंभों को आज भी मंदिर में देखा जा सकता है। इसके अलावा वहां और भी स्तं और मूर्तियां हैं लेकिन वर्तमान में सब के ऊपर काला पेंट कर देने के कारण न तो उत्कीर्ण आलेख दिख रहे हैं न ही यह समझ आ पाता है कि कौन प्राचीन अवशेष है और कौन अवार्चीन!

खैरागढ़ विश्व विद्यालय से सम्बद्ध श्री सीताराम शर्मा ने अपने शोध.कार्य के दौरान इस क्षेत्र के बिखरे मूर्तियों प्राचीन तालाबों आदि का अध्ययन कर 1990 में भोरमदेव क्षेत्रपश्चिम दक्षिण कोशल की कला नामक पुस्तक प्रकाशित की। लगग इसी समय श्री शरद हलवाई अपने निजी रुचि के तहत इस क्षेत्र के पुरातत्विक अवशेषों पर अखबारों में लिखते रहें। 70-80 के दशक में इस क्षेत्र के महत्वपूर्ण प्रस्तर खण्डों, मूर्तियों को इंदिरा कला एवं संगीत महाविद्यालय के संग्रहालय में सुरक्षा की दृष्टि से स्थानांतरित कर दिया गया था, इनमे बौद्ध एवं जैन प्रतिमाएं भी हैं। इसलिए बिना संग्रहालय को देखे यहां की व्यता का अनुमान नही हो सकता।

पचराही के इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब बिधिवत रूप से यहां के पुरातत्विक स्थलों का उत्खनन हुआ। यह उत्खनन 2007.09 के दौरान श्री सोबरन सिंह यादव के निर्देशन और श्री अतुल प्रधान के नेतृत्व में हुआ।  जिनसे महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त हुई हैं। इस उत्खनन से प्राप्त अवशेषों को उन्होंने पांच कालों पूर्व ऐतिहासिक, उत्तर गुप्तकालीन, पांडुवंशी, कलचुरी कालीन, फणि नागवंशी कालीन और इस्लामिक में विभाजित किया है। उत्तर गुप्तकालीन अवशेषों में कोई लिखित साक्ष्य प्राप्त नही हुआ है मगर उस काल की बड़े वगार्कार ईंटें प्राप्त हुई हैं। साथ ही पत्थर का बैल, टेराकोटा, तथा कई पट्टिकाएं प्राप्त हुई हैं जिनमे पार्वती, कार्तिकेय और कई अचिन्हित आकृतियां उत्कीर्ण हैं।




अवशेषों से अनुमान

कलचुरीकालीन पर्याप्त अवशेष प्राप्त हुए हैं जिनमे ईंटो से बने रहवास, किलेबंदी के अवशेष, लोहे और तांबे के समान, चीनी मिट्टी के बर्तन बनाने का कारखाना, सिक्के और मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। सिक्कों में रत्नदेव का स्वर्ण सिक्का, प्रतापमल के दो स्वर्ण सिक्के, ताम्बे के सिक्के रत्नदेव के दो, पृथ्वी देव के एक, जाजल्यदेव के दो प्राप्त हुए हैं। पचराही में फणि नागवंशियों के भी पर्याप्त अवशेष प्राप्त हुए हैं जैसे- सिक्कें, मूर्तियां, वास्तु रूपांकन, वन अवशेष, टेराकोटा आदि। इनमें नक्कड़ देव का स्वर्ण सिक्का, श्रीधरदेव का रजत सिक्का, यशोराज देव का रजत सिक्का, जयत्रपाल के दो रजत सिक्के हैं। फणि नागवंशियों के सिक्के पहली बार प्राप्त हुए हैं अभी तक उनके विवरण केवल शिलालेखों में प्राप्त हुए थे। उत्खनन में इस्लामिक शासन काल के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं जो अपने आप मे महत्वपूर्ण हैं। एक ब्रिटिशकालीन रजत सिक्का भी प्राप्त हुआ है जो बाद के समय यात्रा करने वाले व्यक्तियों द्वारा आये होंगे। पचराही उत्खनन में मोलस्का फाईलम का एक जीवाश्म प्राप्त हुआ है जो सर्पिलाकार 1.2सेमी है। श्री मैनकर दत्त के अनुसार यह जुरासिक काल के  के समान है और संभवतः किसी और क्षेत्र से यहां पहुंचा होगाक्योकि इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियां उसको धारण करने के अनुकूल नही है।

