छत्तीसगढ़ विशेष - हमर अंचल के देवी देवता पीढ़ी दर पीढ़ी माने के परंपरा



छत्तीसगढ़ की संस्कृति
                                 
अंचल विशेष

हमर छत्तीसगढ़ में मैदानी अउ बस्तर म वनवासी मन अब्बड़ 

अकन आंचलिक देवी-देवता मन के विधि-विधान ले धूमधाम संग 

पूजा अर्चना करथें। ऐमो कुछ प्रमुख मन के नाव अइसन हे-


देवता मन के नाव-

करमकोट लोधा देव, बुढ़ादेव, डोकरादेव, बारह तरह के भीमा, घुटाल, कुंअर, भैरमबलहा, चिकटराव, डाक्टर देव, सियानदेव, चौरासीदेव,  पाटदेव, भैरमबाबा, डालर देव, आंगापाट देव,  ठाकुर देव हवय। देवी मन के नाव- केशरपालीन, मावली,  गोदना माता,  आमाबलिन,  तेलंगीन,  घाटमुंडीन,  कंकालीन,  सातवाहिन,  लोहडीगुड़ीन,  लोहराजमाता,  दाबागोसीन,   दुलारदई,  घाटमुंडील,   शीतलादई,  हिंगलाजीन,  परदेशीन,  फोदईबुढ़ी,  महिषासुन मर्दिनी,  करमकोटिन,  कोटगढ़ीन,  नोनी मसवासी। अन्य देवी-देवता गणेश भेरुजी पंथवारी  शीतला माता लतेजा बाबजी,  हनुमानजी,  लालबाई, फूलबाइ,  छप्पन भेरु,  सती माता,  जुझार बाबजी,  गोगाजी,  नाग बाबजी,  गंगा माता, छींक माता,  कुलदेवी, सन्त सिंगाजी,  अवन्तिका देवी,  काजली माता,  उज्जैनी,   गणगौर,   परीमाता,  अम्बा माता,   ठोकर्या भेरु,    रामदेवजी,  देवनारायणजी,  महमाया देवी, समलाया देवी, कुदरगढ़ी,  वामका,  रोगटा,  जलदेवी,  बोदरी माता,  मोती बाबजी,  विजासना माता, बन्दीछोड़ बाबा। सौंरा देव, कोंढी बाई, रिच्छीन देवी,  मावली माता,  रकत मावली,  दंतेश्वरी माई, नरम बाबा,  महामाया, घसमिन देवी,  ठाकुर देव,  गौंदा गुठला,  बूढ़ी माई,   काली माई, भईसासुर,  कंकाली देवी,  नांग देव,  अंधी माई,  खैरागढ़िया,  दूल्हा देव।

देवार मन के देवी-देवता

देवारों में लोक देवी देवता के संदर् में एक बेहद रोचक रीति नामांतरण की मिलती है। एक ही आराध्य देव अलग.अलग समयए प्रसंग और संदर्भों में विविध परिचय से पूजा जाता हैं मसलन खैरागढ़िया देव इसे घर के बाहर शुद्धता के साथ भी रखते है। जब इस देवता को बाहर पूजतें हैं तो उसे बैरासू कहते है। इसी देव की धर भीतर आराधन्य होने से या दूतहा नाम मं बदल जाता है। फिर इसी परिचय के संग उसकी अर्चना की जाती हैं। देवारों में दूसरे कुल गौत्र के वाहक इसे गोसाई.पोसाई के नाम से आराधते हैं। मांगलिक प्रसंगों की तरह ही अनुष्ठातिक क्रिया.कलापों में बलि देने की प्रथा का अनिवार्य चलन है। जितने देवी.देवताए उनकी अपनी पसंद के अनुसार बलि दे कर कार्य संपादित किया जाता है। किन्हीं खास पूजा अथवा देवी.देवता की अर्चना में महिलायें सम्मिलित नहीं होती। पुरुष वर्ग ही इसमें भाग लेता है।

रायगढ़ में देवताओं के शिल्प

एकताल रायगढ़ के झारा धातुशिल्पियों द्वारा तैयार 21 देवी.देवताओं की कलाकृतियां हैं। इनकी सूची इस प्रकार से है

बुढ़ी मां

बुढ़ी मां बुढ़ी रहती हैए जिसके बाल सफेदए गाल चिपके हुए एवं 

कमर झुकी हुईए हाथ में डन्डा लिए हुए रहती है। टुकना में लीम 

के डालए बाहरीए लाल कपड़ा पूजा वालाए त्रिशुल रखी रहती है। 

उसके शरीर में चेचक का चिन्ह रहती है।

मावली

मावली बकरी रूप में दिखाई देती है।

फूल मावली

स्त्री के चेहरा एवं पूरा शरीर में फूल दिखाई देती।

रक्त मावली

मुंह से खून बहती रहती है। एक हाथ में खड़गए एक हाथ में 

त्रिशूल एवं बाल बिखरे हुए दिखाई देती है।

चुरजीव मां

नाखून बड़े एवं हाथ उल्टा पैर टेड़ामेड़ाए बाल बिखरे हुए दांत बाहर निकला हुआ। मुंह भी पीछे थन बहुत लम्बा

