*कईसे लाज नइ लागे, रे बादर !*


कईसे लाज नइ लागे, रे बादर !
गिरत हाबस सीटिर-साटर
कहूँ गिरथस बूँदा-बाँदी
कहूँ गिरथस पातर-पातर
सावन बईरी सुक्खा भगागे
भादो म कर दे छिपिर-छापर

मुनादी करथस गड़गड़-गड़गड़, 
जईसे लबरा नेता जबान
दगा मारथस तँय घुमड़-घुमड़, 
तोला जोहथे रोज किसान
आँसू बोहावथे तरतर-तरतर
देख डोली के मरे बिहान
माई डोली के छाती फाटथे, त
ये छाती म दुख के सागर
कईसे लाज नइ लागे, रे बादर !
गिरत हाबस सीटिर-साटर

कारखाना बर नंदिया-नरवा,  
किसान खेत धरे फरियाद 
संथरा ले रोटी-दार नंदावथे
सोन बेंचावथे कौंडी पियाज
करजा पूरा म किसान बुड़थे, 
मूडी ऊपर ले चढे़ बियाज
खेती कमईया कमिया होवथे
चाकरी करथे किसान जांगर
कईसे लाज नइ लागे, रे बादर !
गिरत हाबस सीटिर-साटर
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लोकनाथ साहू ललकार
दुर्ग
9981442332

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