इस अभिलेख की खोज अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1881.82 में अपने सर्वे के दौरान की थी। सम्वत: यह वही अभिलेख है जिसे उनसे पूर्व जेनकिन्स ने देखा था और तिथि संवत 849 पढ़ा था। मगर इसका अनुवाद सबसे पहले कनिंघम ने  किया। यह अभिलेख हाथ जोड़े एक दाढ़ीयुक्त राजपुरुष की मूर्ति के पादतल में तीन पंक्तियों में अंकित है। मूर्ति में पुरुष के अलावा दाएं.बाएं दो स्त्रियां भी हाथ जोड़े बैठी हैं। वर्तमान में मूर्ति में लगातार पानी और फूल आदि पूजन सामग्री डालने से अभिलेख गर्द जमा होते जाने से मुश्किल से दिखाई दे रहे हैं। कनिंघम ने एक जगह इसे संवत 910 तथा एक जगह संवत 1110 लिखा है। राय बहादुर हीरालाल के अनुसार यह 945 अथवा 915 हो सकता है। इस अभिलेख में जिस महाराणाजसराजदेव का जिक्र है। फणि नागवंशियों के मड़वा महल अभिलेख में उल्लेखित वंशावली में भी इस वंश के पंद्रहवे शासक यशोराज है। फणि नागवंश के छठवें शासक गोपालदेव थे उनके छ पीढ़ी बाद यशोराज हैं। खुदाई में यशोराज देव का एक रजत सिक्का प्राप्त हुआ है। अवश्य यशोराज शक्तिशाली राजा रहे होंगे!

बिना तिथि का अभिलेख

यह अभिलेख भी बूढा महादेव मंदिर में रखे राजपुरुष के एक दूसरे मूर्ति के पादतल पर उत्कीर्ण है। कनिंनघम ने इसका भी पाठ किया था। मिराशी के अनुसार पाठ इस प्रकार है-(अनुवाद) श्री जसराज देव। उनके दंडनायक जागु धिरक्षेद्र के पुत्र है जो कि स्वामिक्त है। बूढा महादेव मंदिर में राजपुरुष की तीन मूर्तियां है। दो अभिलेखयुक्त तथा एक बिना अभिलेख के। दो मूर्तियों में राजपुरुष के साथ दो स्त्रियां हैं। उनमें एक स्त्री-पुरुष एक साथ बैठे हैं उनके पीछे मंडल बने हैं तथा अकेली स्त्री के पीछे कोई मंडल नही है। एक मूर्ति में तो उसका आकार भी छोटा है। राय बहादुर हीरालाल के अनुसार मण्डलयुक्त युगल दंपत्ति माता-पिता की है तथा सादी मूर्ति क्तिरति कन्या की है। ऐसा प्रतीत होता है कि ठाकुर माल्तु और उसकी पत्नी का देहांत हो गया था और उनकी पुत्री ने उनकी स्मृति में शिव मंदिर का निर्माण कराया।

कंकाली टीला

पचराही का पुरातत्व कंकाली टीला के नाम से ही अधिक चर्चित रहा है। कंनिंनघम से लेकर वर्तमान उत्खनन तक इसी नाम से जाना जाता रहा। अधिकांश पुरातत्विक सामग्री इसी के आस.पास बिखरे हुए थे। टीले के उभार को देखकर ही अंदाजा हो जाता था कि यहां कोई स्थापत्य संरचना अवश्य होगी। उत्खनन से पूर्व टीले में स्थापत्य खण्ड के बीच एक मूर्ति थी जिसे कंकाली देवी के नाम से पूजा जाता रहा। यह मूर्ति वर्तमान में पचराही संग्रहालय में अवस्थित है। मूर्ति का शिरोभाग खण्डित है। आशीर्वाद मुद्रा में बैठे हुए यह मूर्ति कोई देव पुरुष है। इसका वक्ष स्थल सपाट है। लोकमानस में देव मूर्ति पर देवी का आरोपण कोई असामान्य घटना नही है मगर कनिंनघम ने अपने सर्वे रिपोर्ट में जिस देवी मूर्ति का उल्लेख किया हैय् वह यह मूर्ति प्रतीत नही होती। डॉ सीताराम शर्मा ने लिखा है-1989-90 से यह मूर्ति कई खण्डों में विक्त होकर वहीं पर है। सम्व है अधिक खण्डित होने के कारण मूर्ति की पहचान मिट गई हो। इसके अलावा उल्लेखित शिव मूर्ति का भी पता नही चलता। कंकाली टीला के उत्खनन से उत्तर गुप्तकालीन पांडुवंशी ईंटो की संरचना प्राप्त हुई है जिसमे दो कक्ष हैं -उत्तरा  प्रदक्षिणापथ। बाद में कलचुरी काल मे इसके ऊपर पत्थर से निर्माण कार्य के साक्ष्य मिले हैं। ईंटो की सरंचना के बारे में स्थिति स्पष्ट नही है मगर कलचुरी काल मे पत्थर का निर्माण कार्य अभिलेख में उल्लेखित शिव मंदिर हो सकता हैए जो मंदिर के ध्वस्त हो जाने के बाद के काल मे कंकाली की मूर्ति के कारण कंकाली मंदिर के नाम से चर्चित हो गया हो। वैसे यहां उत्खनन में अन्य स्थलों पर भी शिव मंदिर होने के साक्ष्य मिले हैं। कहा नही जा सकता कि अभिलेख में उल्लेखित शिव मंदिर वास्तविक रूप से कौन सा है।




