समाज की अनमोल धरोहर है लोकनृत्य


लोकनृत्यों की सृजन प्रक्रिया- नाचा के संदर्भ में

लोक के स्वच्छन्द मनोभावों, उमंग-उल्लास के साथ लोक धुनों तथा लोकगीतों पर आधारित एक समान सामुहिक आंगिक संचालन को लोकनृत्य कहा जाता है। मनुश्य के सामुहिक उल्लासमय अंगों की गति से ही लोकनृत्य का सृजन होता है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वह अपने जीवन के प्रत्येक सुख-दुःख, हर्ष-विषाद आदि मनोभावों को दूसरों से बांटना चाहता है। वह कभी हंसता है, रोता है, उछलता है, कुदता है, अनेक प्रकार के हाव-भाव तथा अंग विन्यास प्रकट करता है। इससे उन्हे आनन्द प्राप्त होते है, और ये आनन्द ही लोकनृत्यों को जन्म देता है। 

लोकनृत्य समाज की अनुपम कृति है तथा अनमोल धरोहर भी है। लोकनृत्य स्वतः ही लोक के द्वारा निर्मित हुए है। चूँकि मनुष्य अपने उत्स काल से ही प्रकृति पर आश्रित रहा है, इसलिए इनकी संस्कृति मंे प्रकृति का दर्शन स्वाभाविक है। दैनिक जीवन हेतु उपयोगी जल, वायु, भूमि तथा वनस्पति प्रकृति की ही देन है। मनुष्य ने अपने जीवन में प्रकृति के विविध कला रूपों तथा संगीतमय नाद को आत्मसात कर अपने सांस्कृतिक जीवन को समृद्ध बनाया है। नदियों की कल-कल, छल-छल करती बहती धाराएँ, बादलों की गर्जना, पक्षीयों का कलरव, पक्षियों का कतारबद्ध उड़ान, थिरकन, चिटियों का कतारबद्ध चाल, सर्प का टेढ़ा-मेढ़ा चाल, हिरणों का उछल-कुद, हवा के झकोरों से झुमते वृक्ष का सुन्दरतम स्वरूप आदि का मनमोहक चित्रण लोकनृत्यों में समाहित है। अतः कहा जा सकता है कि लोकनृत्य प्रकृति प्रदत्त है। 

डाॅ. शरच्चन्द्र श्रीधर परांजपे की ‘‘भारतीय संगीत का इतिहास’’ के अनुसार ‘‘भारतीय परम्परा के अनुसार नटराज शिव नृत्य कला के आदि श्रोत है और ‘‘नृत्यकला का ताण्डव तथा लास्य रूप भगवान शिव तथा पार्वती की देन माना जाता है। लोक विश्वास के अनुसार भगवान शंकर एवं माता पार्वती को प्रकृति का ही रूप माना गया है तद्नुसार लोकनृत्य प्राकृतिक ऊपज है।’’1 छत्तीसगढ़ में प्रचलित लोकनृत्यों- पंथी, राउत, करमा, सुआ, परब, रीलो, गंवर, ककसार, डंडा, सरहुल आदि में प्रकृति के बहुरंगी छटा के दर्शन होते है। 

मानवीय बुद्धिमत्ता के अनुरूप लोक नृत्यों की रचना दीर्घ अवधि में हुआ है। एकाएक लोकनृत्य की संरचना नहीं हो सकती, ना ही लोक किसी भी नृत्य संरचना को एकाएक स्वीकार सकता है। कोई भी नृत्य तभी लोकनृत्य बन सकता है, जब उसमें सम्पूर्ण लोक की स्वीकृति हो। मनुष्य ने धीरे-धीरे अपने बौद्धिक विकास के साथ विविध प्रकार के पर्व-उत्सव, धार्मिक अनुष्ठान तथा शुभ अवसरों पर लोक मत के अनुसार लोकनृत्य निर्धारित किये है। लोकनृत्यों में रचना प्रक्रिया का दौर निरन्तर चलते रहता है। पूर्व निर्धारित नृत्य संरचना में नवीन प्रयोग को जब लोक स्वीकार कर लेता है, तब नवीन प्रयोग भी उस लोकनृत्य का प्रमुख अंग बन जाता है। यह क्रम आज भी गतिमान है। 



नाचा- ‘‘नाचा’’ छत्तीसगढ़ का सुप्रसिद्ध एवं जनप्रिय लोकनाट्य है। नाचा को यहाँ ‘‘नाचा-गम्मत’’, ‘‘नाचा-पेखन’’ तथा ‘‘नाच’’ आदि नामों से भी पुकारा जाता है। लोकनाट्य नाचा छत्तीसगढ़ के विविध कलाओं तथा इन्द्रधनुषी संस्कृतियों का गुम्फन है। यहाँ के सुमधुर लोकगीत, लोकवाद्य, लोकनृत्य, लोककथा, लोकगाथा, साखी लोकोक्ति, जनउला, रोचक साज-सज्जा तथा सरस संवादों का मनोहारी स्वरूप लोकनाट्य ‘नाचा’ में समाहित है। नाचा छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक पहचान है। नाचा में छत्तीसगढ़ के पर्व-उत्सव, तीज-त्यौहार, अनुष्ठान, मड़ई-मेले, खान-पान, रहन-सहन, खेल, श्रम, कृषि जीवन, विविध संस्कार तथा मान्यताओं का विशिष्टतम चित्रण होता है।

छत्तीसगढ़ी जनमानस प्रकृति की ममतामयी गोद में पुष्पित-पल्लवित तथा विकसित हुई है। छत्तीसगढ़ की जनता मानों अपना सम्पूर्ण जीवन प्रकृति प्रदत्त संगीतमय वातावरण मंे यापन करता हैं। लोकसंगीत तथा लोककला से समृद्ध और क्रियाशील विधा है- लोकनाट्य ‘‘नाचा’’।

नाचा छत्तीसगढ़ी लोक के शिक्षण, लोक चेतना तथा लोकानुरंजन का अद्वितीय माध्यम है। नाचा में छत्तीसगढ़ी लोकजीवन तथा लोक-संस्कृति के सुस्पष्ट चित्र प्रतिबिम्बित होते हैै। ‘‘नाचा’’ शास्त्र सम्मत नियमों, संवादों से बंधित रचना के विपरीत लोक के सहज, सरल एवं स्वच्छन्द भावनाओं का तात्कालिक अभिव्यक्ति है। 

लोकनृत्यों का सर्जक लोक या समाज है, तथा लोकनाट्य ‘नाचा’ का भी। जब दोनों के रचनाकार लोक ही है तो जाहिर है कि इनमें आपसी अंतर्सम्बन्ध स्वतः ही होंगे। लोकनृत्यों का नाचा से गहरा संबंध है। छत्तीसगढ़ में प्रचलित संभवतः सभी लोकनृत्यों का मंचन लोक कलाकार अपनी अभिरूचि के अनुरूप नाचा में इसका प्रयोग करता है। नाचा में संवाद, घटना, लोकगीत तथा प्रस्तुति के अवसरानुकूल विविध लोकनृत्यों- सुआ, करमा, पंथी, राउत, डंडा, देवार करमा आदि का मंचन करते है। ये लोकनृत्य ‘‘नाचा’’ को सबल बनाता है। ये लोकनृत्य जनता-जनार्दन के समक्ष नाचा को कलामय, रोचक तथा जीवन्त कर देता है। नाचा के विकास तथा समृद्ध होनें में लोकनृत्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

नाचा शब्द की उत्पत्ति में नृत्य ही प्रमुख हो ऐसा आभासित होता है।  ऐसा लगता है कि लोकनृत्यों के संवादात्मक तथा अभिनय सम्पन्न स्वरूप ही लोकनाट्य नाचा है, किन्तु ऐसा नही है। ‘‘नाचा’ या ‘नाच’ कहने से ‘नृत्य’ का अर्थ ध्वनित होता सा लगता है, किन्तु ‘नाच’ या ‘नाचा’ इतना ही नही है।’’2 नाचा केवल नृत्य ही नही है, अपितु लोकगीत, लोकनृत्य, लोककथा, लोकगाथा, लोक शिल्पकला, लोकोक्ति, साखी, जनउला, संवाद, रस तथा अभिनय का समूह है। लोकनृत्य नाचा का एक बहुपयोगी अंग है। 



लोकनाट्य नाचा के आरम्भ से लेकर आज तक लोकनृत्यों की रचना प्रक्रिया में नवीन प्रयोग निरन्तर चल रहा है। लोकनृत्य की रचना प्रक्रिया लोक के मंतव्य पर निर्भर होता है। चूँकि लोकनृत्य किसी शास्त्रीय या लिखित ताल या मात्राओं के बंधन से मुक्त होते है। इसीलिए इनमें परिवर्तन तथा संवर्धन निरन्तर गतिमान रहता है। 

