जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी * वाक्य को सार्थक करती बालकहानी


                           // जननि जन्मभूमिश्च //
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            पेण्ड्रीगिरि श्रृंखलाओं से निकली खेगड़ी नदी की पचेड़ावन पर विशेष कृपा थी। खेगड़ी के जल के कारण पचेड़ावन की तलछटी कछारभूमि बहुत उपजाऊ थी। तभी तो वन तरह-तरह के पेड़-पौधों से आच्छादित था ; साथ ही विभिन्न अरण्यपुष्पों की महक यहाँ की शीतल वायु में घुली हुई थी। स्वादिष्ट फल, कंद-मूल एवं औषधियुक्त लताएँ खेगड़ीनदी की ही देन थी। वन्यप्राणी स्वच्छ नीलगगन तले हरीतिमा बिखेरती धरा पर स्वतंत्र विचरण करते थे। सब जीव-जंतुओं का अपना अलग समुदाय था; और हर समुदाय का एक मुखिया। सब अपने समुदाय में बहुत खुश थे ; निश्चिंत थे। यहाँ चैन की बंशी बजती थी।
            जंगल के उत्तर दिशा में नदी से कुछ ही दूरी पर एक विशाल चट्टाननुमा पथरीली जगह थी; जो चूहों का निवास क्षेत्र था। यह स्थान शैलभूमि कहलाता था। हर प्रजाति के चूहे बिल बनाकर निर्भीक होकर रहते थे। वे कहीं भी जाते थे तो हमेशा एक साथ। आवश्यकता पड़ने पर वे दुश्मनों पर एक साथ टूट पड़ते थे। खतरे का आभास होने पर वे कान व पूँछ से ईशारा या एक विशेष आवाज निकालकर एक-दूसरे को सतर्क करते थे। इनके प्रेमभाव, एकता व सहयोग का वन्यप्राणी जी खोलकर तारीफ करते थे।
            एक बार की बात है। पचेड़ावन में भयंकर तूफान आया। पेण्ड्रीगिरि तक हिल गयी। खेगड़ी के जल में उथल-पुथल मच गया। सारे जलजीव थर्रा गये। विशाल विटपदल धराशायी हो गये। फूल, फल एवं पत्तों से सारा जंगल पट गया। इस प्राकृतिक आपदा से सीमावर्ती क्षेत्रों को भी हानि उठानी पड़ी। जंगल के इस विप्लव परिवर्तन ने शैलभूमि के चूहों के जीवन को झकझोर कर रख दिया। अधिकांश चूहे अल्लाह को प्यारे हो गये। कई परिवार को तुरंत शैलभूमि को छोड़ना पड़ा। कुछ परिवार का अन्यत्र प्रस्थान जारी ही रहा। अंततः एक ही परिवार बचा; जिसमें एक बूढ़ी माँ ,और उसका एक बेटा। दोनों माँ-बेटे ने अपना भरा-पूरा खो चुका था। कदाचित् वे जीवनपर्यंत दुःख व संताप झेलने बच गये थे। यह मिनी चुहिया अक्सर अपने युवा पुत्र को अन्यत्र चले जाने को कहा करती थी; पर समझदार व मातृस्नेही पुत्र वीरू अपनी माँ को इसी जगह पर ही रहने के लिए मना लिया करता था, भले ही इस तरह दोनों माँ-बेटे का यहाँ रहना दूसरों को बड़ा आश्चर्य लगता था।
             आज सुबह मिनी चुहिया सुबक रही थी। वीरू ने देखा; कारण समझ ही नहीं पाया, और चुप रहा। मिनी की आँखों से आँसू बह ही रहे थे, तब आखिर वीरू से नहीं रह गया। पूछा- ' माँ, क्या बात है, क्यों रो रही हो? मेरी कोई बात लग गयी क्या, माफ करना माँ अगर मेरी कोई गलती हो तो । '
            ' नहीं... नहीं... बेटा। ऐसी कोई बात नहीं है। मैं सोचती हूँ कि मेरे मरने के बाद तुम्हारा क्या होगा। हमारे सगे-सम्बंधी व जाति-बिरादरी वाले सब चले गये। हम दोनों ही रह गये। अब तो मेरा बुढ़ापा भी आ गया। कुछ नहीं कर सकती मैं अब। तुम जवान हो गये हो। तुम्हारा सारा जीवन पड़ा है। अब मेरा क्या; आज हूँ, कल नहीं।'
