12 अगस्त श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष


12 अगस्त श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष

शीर्षक  :-   जीवन अंधकार में दीप स्तंभ- श्री कृष्ण

      'श्री कृष्ण'वह नाम है जिसे समग्र विश्व के इतिहास में हम एक ऐसे पुरुष के रूप में देखते हैं जिनका व्यक्तित्व साढ़े पाँच हज़ार वर्ष बाद भी टिका हुआ है और जनता के हृदय सिहासन पर आज भी विराजित हैं। और सृष्टि पर्यंत उनका यह आधिपत्य रहेगा। श्री कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम थे जबकि श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम। श्री कृष्ण पूर्णावतार थे।उनमें सभी कलाएं विद्यमान थीं। अगर हमें श्रीराम और श्रीकृष्ण को समझना है तो सुबह और मध्यान्ह के सूर्य को देख सकते हैं। सुबह के सूर्य को हम बहुत आसानी से तो नहीं परंतु देख सकते हैं, ठीक वैसे ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम थे। मध्यान्ह या दोपहर के सूर्य को देख पाना अत्यंत कठिन है। ठीक वैसे ही पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण हैं। तेज की दृष्टि से दोनों में कोई अंतर नहीं किंतु दोपहर के सूर्य के सामने हम आंख नहीं कर सकते। भगवान श्री कृष्ण जैसी महान विभूति, उनके चरित्र जैसा महान चरित्र केवल महाभारत में ही नहीं, सारे जगत में अन्यत्र दृष्टिगोचर नहीं होता है।

      श्री कृष्ण को शास्त्र और पुराणों में एक और नाम से अभिहित किया गया है -पुष्टि पुरुषोत्तम।'पुष्टि' का अर्थ है कृपा या अनुग्रह करने वाला। पुरुषों में वह अति उत्तम पुरुष जो अपने समीप आए लोगों पर कृपा करता हो। उनकी कृपा को अहैतुकी कृपा भी कहा जाता है। जिसका सरल सा मतलब है बिना कारण या हेतु के अपने पास आए भक्तों का कल्याण। भले ही भक्त किसी कारण से आया हो किंतु श्री कृष्ण अकारण ही कृपा करते हैं। अपने भक्तों को हर दृष्टि से संतोष प्रदान करने वाले हैं श्रीकृष्ण। इसीलिए उन्हें पुष्टि पुरुषोत्तम भी कहा जाता है। आप स्वयं इस बात को समझ सकते हैं। श्री कृष्ण के जीवन में जो कोई भी आया सब के सब उपकृत होते चले गए। सुदामा को 'श्री क्षय' से 'यक्ष श्री' भी उन्होंने ही बनाया। द्रोपदी के धागे को उन्होंने उसकी अस्मिता से जोड़ दिया। कुंती के दुखों को उन्होंने परमसुख में परिवर्तित कर दिया और दुर्योधन का कल्याण करते हुए उसे पुनः 'सुयोधन' बना दिया। यहां हमने कुछ ही उदाहरण रखे हैं।

      कृष्ण जन्माष्टमी के इस पावन प्रसंग पर उनके  कार्यों का भी स्मरण किया जाना चाहिए। उनके कार्य भी उन्हीं की तरह विलक्षण से थे। जितने भी कार्य उन्होंने किए या करवाए सभी रहस्य से भरे हुए हैं। कोई भी उनकी मंशा की थाह प्राप्त ही नहीं कर पाया। तब जब वे थे और अभी भी विद्वान सिर धुनते रह गए परंतु कुछ भी समझ नहीं पाए। उनके श्रीमुख से निःसृत 'गीता' भी आज रहस्य बनी हुई है। कोई भी मनीषी विद्वान या तत्व चिंतक पूरे विश्वास से यह नहीं कह सकता कि 'मुझे गीता आती है।' गीता जी का संपूर्ण अर्थ जिसे समझ आया हो ऐसा व्यक्ति आज तक इस संसार में पैदा नहीं हुआ है! इस ग्रंथ का परायण करने वाले भी यह मानते हैं कि प्रतिदिन गीता कुछ ना कुछ नए तत्व देती है। जिस श्लोक का जितना अर्थ आज आपने समझा वही श्लोक दूसरे दिन पढ़ने पर कुछ और ही अर्थ देगा या संकेत करेगा। इसीलिए आद्य शंकराचार्य से लेकर आज के पंडितों तक ने गीता में से कुछ ना कुछ तत्व- शोधन किया ही है। यह अवश्य है कि गीता को अब तक लोगों ने पढ़ा है। गाया है और अपने अपने हिसाब से अर्थ किया है। इससे अधिक कुछ नहीं है।

      'काल' सभी को मिटाता है। चराचर जगत उसका ग्रास है। शास्त्रों में यह उल्लेख भी मिलता है कि काल का पुरुषार्थ प्रत्येक वस्तु में से रस खींच लेने का है। 'कालः पिबति तद्रसं।' वह इसमें प्रवीण है किंतु सदियां बीत गई भगवान श्री कृष्ण को काल 'नीरस' नहीं कर पाया। श्री कृष्ण 'रस' के अथाह सागर हैं। जो कोई भी उनके पास जाएगा वह इस 'रस' का आस्वादन कर सकता है। इसी रस को सूर ने  पाया, मां मीरा ने पाया, चैतन्य महाप्रभु आदि ने पाया। हम भी श्री कृष्ण अमृत रस का पान करें और अपने जीवन को धन्य बनाएँ।


      डॉ. लोकेश शर्मा, गायत्री नगर, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) मोबाइल नंबर- 96915 62738

     

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