नाचा प्रदर्शनकारी कला है। श्रोता तथा दर्शकों के रूचि को ध्यान में रखकर नाचा के  कलाकार अपने गीत, हावभाव तथा नृत्य में नवीन प्रयोग करते रहते है। जब लोक इसे स्वीकार कर लेता है, तो उसके नवीन प्रयोग सार्थक हो जाते है। 

मंचीय प्रस्तुति का प्रभाव- 

लोकनृत्यों तथा लोकनाट्यों में नवीन प्रयोग तभी सार्थक है, जब तक उनमें लोक संस्कृति की मूल परम्परा का पतन ना हो। इनके मूल तत्व अपने मौलिक रूप में जीवित रहे। 

मानवीय विकास तथा समय के अनुरूप आज लोगों की रूचियों में परिवर्तन आया है। वे लोकनृत्यों तथा लोकनाट्यों की प्रस्तुति में नवीन प्रयोग को पसन्द करने लगे है। कलाकारो की मानसिकता में भी परिवर्तन आया है। मंचों में आने से लोकनृत्य तथा नाचा का विश्व स्तर पर प्रचार-प्रसार हुआ है। मंच ने इन्हे विश्व स्तरीय ख्याति प्रदान किया है। मंचीय प्रस्तुति ने इन्हे एक क्षेत्र से निकालकर जन-जन तक पहुँचाया है। ‘मंच’ जहाँ लोगों को व्यवसाय दे रहा है, आय का प्रमुख साधन बन रहा है। वहीं लोक कलाकार लोगों के पसन्द को ध्यान में रखकर लोकनृत्यों तथा नाचा को सुन्दरतम् बनाने के भ्रम में इनकी मूल शैली में परिवर्तन कर रहे है। पारम्परिक लोकनृत्यों में विभिन्न प्रकार के आंगिक संचालन या नृत्यशैली (क्ंदबम ेजमचे) का अत्यधिक प्रयोग होने लगा है। ये नृत्य शैलियाँ लोकनृत्य में विविधता तो लाती है, किन्तु कहीं न कहीं मूल लोकनृत्य शैली पर हावी होते हुए दिखाई दे रही है। 

कलाकार अपने व्यवसाय, मंचीय दृष्टिकोण तथा लोगों के रूचि के अनुरूप प्रदर्शन करनें की आपाधापी में लोकनृत्यों में बहुत नवीनपन तथा परिवर्तन कर रहे है। जिससे लोकनृत्यों तथा लोकनाट्यों के मौलिक प्रकृति का ह्रास हो रहा है। 

लोकनृत्यों तथा लोकनाट्य नाचा के वेशभूषा एवं आभूषणों में भी समय के अनुरूप बाजारवाद के कारण भी अधिक परिवर्तन आया है। लोक में प्रचलित परम्परागत वेशभूषा एवं आभूषणों के स्थान पर बाजार में उपलब्ध सजावटी तथा आकृष्ट करने वाले कपड़ों तथा गहनों का प्रयोग बढ़ रहा है। यह परम्परागत लोकनृत्यों तथा नाचा के लिए अच्छे संकेत नहीं है। बाजारवाद तथा मंहगाई के कारण पारम्परिक वेशभूषा एवं आभूषणों के निर्माता के व्यवसाय पर भी प्रभाव पड़ा है। बाजार में उपलब्ध सस्ते एवं सजावटी शृंगार सामग्रियों के कारण परम्परागत आभूषण सामान्य लोगों के पहुँच से दूर हो गये है। इससे लोकनृत्यों तथा नाचा की मौलिकता पर गहरा प्रभाव पड़ा है। 

यदि ऐसे ही अनावश्यक प्रयोग लोकनृत्यों एवं नाचा में होता रहा तो निष्चित ही इनके मूल तत्व का पतन हो जायेगा। ऐसे प्रयोगों को देखकर ये लोकोक्ति चरितार्थ होते प्रतीत होती है-
‘‘आंजत-आंजत कानी होगे।’’

लोक कलाकारों, श्रोताओं, दर्षकों तथा हम सब की जिम्मेदारी है कि हम अपने परम्परागत लोकनृत्यों एवं नाचा के मूल तत्वों के संरक्षण एवं संवर्धन में अपना योगदान दें। ये लोककलाएँ लोक की अनमोल धरोहर तथा सांस्कृतिक पहचान है। 


मानकचंद टंडन 
लोकसंगीत एवं कला संकाय
 इं. क. स. वि. वि. खैरागढ़


संपादक

गोविन्द साहू (साव)

लोक कला दर्पण

Contact - 9981098720


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