फणिनागवंश से संबंध

पचराही भोरमदेव के अपेक्षाकृत नजदीक है।उत्खनन पूर्व ही शिल्पखण्डए मूर्तियों की बनावट में समानताए बोरिआ अभिलेख के जसराज जो कि फणिनागवंश का राजा है, पचराही को फणिनागवंश साम्राज्य से ही सम्बद्ध माना जाता रहा है। उत्खनन से फणि नागवंश के राजाओं के सिक्के प्राप्त होने से इस बात को और बल मिलता है। यहां फणि नागवंश के सोलहवें शासक नक्कड़ देव का स्वर्ण सिक्का, श्रीधर देव का रजत सिक्का से इसे फणि नागवंशियों का तीसरा शासक माना है जो कि वंशावली में धरणीधर है। यानी धरणीधर और श्रीधर एक ही हौं लेकिन इसका उल्लेख अन्य किसी अध्ययनकर्ता ने नही किया है! पंद्रहवे शासक यशोराज का रजत सिक्का प्राप्त हुआ है। इस तरह यह फणि नागवंशियों का का ही शासन क्षेत्र प्रतीत होता है।



कलचुरियों का रतनपुर से संबंध

जिस समय भोरमदेव क्षेत्र में फणि नागवंशियों का शासन था। उस समय रतनपुर के कलचुरी शक्तिशाली थे। ऐसा माना जाता है कि फणि नागवंशी उनके अधीनता स्वीकार करते रहे होंगे। कई साक्ष्य इस तरफ संकेत करते हैं-जैसे कई अभिलेखों में कलचुरी सम्वत का प्रयोग करना। भोरमदेव मंदिर के दक्षिणी दीवार अभिलेख संवत 1608-1551 ई. से पता चलता कि भुवनपाल देव के मंदिर को किसी मांडोपति द्वारा तोड़कर एवं रतनपुर के बाहुराय द्वारा विजय प्रतीक के रूप में रत्न जड़ित कलश स्तं ले जाने का उल्लेख है। मड़वा महल अभिलेख से पता चलता है कि फणि नागवंशी राजा रामचन्द्र देव का कलचुरी राजकुमारी अम्बिका देवी से विवाह हुआ था। ब्रम्हदेव के खल्लारी अभिलेख से पता चलता है कि कलचुरी रामचन्द्र देव ने फणिवंशी भोंणिग देव को पराजित किया था। यहां यह स्पष्ट नही है कि यह नागवंशी बस्तर का है कि भोरमदेव, क्योकि फणि नागवंशियों के वंशावली में इस नाम का किसी राजा का पता नही चलता।
वर्तमान उत्खनन से पचराही में रतनपुर के कलचुरियों के सिक्के मिलें हैं। इनमें रत्नदेव का स्वर्ण सिक्का, प्रतापमल्ल देव का स्वर्ण सिक्का,जाजल्लदेव, पृथ्वीदेव, रत्नदेव के ताम्र सिक्के प्रमुख हैं। इस तरह कलचुरियों से फणि नागवंशियो के सम्बंध विभिन्न समयों में आधीनता-समानता तीनो तरह के प्रतीत होते हैं। मड़वा महल अभिलेख में उल्लेखित फणि नागवंशियों की वंशावली में अहिराज,राजल्ल, धरणीधर, महिमदेव, शक्तिचन्द्र, गोपालदेव, नलदेव, भुवनपाल, कीर्तिपाल, जयत्रपाल, महीपाल, विषमपाल, जन्हु, जनपाल, यशोराज, कन्नडदेवी या वल्ल,लक्ष्मी वर्मा,खड्गदेव, भुवनैक मल्ल, अर्जुन, भी, भो, लक्ष्मण, रामचंद्र तथा अज अंकित है।


अजय चंद्रवंशी कवर्धा                        
                                 
                                                                                                                                                                                             

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