           ' नहीं माँ, ऐसा मत कहो। तुम जियोगी अभी। आखिर तुम्हारी सिवाय कौन है मेरा इस दुनिया में।' वीरू अपनी माँ के पास जा पहुँचा।
            ' हाँ बेटा, मैं सच कह रही हूँ। एक काम करो बेटा, तुम ही यहाँ से चले जाओ। अब यहाँ बहुत खतरा है। शैलभूमि पहले जैसी नहीं रह गयी। अब अपने ढंग से जीयो। मेरी हाल-चाल जानने कभी-कभार आ जाया करना।' मिनी आँसू पोंछते बोली।
           ' माँ, मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जा सकता। दोनों रहेंगे एक साथ। तुम्हारी जिम्मेदारी मैं उठाऊँगा। आखिर इस बुढ़ापे में तु्म्हें भला मैं कैसे छोड़ सकता हूँ। पिताजी व भाई-बहन सब स्वर्ग सिधार गये। अब तुम ही मेरी सब कुछ हो।' वीरू का रुआँसा स्वर निकला। दोनों की आँखें भीगी हुई थी।
           देखते ही देखते तीन महीने गुजर गये। आज सुबह वीरू ने अपनी माँ को खाना खिलाया। खुद भी खाया; और भोजन के लिए पण्डेलकच्छार जा रहा हूँ, कहकर निकला। जाते समय बिल के मुँहाने पर एक पत्थर टिका दिया। दो-चार कदम ही चला था कि उसे अचानक साँप आते हुए दिखाई दिया। वह तो सुरडोंगरवन की गणिका नागिन थी। वीरू चूहे को बिल से निकलते हुए उसने दूर से देख लिया था। वीरू के करीब जाकर फू्ंकारा- ' कौन हो तुम?' गणिका नागिन का भयानक रूप देख वीरू काँप गया। उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम होने लगी।
           ' मैं... वीरू... चूहा हूँ। ' बड़ी मुश्किल से वीरू के मुँह से चंद शब्द निकले।
          ' यह किसका बिल है, क्यों बंद कर रहे हो ?' गणिका ने वीरू की ओर सरकते हुए पूछा।
          ' यह हमारा बिल है।' वीरू पीछे खिसकते हुए बोला।
          ' हमारा... मतलब...?' गणिका ने अपना फन उठाया।
          ' मतलब... मैं और मेरी बूढ़ी माँ यहाँ रहते हैं। वह घर पर है। वह कहीं नहीं जा सकती है। मैं भोजन तलाशने जा रहा हूँ। ' वीरू ने सकपकाते हुए कहा।
         ' ठीक है, तुम्हारा बिल है, पर अब मुझे रहना है यहाँ। तुम दोनों माँ-बेटे यहाँ से कहीं चले जाओ।' आँखें तरेरती हुई गणिका बोली।
         ' नहीं... नहीं... हम नहीं छोड़ नहीं सकते अपना घर। नहीं... नहीं... न तो मैं अपनी माँ को छोड़ सकता हूँ, और न ही अपनी यह शैलभूमि।' चीं-चीं चीं-चीं करते हुए वीरू के स्वर में दर्द था।
          ' कारण ? ' गणिका ने अपनी पूँछ हिलाते हुए क्रोध जताया।
          ' माँ को मैं छोड़ नहीं सकता क्योंकि वह मेरी माँ है, मेरी जननी है; और इस धरा को भी नहीं छोड़ सकता , क्योंकि यह मेरी जन्मभूमि है। इस मिट्टी में मैं पला हूँ , बड़ा हुआ हूँ। यह सम्भव नहीं है।' वीरू ने बड़े साहस के साथ सर उठाते हुए बोला।
          वीरू की बात सुनकर गणिका को बहुत गुस्सा आया। फन पटककर आगे बढ़ी ; और वीरू को पूँछ से लपेट लिया। डरा-सहमा वीरू के मुँह से आवाज निकली- ' माँ!'। ' माँ ' शब्द मिनी के कानों पर पड़ी। उसे लगा कि उसका बेटा खतरे में है। वह तुरंत बिल से बाहर आई। अजीब सी घूरती आँखों वाली गणिका नागिन की पूँछ से लिपटे अपने बेटे वीरू को पहचान लिया। फिर उसने पूछा- ' क्या हुआ? आखिर मेरे बेटे को तुमने क्यों पकड़ रखा है? आपसे मेरी विनती है, छोड़ दो मेरे बेटे को। क्या बिगाड़ा है उसने तुम्हारा?'
