कविता - नारी


नारी है सृष्टि सृजन का, नारी शक्तिपुंज हैं, नारी तू नारायणी है।
कल- कल कल -कल नदिया बहती।।
चार बलों की शक्ति अलौकिक, वेदमाता कहलाती है।
रामचरित्र मानस में भी तू ही है।
छत्तीसगढ़ की पावन माटी में तू ही है मां।
भारत के इतिहास में तू ही है समाई।
जगत के पालन-पोषण, सबको जीवन देती हो।
आपका  मूल्यांकन कर पाना, असंभव है।
नारी ही तो गुरु होती है, नागरिकों को वही बनाती ।
भावी पीढ़ी को संस्कारित कर,
निज गुरूतर दायित्व निभाती।
देश आज संकट में फिर है
आज भी तुलसी , मुलेठी, पिपरी 
बनकर, औषधि का रूप में जग  की रक्षा करती हो।
तुम नारी शक्ति,स्वरूपा हो, तुम प्रेम हो, तुम गीत हो, तुम मीत हो
तुम संगीत हो, सावन की निर्झर बहती धारा में, तुम प्रियसी हो।
मेरी मोहनी, मेरी कल्पना, मेरी आरती, मेरी निशा, मेरी उषा, मेरी प्यारी सी दुलारी बेटी,"हो तुम" 


                                       सीमा साहू

टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां