ऐतिहासिक है छत्तीसगढ़ का प्राचीन धरोहर स्थल मल्हारगढ़

मां डिडनेश्वरी देवी

ऐतिहासिक है छत्तीसगढ़ का प्राचीन धरोहर स्थल मल्हारगढ़

छत्तीसगढ़ राज्य के न्यायधानी बिलासपुर जिले से मात्र ३० किमी दूरी पर बसा ग्राम मल्हार जनपद पंचायत मस्तुरी के अंतर्गत सन २००८ में उन्नयन होकर नगर पंचायत बना। यह स्थान अनेक दृष्टिकोण से ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक महत्व का है जो इतिहास के अनेक तथ्यों को अपने अंदर संजोया हुआ है। इसके साथ ही यहां के लोगों ने अपना कर्तव्य समझते हुए इस धरोहर को बचाए और बनाए रखने में अपना योगदान दिया है। यहां की आधी आबादी निषाद, मल्लाह, केंवट तथा शेष अन्य जाति और धर्म के लोगों का है। मल्हार नगरी अरपा, लीलागर और शिवनाथ नदी से घिरा हुआ है, यहां मल्हार महोत्सव सन १९८५ से प्रारंभ है। इसी तरह सन १९३६ से १५ दिवसीय मल्हार मेला प्रति वर्ष यहां आयोजित होता है। इस नगरी में छ: आगर छ: कोरी अर्थात १२६ तालाबों की संख्या बताई जाती है पर अब इनकी संख्या के हिसाब से तालाब दिखाई ही नहीं देते। इस स्थान की प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रतिदिन भक्त गण व विदेशी पर्यटक इस स्थल पर घूमने आते रहते हैं। आजादी के पूर्व ग्राम मल्हार सहित ८४ ग्रामों की जमींदारी साव परिवार के अधीन आता था। यहां ऐसी भी मान्यता है कि किसी जमाने में यहां सोने की वर्षा हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप आज भी बरसात में पानी गिरने से मिट्टी का बहाव होने पर प्राचीन सिक्के व मोहरे जमीन पर बहते कभी कभी दिखाई देते हैं।



इस स्थल में मां डिडनेश्वरी देवी मंदिर, पातालेश्वर मंदिर, देऊर (भीम-कीचक) मंदिर तथा परघनिया थाना क्षेत्र मल्हारगढ़ की पहचान हैं। इसी तरह रामायणकालीन बाली सुग्रीव वध, नरसिंह अवतार, दुर्गाजी, दत्तात्रेय भगवान, अर्धनारीश्वर स्वरूप और सुरसा द्वारा हनुमान जी को निगलने वाली कृति जैसे और भी अनेक अनोखी कलाकृतियां मौजूद हैं।

स्व. रघुनंदन पांडेय ने अपना पूरा जीवन प्राचीन धरोहरों, पुरातात्विक इमारतों और यहां की ऐतिहासिकता को संजोए रखने के साथ ही पर्यटकों की नि:स्वार्थ सेवा में अपना सर्वस्त्र लगा दिया। इस उल्लेखनीय कार्य के लिए सन १९८४ में तत्कालीन राष्ट्रपति स्व. ज्ञानी जैल सिंह द्वारा विज्ञान भवन नई दिल्ली में आपको पुरस्कृत किया गया। रघुनंदन पांडेय जी का घर बाहर से तो एक सामान्य मकान दिखता है किन्तु भीतर अनेक दुर्लभ वस्तुओं का संग्रहण दिख जाता है, जिसमें लौह पत्र, ताम्र पत्र, शिलालेख प्राचीन सिक्के, मुहरें और मूर्तियां मौजूद हैं। इसी तरह का विशाल संग्रह एक और पुरातत्व प्रेमी स्व. ठाकुर गुलाब सिंह जी के घर में भी दिखाई देेता है जिन्होंने अपना सारा जीवन पुरातत्व संग्रहण में लगा दिया।

मल्हार गढ़ में मेला चौक से एक गली जाता है जिसे लोग इमली पारा कहते है। यहां पर पहले एक बहुत बड़ा इमली का वृक्ष था, जिसके नीचे मल्हार का प्रथम नवधा रामायण शुरू हुआ था। यहीं पर बने एक कमरे के अंदर काले चमकदार पत्थर से निर्मित जैन महावीर स्वामी, बजरंगबली, गणेश जी और शिव-पार्वती सहित अन्य सुंदर मूर्तियां रखी गई हैं।



मल्हार के मुख्य मार्ग से ग्राम बुटीखार के किनारे खैमा तालाब के ऊंचे टीले पर एक आदमकद लाल बंदन से रंगी मूर्ति है जिसे लोग परघनिया बाबा के नाम से जानते हैं जो वास्तव में स्वामी महावीर हैं। यह प्रतिमा ११-१२ वीं शताब्दी की बताई जाती है। छत्तीसगढ़ में इतनी बड़ी जैन महावीर की प्रतिमा कहीं नहीं है। यहां की देखरेख की व्यवस्था ग्रामीणों द्वारा की जाती है। इस मंदिर में दोनों नवरात्रि में भक्तों द्वारा ज्योति कलश प्रज्जवलित की जाती है।

मल्हार के हाईस्कूल के पास टिकरीपारा में ठाकुर देव हैं जहां भक्त नियमित पूजा अर्चना करते हैं, शादी ब्याह के लिए देवतला का रस्म यहीं पूरा किया जाता है। कुर्रूपाठ के पास बरमबाबा का मंदिर, शिवसागर तालाब के पार में है। शीत बाबा मंदिर, सतबहिनिया मंदिर और कन कन कुंआ के अलावा अनेक गढ़ के अवशेष मौजूद यहां दिखाई देते हैं। इसके साथ ही जब भी खुदाई की जाती है कुछ न कुछ अवशेष प्राप्त होते रहते हैं।


 राजेश पांडेय

 पोष्ट मास्टर

 मल्हारगढ़ छ .ग.


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