बुढ़ा रक्सा

21 बहिनों से हम बुढ़ा देव जी मानते है वो कमर में डिढौरीए कनधा में टांगाए हाथ में एक डांग और एक चोंगी पकड़ के पीता है। इसका पहचान यही होता है।

तरुणी माँ

तरुणी मां आंख बंद करके ओ मां जी है जब से उसका नाम लेकर पूजा करते हैं तो हमारा काम सफल होता है। इसके दोनों हाथ आशीर्वाद देते हुए रहते हैं। इस मां के कृपा से कष्ट पड़ने पर जग को तार देती है। इसका जी लम्बा होता है।

मंगला माँ

चैत महिना में मंगला मां का पूजा होता है। मंगला मां का पहचान एक हाथ में त्रिशुलए एक हाथ खड्ग और हाथ र चुड़ी रहेगा।

गरत मावली

गरत मावली मां का पेट रा ;गर्वतीद्ध व बड़ा रहता है। जिस औरत पेट में रहकर मर जाता है तो उसका हम आदिवासी गरत मावली मां बनता है।

दन्देश्वरी मां

दन्तेश्वरी मां दुर्गा अवतार लिए है। इसका पहचान महिषासुर का 

किए दिखाया जाता है।

टिकरा गोसई

इसका पहचान सिर में बाल नही और देवी का रूप दिखना है।

सात बहिनी

सातों बहिनी देवी का सकल एक ही दिखाई इसके लिए इसे सातों 

बहिनी माना जाता है।

फूल सुन्दरी

फूल सुन्दरी मां का पहचान जाता है अति सुन्दर दिखाई देती है। 

किसी आदमी उसको नजर करता है तो उसका शरीर में बाधा आ 

जाता है।

गरब सोल मावली

जिस औरत पेट में आठ महिना रहता है तो उसको गरब सोल 

मारता है तो वह टेढ़ा होकर उसका प्राण जाता है। तो उसको 

मनाया जाता है गरब सोल मावली।

खेंदर

गांव में दुर्घटना आता है तो उसका पहचान आदमी के शरीर में माता दाई आ जाता है। यही इसका पहचान है जान खतरा में भी हो सकता है।

दूधमाई

दूध गोड़ी माई के आने से शरीर में छोटा.छोटा दाना आ जाता है। उसमें भी आदमी का खतरा होने का रहता है। जब यह बड़ जाता है तो यह बाहर व भीतर भी हो जाता है। इसका पूजा पाठ करने से वह आदमी ठीक हो जाता है।

सल तलियन

इसको हम समलपुर का समलई है। इसका पहचान इसके पूरे शरीर कांटा.कांटा रहता है।

चावल पूरने मां

चावर पूरन मां दोनों हाथ में चावर पकड़ा रहता है। उसको चावर 
पूरन मां माना जाता है।

हीरा कुडेन मां

हीरा कुडेन मां को माना जाता है। एकदम बालिका रूप में दिखाई 

देते है। हाथ चुड़ी माथा में सिन्दुर मांग में सिन्दुर मुह में लाली 

यही हीरा कुडेन मां का पहचान है।

निरमला देवी

निरमला माता का पहचान सिर कमल का फूल और योग आसन 

हाथ में गोल.गोल चक्री रहता है। यही इसका पहचान है।

मुचिन खेंदर

मुचिन खेंदर का पहचान जाता है कि जब आदमी उल्टी.टट्टी करते हुए मर जाता है उसका हर जा बीमार माना जाता है। उसका 
पहचान आंख बंद करके उल्टी करते हुए बैठ के मर जाता है।

हीरा कुडेन मां

हीरा कुडेन मां को माना जाता है। एकदम बालिका रूप में दिखाई 

देते है। हाथ चुड़ी माथा में सिन्दुर मांग में सिन्दुर मुह में लाली 

यही हीरा कुडेन मां का पहचान है।

निरमला देवी

निरमला माता का पहचान सिर कमल का फूल और योग आसन 

हाथ में गोल.गोल चक्री रहता है। यही इसका पहचान है।

मुचिन खेंदर

मुचिन खेंदर का पहचान जाता है कि जब आदमी उल्टी.टट्टी करते 

हुए मर जाता है उसका हर जा बीमार माना जाता है। उसका 

पहचान आंख बंद करके उल्टी करते हुए बैठ के मर जाता है।

खपर वाली माई

माना जाता है कि नग्न रूप में दिखाई देता है। जीलम्बा बड़े.बड़े थन और गला में सिर का माला पहचान होता है। कमर में हाथ को कपड़ा बनाकर पहनते हैं। यही खपर वाली माई का पहचान होता है।




संपादक की डेस्क से 
गोविन्द साहू (साव)
लोक कला दर्पण 


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