कविता - मैं चल रही थी जिन राहों पर । वो मेरे बचपन की हसीन दुनियाँ थी ।





मैं चल रही थी जिन राहों पर ।
वो हमारे खेत की पगडंडियां थी ।
कच्ची ,ऊबड़ खाबड़ ,बेरंग सी ।
पेड़ों की छांव और मंद बहती हवा थी।
धूप में पसीने से गीली मेरी चुनरियां भी ।
वो ख़ुशी मुझसे आज भी जुदा न हुई ।
मैं चल रही थी जिन राहों पर ।
वो मेरे बचपन की हसीन दुनियाँ थी ।

बारिश में कीचड़ से सनी, मेरी ये जूतियाँ थी ।
राह में मेढकों की टरटर्राती दुनियाँ थी ।
इंद्रधनुष में छुपी कई खुशियां थी ।
आधे गिले ,आधे सूखे छतरी में एक गुडिया थी ।
मैं चल रही थी जिन राहों पर ।
वो मेरे गाँव की सुनहरी गालियां थी ।
मैं चल रही थी जिन राहों पर ।
वो मेरे बचपन की हसीन दुनियाँ थी ।

सर्द हवा से भीगती मेरी वो कम्बल थी ।
बैठी रही अँगीठी पर गुनगुनाती अल्हड़ सी ।
गर्म चाय की प्याली में, शक्कर कुछ ज्यादा थी ।
घास हमारी, ओस की बूंदों से लदी हुयी ।
मैं चल रही थी जिन राहों पर ।
वो मेरे घर की खामोश अँगना थी ।
मैं चल रही थी जिन राहों पर ।
वो मेरे बचपन की हसीन दुनियाँ थी ।

आज हूँ मैं जिन राहों पर ।
वो भीड़ से है भारी हुई ।
कुछ खट्टी ,कुछ मीठी अटपटी फुलझड़ी सी ।
दिखावे की चमक से परोसी गयी ।
आशमां भी इसके आगे दिखती छोटी सी ।
मैं चल रही हूँ जिन राहों पर ।
शहरों की ये दुनियां नयी ।
मैं आज हूँ यहाँ अपने बचपन को सोच रही ।
मैं चल रही थी जिन राहों पर ।
वो मेरे बचपन की हसीन दुनियाँ थी ।

गायत्री साहू

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