"मय दुनिया बर लिखना चाहथो"




मंहु इंहा उंहा सब जघा दिखना चाहथो।
ये दुनिया बाजार ये न त महुं बिकना चाहथो।
तोर मोर सब ले कुछ न कुछ सीखना चाहथो।
मय अपन बर नही ये दुनिया वाले बर लिखना चाहथो।
अंधियार भले हवय मोर जिनगी फेर अंजोर म दिखना चाहथो।
मय सुरुज ले लेके आगास तक लिखना चाहथो।
माटी के ममहई ल पंक्ति बना के सिचना चाहथो।
सरहद म रखवारी नई कर पायेंव फेर कलम ले मनोबल उंखर जितना चाहथो।
रद्दा चाहे कोंहो होवय देस के लाल ह झन सोवय वो बानगी बन ल मय लिखना चाहथो।
मय सुर कबीर कस पंक्ति नई लिख सकंव फेर माटी के गीत ल लिखना चाहथो।
राम के ये धरती म मय अब के रावन मन ले जितना चाहथो।
आनी बानी नई आवय मोला मय सोझहा छत्तीसगढ़ी म लिखना चाहथो।
बन के पिरित दुलरवा मय मया करइया मन ल दिखना चाहथो।

     दुर्गेश सिन्हा "दुलरवा"
      दुर्रे बंजारी (छुरिया)
         राजनांदगांव

टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां