15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस (74 वां ) पर विशेष

 

शीर्षक :-  'स्वराज्य' को समझना होगा


      यह हमारा 74 वां स्वतंत्रता दिवस है। पूरा देश आज के दिन अपने सभी ज्ञात और अज्ञात स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को कृतज्ञतापूर्वक याद करेगा। ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि स्वतंत्रता हमें अपने अनगिनत स्वराजियों की बदौलत मिली है। समूचा राष्ट्र कृतज्ञ हो जाता है अपने वीर सपूतों के प्रति। राष्ट्र का कृतज्ञ होना ही अपने आप में बड़ी बात होती है। राष्ट्र से तात्पर्य वहां का कण- कण है। जिसमें मनुष्य से लेकर सारी चीजें आ जाती हैं। ऐसे में पूरा का पूरा देश आजादी के अपने रणबांकुरे को श्रद्धा- सुमन अर्पित करते हुए, उनके प्रति आभार व्यक्त करता है। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस ऐसे दो अवसर होते हैं जब हम आजादी के वीरों को हृदय की गहराइयों से याद करते हैं। उनके योगदानों का पुण्य स्मरण करते हुए आज की पीढ़ी को उनकी गौरवगाथा से परिचित कराते हैं ताकि आज की पीढ़ी को ज्ञात हो सके कि जिस आजाद भारत में वे सांसे ले रहे हैं, वह भारत उन्हें किनकी बदौलत हासिल हुआ है।



     आलेख तैयार करने का मंतव्य कुछ एक बातों को नए सिरे से सोचने का है जिन्हें हम बार-बार सुनते हैं परंतु उसके निहित अर्थ को शायद बहुत अच्छे से हम नहीं समझ पाते। महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाल गंगाधर तिलक जी ने एक नारा दिया था-' स्वराज (स्वराज्य) हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे।' यहां इस नारे का अर्थ है अपना भारत। वह भारत जो तब अंग्रेजों के अधीन था। उसे प्राप्त करना। एक शिक्षक होने के नाते मैंने कई बार यह महसूस किया कि स्वराज्य के अर्थ को लोग अपने अपने ढंग से लेते हैं। इसका 'अपना देश' अर्थ करने वाले तो सही हैं परंतु कई इसका अर्थ स्वयं को शासक या हुक्मरां मानने में लेते हैं। और यहीं से ग़लती शुरू होती है। दूसरा अर्थ लेने वाले व्यक्ति, समूह या पार्टियां फिर देश के लिए और समाज के लिए उपयोगी नहीं बन पाती। 'स्वराज्य' का वास्तविक अर्थ क्या है! इसका सामान्य सा अर्थ है -जहां के शासक वहीं के लोग हों। यहां स्पष्ट है 'लोग' ना कि व्यक्ति, समूह या कोई पार्टी। इसी अर्थ से 'लोकतंत्र' को समझा जा सकता है। अब यही लोग 'लोकतंत्र' में अपने जनप्रतिनिधियों के जरिए देश का कार्य करते हैं। देश पर शासन नहीं। जहां 'शासन' करने की बात आती है वहां शक्ति का प्रदर्शन होता है और लोकतंत्र या स्वराज्य के संदर्भ में 'शक्ति' का स्थान गौण है।

      आजादी के बाद से अब तक देश को शासक अधिक मिले हैं पार्टियों के रूप में देश को चलाने वाले या देश का कार्य करने वाले कम मिले हैं। तिलक जी का 'स्वराज्य' देश के लिए कार्य करने वालों का स्वराज्य है ना कि देश पर शासन करने वालों का। स्वराज्य के लिए आंदोलन करने वाले स्वराजी यही चाहते थे कि देश को आगे बढ़ाने वाले हमारे वतन के हों ना कि अंग्रेज। आज के परिप्रेक्ष्य में हमें इसी 'स्वराज्य' को अच्छी तरह समझना होगा क्योंकि स्वराज्य की स्वतंत्रता बनी रह सकती है किंतु 'राज' की सत्ता कभी भी दूसरे के हाथों में जा सकती है। इसलिए हमें स्वराज्य की चिंता करनी है। हमें 'राजा' या 'शासक' नहीं बनना है। जो देश को आगे बढ़ाने का, देश को समृद्ध एवं विकसित करने का संकल्प लेकर आते हैं यह भारत उनका है। उनके लिए ही यह 'स्वराज्य' है। इस आलेख के संदर्भ में मुझे यहां पर दुष्यंत कुमार का एक शेर याद आता है। यहां इस शेर की प्रासांगिकता या अप्रासांगिकता का निर्णय प्रबुद्ध पाठक वर्ग के हाथों में है। शेर कुछ इस तरह है-
      वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
      मैं बेकरार हूं आवाज में असर के लिए


   
  
डॉ.लोकेश शर्मा, गायत्री नगर, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) मोबाइल नंबर- 96915 62738

      

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