छत्तीसगढ़ी गज़ल - मुंहू कान ला धो ले संगी, एक्के दवई उंघासी के |


मुंहू कान ला धो ले संगी, एक्के दवई उंघासी के | 
बिहना ले संझा तक मिहनत, ये परताप हे बासी के |

उमर पहागे दंउड़त - भागत, आंटत जिनगी के ढेरा ,
तबले नइये कुछु आसरा, कारन इही उदासी के |

मन के गिल्ला भुइंया पाके, दुख पीरा हर ऊ जाथे ,
ये लूए के बेर नो हय, क्र ले बाँवत हाँसी के | 

रहि रहि के मारै झेन्पारी, तिहुर तिहुर के पानी ह,
चल नानुक के दाई चलबो, बेर भईस बियासी के | 

अतका चूरन गोली सूजी, कुछु काट नई करत हवै,
छत्तीसगढ़ ला जुड़ धरे अउ पड़े हे दौरा खांसी के |

भुइंया के मरजाद बेच दिन,  अगुवा मन दू कौड़ी मा,
पंडरा - पिन्वरा काला कहिबे जम्मो एक्के रासी के |

                                          मुकुंद कौशल  
                                          9329416167   

टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां