कविता - *बारिश*

   
  
विधा - *मुक्तक* 
*साँची - सुरभि*

चली पूर्वा सुहावन है हुई बारिश बड़ी प्यारी ।
शुभे रिमझिम फुहारों से भिगोती है धरा सारी ।
घिरे श्यामल जलद प्यारे करे गर्जन भयावह सा ।
बिखरती बूँद मोती सी करे छमछम लगे न्यारी ।।1।।

बहे जलधार गलियों में टपकता नीर छप्पर से ।
झमाझम हो रही बारिश बहे रस धार अंबर से ।
चमकती दामिनी देखो करे कंपित हृदय तल को ।
मगन हो मोर नाचे है करे है प्रीत जलधर से ।।2।।

मचाता शोर है दादुर बुलाता मेघ आ जाओ ।
सुनाकर गीत झिंगुर भी करे स्वागत चले आओ ।
हुई हर्षित धरा सारी बुझी है प्यास बरसों की ।
लगे बारिश बड़ी भावन मल्हारी राग सब गाओ ।।3।।

हुई है पूर्ण सर सरिता तटों का बंध तोड़ी है ।
नदी अल्हण हुई बहती सभी संकोच छोड़ी है ।
हुई है बावरी देखो चली मिलने पिया सागर ।
करे झंकार पायल की जलधि से नेह जोड़ी है ।।4।।

     इन्द्राणी साहू"साँची"
    भाटापारा (छत्तीसगढ़)     

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