छत्तीसगढ़ की परंपरा सदैव समृद्ध रही है भगवान राम का बनवास काल यहीं बीता



छत्तीसगढ़ प्राचीन काल से समृद्ध रही है। पुरातत्व एवं ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यहां की संस्कृति सभ्यता उन्नत रही है इनका प्रमाण हम दक्षिण कौशल सिरपुर में बौद्ध जैन सेव तीनों धर्मों का समावेशित विद्या अध्ययन के लिए देश-विदेश से लोगों के आने का आज भी शिलालेख में विद्यमान हैं जिसमें चीनी यात्री हेनसांग का नाम अंकित है। छत्तीसगढ़ की सभ्यता संस्कृति, नदी-पहाड़ और जंगलों से समृद्ध हरियाली से आच्छादित है।  46प्रतिशत जंगल है, सप्त ऋषियों की तपोभूमि है। भगवान राम का ननिहाल है तो लव-कुश की जन्म स्थली तुरतुरिया यही है। कौशल्या माता का पूरे भारत में एकमात्र मंदिर चंदखुरी में है। वनवास के समय में भगवान राम ने 10 वर्ष छत्तीसगढ़ की धरा में बिताए, भगवान राम ने राक्षसों का विनाश कर इनके आतंक से मुक्ति दिलाई थी। राक्षसों के मरने के बाद इनकी हडिड्यां रास्तों में ब्खिरे रहे, इसीलिए इन रास्तों को आज भी बोलचाल की भाषा में रक्साहाड़ा कहा जाता है।


माता कौशिल्या का एकमात्र मंदिर चंदखुरी में


मामा भांजा का अनूठा प्रमाण है यहां भांजा का प्रणाम किया जाता है। कालिदास जी ने मेघदूत की रचना की तो प्राचीन नाट्यशाला भरतमुनि के द्वारा सरगुजा के कंधों में विद्यमान हैं। राजा मोरध्वज की नगरी आरंग एक ऐतिहासिक नगर है। बाणासुर के द्वारा स्थापित हाटकेश्वर महादेव रायपुर में स्थापित है प्रभु वल्लभाचार्य की जन्मस्थली और गुरु घासीदास सतनाम पंथ की की स्थापना की छत्तीसगढ़  धान का कटोरा कहा जाता है। यहां तरह-तरह की जड़ी बूटी, फल फल, औषधि, महुआ, चार-चिरौंजी, तेंदू इमली आते हैं। यहां के वनों के औषधि की मांग देश विदेशों में है। बस्तर का क्षेत्र वन्य औषधि एवं बस्तर आर्ट की मांग देश विदेशों में है।


यहां लोक कला, संस्कृति, खानपान, रहन सहन बहुत ही समृद्ध है। साथ ही साथ अनूठा भी यहां के तीज त्यौहार कृषि प्रधान क्षेत्र होने के कारण त्यौहार की शुरूआत हरेली में कृषि औजार पूजा से होती है। गांव में माता पूजन, सहाड़ा देव, ठाकुर देवता, खेत में भैसासुर की पूजा बैगा द्वारा की जाती है वैसे तो पूजा की शुरूआत अक्ति के दिन से ही हो जाता है। गांव के ग्रामीण देवता में धान चढ़ाकर किया जाता है। हमारे यहां नवाखाई की परंपरा आदि काल से  चली आ  रही है। दशहरे के समय धान की फसल आने से और होली के समय होली के समय कुन्हारी गेहूं आने से या उत्सव मनाया जाता है। हमारे यहां हर उत्पादन के साथ देवी देवताओं को अर्पण करने की परंपरा पहले से ही चली आ रही है जैसे तुलसी पूजा में गन्ने को चढ़ाना, चना भाजी, भाटा जाम, कुचाई चढ़ाई जाती है। त्योहारों में लोकगीतों की लोक नृत्य का प्रचलन है। दिवाली के समय राउत नाचा महिलाओं के द्वारा किए जाने वाले सुआ नित्य लोकगीत की बात हो तो नाचा छत्तीसगढ़ की पहचान रही है और दाऊ मंदराजी गोविंद निर्मलकर एक पहचान है। पंडवानी  पद्मा विभूषण तीजन बाई ने देश विदेशों में एक पहचान दिलाई यहां कर्मा ददरिया, लोकगीत, लोक नृत्य की बात करूं तो राउत नाचा सुबह कर्मा सरहुल कक्षा घड़ी ऐसी बहुत सारे लोक नृत्य छत्तीसगढ़ में किए जाते हैं। खानपान की बात करें तो खानपान बिल्कुल वैज्ञानिक  तरीके से हैं। चटनी बासी और फराह चीला यहां की पहचान बरसात के सीजन में कई तरह की भाजी जो औषधि की तरह उपयोग की जाती हैं। हमारे पूर्वज इन सब्जी का सुखी यानी खुल्ला करके रखते थे जो गर्मी के सीजन में खाया जाता है। सुक्सी में विटामिन डी की प्रचुर मात्रा उपलब्ध होती है। किसी भी प्रकार के रासायनिक खादों का उपयोग नहीं होता है। गर्मी के दिनों में सब्जी का उपयोग इन तरह-तरह की सुख सी का उपयोग किया जाता था इस कारण ठंडी के दिनों में होने वाले विभिन्न प्रकार की सब्जियों का सुख से किया जाता था। चना होरा, कांदा खुला, चना मुर्रा यहां की खानो में खई खजानी की तरह खाया जाता है। खेलकूद में गिल्ली डंडा मावा बाटी फुगड़ी डंडा महिलाएं सिंगार सोने एवं चांदी के गहनों का प्रचलन है जिसमें महिलाएं दो-तीन किलो की चांदी एवं सोने के 10 से 15 तोले के सोने के गहने पहनती हैं। रावत लोगों के द्वारा रंग बिरंगी ड्रेस देखकर मन सतरंगी हो जाता है।



Dr. Mukti bais

               

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