सागर मंथन


आओ सँगवारी मैं सुनाऊँ ,
एक अमर कहानी ।
मैंने बचपन मे सुनी थी , 
दादी नानी की जुबानी ।

हिम पर्वत में रहते थे , 
शिव भोले था नाम , 
दिखने में भूतों सा लगते ,
करते बढ़ा - बढ़ा काम ।

युद्ध छिड़ी  जब सृष्टि में ,
मचा हुआ था हाहाकार ।
देव दानव के टक्कर से ,
होने लगे भूचाल ।

तब भोले ने सागर मंथन का,
दिया अनुपम उपहार ।
सुन भोले वाणी दोनो , 
हुये मंथन को तैयार ।

वासुकी और मंदरा चल से ,
हो गई सागर मंथन चालू ।
हीरे ,मोती , माणिक्य,धातु, 
निकले अद्भुत बालू ।

फिर अचानक निकल गया ,
विष का एक पियाला ।
देव, दानव समझ न पाये ,
दौड़े हिम शिवाला ।

भोले बाबा ने पी लिया ,
विष का पूरा पियाला ।
धरे कंठ में जहर को अपने,
बन गये नीलकंठ निराला ।

सावन मास आते ही ,
शिव मंदिर में बाजे घन्टा।
डमडम - डमडम डमरू बाजे ,
सावन में बाजे शिव डंका ।


पुष्पा गजपाल " पीहू "
महासमुंद (छ. ग.)

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