          तदुपरान्त गणिका ने पुनः अपनी पूरी बात रख दी। इस पर मिनी चुहिया ने कहा- हाँ , हम यहाँ से चले जाएँगे। अब तो छोड़ दो मेरे बेटे को।'
            ' नहीं माँ...! हम अपनी जन्मभूमि को छोड़कर कहीं नहीं जाएँगे। इन्हें रहना है तो कोई दूसरा स्थान क्यों नहीं ढूँढ़ लेती? ' वीरू ने भी हिम्मत दिखाई।
           माँ-बेटे को देखकर गणिका क्रोधित हो गयी- ' नहीं छोड़ोगे तो ...तुम दोनों को मारकर खा जाऊँगी। मरने के लिए तैयार हो जाओ।' जैसे ही वह अपना मुँह खोलने लगी; पूँछ की पकड़ ढीली हुई। फिर तुरंत वीरू झटके के साथ अलग हुआ और अपनी माँ के पास जाकर उसे पीछे धकेलते हुए कहा- ' तु्म्हें अगर हमें खाना ही है तो पहले मुझे खाओ।'
            ' नहीं बेटा, नहीं... पहले मुझे खाने दो। मैं बूढ़ी हो चुकी हूँ। अब मेरी जिंदगी वैसे भी कम ही दिनों की है। तु्म्हें अभी जीना है संसार में।' मिनी फौरन वीरू के आगे आ गयी।
           ' नहीं माँ , यह नहीं हो सकता। मेरे रहते तुम नहीं मर सकती; और मेरी ही आँखों के सामने। असम्भव... असम्भव...!' माँ , तुमने मुझे जन्म दिया है। पाला है, बड़ा किया है। मैं तु्म्हें नहीं छोड़ सकता माँ। और न ही अपनी शैलभूमि को। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।' तभी इस तरह मरने-जीने की होड़ मे लगे माँ-बेटे को कुछ  स्वर सुनाई दिया।
               ' धन्य हो तुम दोनों माँ-बेटे! धन्य है तू मिनी चुहिया कि तुम वीरू जैसे बेटे की माँ हो। तू धन्य है वीरू बेटा! तुम धन्य हो मेरे लाल। अपनी माँ के प्रति इतना प्रेम व सम्मान और इतनी कर्तव्यपरायणता। मैं बहुत खुश हूँ पुत्र तुम्हारी मातृभक्ति से। आज मैं भी धन्य हो गयी वीरू तुम्हें देखकर। तुम्हारी जन्मभूमिस्नेह देख मेरी छाती चौड़ी हो गयी।अपने जन्मधरा के प्रति लगाव अभिव्यक्त कर मेरा सर ऊँचा कर दिया तूने पुत्र। काश! मेरी कोख से जन्मा हर बच्चा तुम्हारी ही तरह होता। ' कहते हुए चार सिहों का लगाम व तिरंगा थामे भारतमाता बड़े गर्व से नीलगगन को निहार रही थी।
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@ टीकेश्वर सिन्हा "गब्दीवाला'
      व्याख्याता (अंग्रेजी )
शास.उच्च. माध्य. विद्यालय - घोटिया
जिला - बालोद ( छ.ग.)

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