हमारे छत्तीसगढ़ की दाई-माई और बेटी-बहिनी का एक उपसहा तीज-त्यौहार : तीजा पर छत्तीसगढ़ी लेख


दीदी देखत होही लोटिया मा पानी धरे 

              

         " लोटिया मा पानी धरे दीदी देखत हो ही....भइया आवत हो ही पोरा के रोटी धरे...." जइसे गीत ह हमर गाँव-देहात के एक अइसे लोकांचलिकगीत आय , जेमा भाई-बहिनी के मया-पिरीत के भाव झलकथय। ये गीत मं भाई-बहिनी के हिरदय मं घात मया अउ आत्मीयता तीज-तिहार के ओखी मं पनपथय।गीत ले पता चलथय की माय-मइके ले ससुरार गेये बेटी-बहिनी के सुद मइके डहर लामे रथय। अइसना बाप-महतारी अउ भाई-बहिनी के आस अपन बेटी अउ बहिनी ल एक नजर देखे बर लगे रथय याने ' रकत के रिस्ता , कभू न घिसता ' जइसे बात सच होथय। तभे तो पहिली ससुरार गेये बेटी-बहिनी मन ह लगते असाढ़ मं ही ददा-भइया के बाट तो जोहबे करथँय मइके जायेबर  , संगे-संग हर उमर के हमर बेटी-माईं मन ह तीजा के आठ-पंदरा दिन पहिली ले ही तीजा के दिन ल घेरी-बेरी अंगरी मं गिनत रहिथँय अउ पोरा तिहार के रोटी धर के अवइया बाप-भइया  अउ भाई-भतीजा के आँखीफोर रद्द देखत रहिथँय। येखर ले हमर ग्रामीन-अंचल मं तीजा के महत्तव सिद्ध होथय।
           तीजा याने हरितालिका ल भादो महीना के अंजोरीपाख के तीज याने तृतीया तिथि मं मनाया जाथय। तीजा ल सरलग तीन दिन तक मनाय के लोकपरब कहे जा सकथय। तीजा आय बेटी-माईं मन मइके मं अउ तीजा नइ जा पाय हमर दई-माईं मन ससुरार मं ही तीजा उपास रहिथँय। दूज के दिन रतिहा तीजा उपास रहवइया दाई-बहिनी मन अपन घर , पारा-परोस अउ हितु-पिरोती मन घर ' करुभात ' खाइक-खवा होथँय। इही रतिहा रोटी-पीठा अउ सादा भोजन संग करेला के साग खाथँय , येखरेसती ये जेवन ल करुभात कहे जाथय। ये करुभात ल खा के पचाय के प्रतिकात्मक साब्दिक अरथ , हिरदय मं भरे जम्मों करू याने बिसयली सोंच-बिचार ल निकाल के निक-सुघर अउ सकारात्मक पोठ बिचार ले तन-मन भरई  होथय। खावत बेरा मस्त बढ़िया हाँसी-मजाक के दौर चलथय।
               दूसर दिन अरथात् तृतीया तिथि मं तीजा होथय। इही दिन बेटी-माईं मन उपास रहिथँय। कतको झन हर निरजला रहिथँय। दिन भर ये तीजा उपसहीन बेटी-माईं मन एक-दूसर घर बइठे-उठे बर जाथँय। ठट्ठा-दिल्लगी करथँय। सुख-दुख के गोठ गोठियाथँय। बड़े-बुजुर्ग मन ले कहिनी-कंथली , भजन-कीरतन , रामायन , आल्हा सुन के मन बहलाथँय। सियान मन के अनुभवी-गोठ अउ अपन मइके-ससुरार के बीते बखत के सुरता करत एक-दूसर ल सुख-दुख बांटथँय। एक जुआर संझा नहाये बर तरिया-नंदिया जाथँय। टोर्रीखरी ले मुँड़ मिंजे के नेंग करथँय । उपसहिन मन के हाँसी-मजाक अउ किसिम-किसिम के गोठबात ले घटौंदा मात जाथय। बेर बूड़त उपसहिन मन तुलसीचौंरा मं दीया बारथँय। हूमधूप देथँय। पूजापाठ करथँय।फर-फूल अउ कोनों मीठ जिंनीस खा के उपास पूरा करथँय।
              बिहान दिन माने चऊथ तिथि के दिन उपसहिन मन फेर पूजापाठ करथँय। माटी के नांदियाबइला के पूजा करथँय। रोटीपीठा अउ खीर के नांदिया ल जेवन जेवाथँय , जेला 'नांदिया-जेवई ' कहे जाथय। ताहन फेर मइके ले मिले नवाँ लुगरा पहिर के उपसहिन मन हर माय-मइके के बड़े-बुजुर्ग अउ नान्हें-बड़े ले नत्ता-गोता मुताबिक भेंट-पलयगी करथँय , मया-दुलार बांटथँय। पारा-परोस अउ हिती-पिरोती मन घर खायेबर जइक-जवा होथँय। साँझ तक खवई-पिअई अउ बइठई-उठई चलथय। कोनों-कोनों नवाँ ससुरार आये-गेये  हमर उपसहिन बेटी-माईं मन गंगाजल , गंगाबारू , महापरसाद , तुलसीदल , नरिहरफूल बदथँय। फेर पाँचवादिन ले तीजहारिन मन के ससुरार लहुँटई सुरू हो जथय। तीजा के संबंधी मं ये दे गीत ल आज घलोक सुने जा सकथय --
         " गोबर दे बछरू गोबर दे
           चारों खुँट ल लीपन दे
           अपन खाथे गुदा-गुदा
           हम ला देथे बीजा
           वो बीजा ल का करबोन
           रहि जाबोन तीजा
           तीजा के बिहान दिन सरी-सरी लुगरा
           हेर दे भवजी कपाट के खीला
           काँव-काँव करे मंजूर के पीला
           एक गोड़ मं रायजीरा
           एक गोड़ मं कपूर
           कतिक ल मानँव मँय देवर-ससुर
           राधे नरवा मं मातगे फु फु फुगड़ी रे...."
           हमर ग्रामीन अंचल मं कतको कुआँरी बेटी मन घलोक तीज उपास रहिथँय। कारन हे , सिव-पार्वती संबंधित एक पौरानिककथा , जेमा वरनित हवय की राजा दक्ष के कुँआरी कन्या सती  ह भगवान देवादि देव महादेव ल पति रूप मं पाये बर अपन मइके मं उपास रखे रिहिस अउ पार्वती जनम पा के  सिव-संकरजी ल पति परमेश्वर के रूप मं पाये रिहिस , तब ले ये उपास रहे के परम्परा चलत हे। तीजहारिन बेटी-माईं मन मइके अउ ससुरार के सुभचिंतक होथँय। ससुरार मं पति , लोग-लइका , सपरिवार अउ मइके मं माँ-बाप अउ भाई-भतीजा के सुख-सांति अउ वैभव-वृद्धि के कामना करथँय। येखर ले पता चलथय की हमर बेटी-बहिनी अउ दाई-माई मन ही घर-परवार , समाज , धरम , लोकसंस्कृति के अनुकूल अपन सोंच-बिचार अउ लोकबेवहार ले नारी-महत्व ल इस्थापित कर के ये संसार मं मानवता ल सुदृढ़ करथँय। तीजा मनाय बर मइके अवई ह उँखर माईभुइँया मं पदारपन होथय। इही समै मइके के ननपन मं बिताय हर पल सुरता आथय। हिरदय मं माईंछइँया-भुइँया अउ जम्मों रहवइया लोगन के प्रति मन मं प्रेम अउ अपनत्व उमड़थय। अउ येखरेसती ससुरार लहुँटत तीजहारिन बेटी-माईं मन हर अवइया बछर के बेसबरी ले इंतजार करथँय। हिरदय के झोला मं दया-मया के रोटी-पीठा धरे अपन देहरी पहुंचथँय।
              आखिर मं मोला कहे बर बड़ा अल्करहा लागत हे कि येसो वैस्विक महामारी कोविड19 के चलते हमर दाई-माई अउ बेटी-बहिनी मन तीजा आवन-जावन नइ सकैं; पर इन सब ले हाथ जोर के मैं  बिनती घलो करत हँव कि जिहाँ भी रहिके ये मन तीजा उपास राहँय ; भगवान ले बिनती करँय कि ये जग ला ये जीलेवा बीमारी ले मुक्ति दिलावय।
          



@ टीकेश्वर सिन्हा " गब्दीवाला "
      घोटिया--बालोद ( छ. ग. )

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