हरितालिका व्रत (तीजा उपास)


"हरितालिका व्रत"(तीजा उपास)


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हरितालिका व्रत सर्व प्रथम पार्वती जी के द्वारा किया गया था । कहा जाता है उनके पिता महाराज हिमालय ने पार्वती जी का विवाह विष्णु जी से करने के लिए तैयार हो गए थे। पर पार्वती जी मन ही मन मे  भूतेश्वर को वरण कर चुकी थी। ये बात अपनी माँ मैना देवी को पहले से बता रखी थी । पर पिता हिमालय राज अवघट दानी को बिल्कुल पसंद नही करते थे।और अपनी लाडली पुत्री का विवाह भगवान शेषधर से करना चाहते थे।
   मैना देवी के बहुत समझाने पर भी दोनों अपने - अपने जिद्द में अड़े रहे ।
   एक दिन पार्वती जी अपने हृदय का पीड़ा अपने सखियों को सुनाई।
सखियों ने पूरी बातो में गम्भीरतापूर्वक विचार कर अपनी सखी पार्वती को समझाया की तुम राजमहल का त्याग कर वन में चले जाओ इसी में भलाई है। सखियों की बात पार्वती जी को भा गई और महल छोड़ सखियों के साथ वन में चली गई ।
    घने जंगलों में सखियों के साथ भूखे प्यासे घूमती रही।
जंगल मे मिलने वाली कन्द मूल ,कड़वे फलों को खा कर काट रही थी । भाद्र मास ,शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि को घने वन में ही नदी के किनारे बालू से भगवान भोलेनाथ का लिंग बना कर सखियों के साथ जंगली फल ,फूल और सूखे हुए बेल पत्र को लिंग में अर्पण कर बिना अन्न ,जल लिये चौबीसों घण्टे तपस्या करतीं रही। पार्वती जी और सखियों की तपस्या को देख कर भगवान भोले से रहा नही गया और
त्रिशुल धारी पार्वती जी के सामने प्रगट हो गए। भगवान को देख कर पार्वती बेहोस हो गई ।
      कुछ देर बाद होश में आने पर भगवान शंकर जी पार्वती जी से पूछे कि तुम्हें क्या चाहिए ?
पार्वती जी कहा भगवन! मैं आप को पति के रूप में पाना चाहती हूँ। भगवान शंकर एवमस्तु कह कर अंतर ध्यान हो गये।उसी समय पूरे राज सैनिक सहित राजा हिमालय , माता मैना वहाँ पहुंचे और सखियों संग पार्वती जी को घर ले  गए।
उसके बाद भगवान भोलेनाथ से पार्वती जी के विवाह पूरे विधि - विधान के साथ सम्पर्ण कर धन - धान्य , रुपया - पैसा , वस्त्र ,छप्पन प्रकार का मेवा  मिष्टान के साथ विदा किये।
     उस दिन से आज तक हरितालिका व्रत पूजन महिलाओं के द्वारा अपने पति के लम्बी उम्र की कामना से किया जाता है। कहीं - कहीं पर इस व्रत को कुमारियाँ भी अच्छे पति प्राप्ति हेतु रखतीं हैं । यह त्योहार छत्तीसगढ़ ही नही अपितु देश के कई अन्य राज्यों में भी मनाया जाता है।

           इस व्रत को करने से एक दिन पहले व्रत धारी महिलाएं का  अपने सखियों के घर घूम - घूम कर  कड़वा खाने का नियम है । वो इसलिए कि जंगल में पार्वती जी सखियों के साथ कड़वे कन्दमूल , कड़बे फल, कड़वे वृक्ष की पत्तियों को खाकर निर्जला रह कर तपस्या की थीं।

इस त्योहार में विभिन्न प्रकार के पकवान बना कर व्रत का परायण किया जाता है। जिस प्रकार माता मैना अपनी पुत्री को गोद मे बैठा कर छप्पन प्रकार का पकवान मेवा ,मिष्टान खिला कर निर्जला व्रत का परायण कराई थी , पुराने चिथड़े हुए वस्त्र को उतार कर नया वस्त्र धारण कराई थीं । उसी प्रकार आज भी माँ - बाप के द्वारा बेटियों को नई वस्त्र भेंट कर ससुराल के लिए किया जाता है । 

पुष्पा ग़जपाल "पीहू"
महासुमद (छ. ग.)

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