छत्तीसगढ़ में रंगमंच के संवाहक - पद्मविभूषण हबीब तनवीर (01 सितम्बर हबीब तनवीर के जयंती पर आलेख)

01 सितम्बर हबीब तनवीर के जयंती पर आलेख 

आज एक ऐसे रंगकर्मी का जयंती है जो छत्तीसगढ़ ही नही अपितु भारतीय रंगमंच को वैश्विक पटल पर स्थापित किया। वैश्विक संस्थानों से प्रशिक्षित होने के बावजूद भी भरतीय परिवेश में रंग कर नाटकों का मंचन और लेखन किये। आपको लोकधर्मिता रंगमंच का संवाहक भी माना जाता है। आपने अपने नाटकों में छत्तीसगढ़ के लोक नाट्य नाचा व नाचा के कलाकारों को बखूबी प्रस्तुत किये। छत्तीसगढ़ के बहुतायत लोक विधा को आप ने अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई। हबीब तनवीर ही छत्तीसगढ़ के पहले स्वप्नदृष्टा थे जो इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ में नाटक की पढ़ाई का इच्छा व्यक्त किया था और उनका प्रयास रंग लाया भी जिसका परिणाम है कि आज संगीत विश्वविद्यालय में थियेटर विभाग रंगमंच के लिए नए पीढ़ी तैयार कर रहे है व राष्ट्रीय स्तर के कलाकार तरास रहे है। रंगमंच को हमेशा नये आयाम नये रंग देने वाले तनवीर जी ने अपने नाट्य संस्था का नाम भी "नया थियेटर" रखा। और आप केवल एक रंगकर्मी ही नही रहे बल्कि अपने आप में एक पुरी विश्वविद्यालय रहे है जो  छत्तीसगढ़ के अनेक मंचिय कलाकारों को गांवों के कलाकारों को भी रंगमंच के क्षेत्र में एक नया मुकाम दिये। छत्तीसगढ़ के पद्मविभूषण तीजन बाई को विदेश तक की मंच प्रदान किये और हमे गौरवान्वित किये। तनवीर जी जितना अच्छा हिन्दी और ऊर्दू में लिखते थे उतने ही हमारे छत्तीसगढ़ी बोली के लोकरंग को सम्बल प्रदान करने में  व हमारी लोककला को गति देने में अथक प्रयास किये। 

            हबीब तनवीर का जन्म आज ही के दिन 01 सितम्बर 1923 को रायपुर के बैजनाथ पारा में हुआ। तनवीर जी का पुरा नाम "हबीब अहमद खान" था। नाम के आगे तनवीर जोड़ने का शौक अपने शायरी लेखन से हुआ। तनवीर जी को बचपन से ही नाटकों से गहरी लगाव हो गया, वे जब 07 वर्ष के थे तो एक नाटक देखा "महोब्बत के फूल" और तब से उनके जीवन की रूपरेखा मानो नाटकों के लिए ही तैयार हो गया। हम उनके अभिनय कौशल को इसी से समझ सकते है कि बचपन के दिनों में ही श्रेष्ठ अभिनय के लिए उन्हें "ठाकुर प्यारेलाल अवार्ड" दिया गया था। नागपुर में स्नातक की पढ़ाई पुरी करने के बाद 1944 में एम.ए. की पढ़ाई करने के लिए अलीगढ़ चले गए। लेकिन फिल्मों में रुचि होने के कारण वे 1946 में बम्बई चले गये। वे बम्बई में रहते हुए अपनी बहुमुखी प्रतिभा से विभिन्न संस्थानों में काम किये। 1954 में  आप बम्बई से दिल्ली आ गये और दिल्ली के "जामिया मिलिया विश्वविद्यालय" में नाटक "आगरा बाजार" प्रस्तुत किये। नाटक के सफलता के बाद आपको एक अच्छे निर्देशक के रूप में पहचान मिली। कुछ समय बाद आपको नाट्य प्रशिक्षण के लिए 300 रुपये महीने की स्कालरशिप मिले। ये नाटकों के प्रति उनका लगाव और समर्पण ही था कि 1955 में तनवीर जी देश के सरहद को लांघ कर "रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स" में प्रवेश लिया। उस समय उनके पास इंग्लैंड जाने तक के लिए भी पैसे नही थे पर कहा जाता है न कि लगन इंसान के लिए हर रास्ते खोल देती है। और तनवीर जी के साथ भी ऐसा ही हुआ। तब अलीगढ़ विश्विद्यालय के कुलपति रहे डॉ. जाकिर हुसेन ने "ओल्ड ब्वायज फंड" से यात्रा व्यय हेतु राशि दिये थे। वहां ट्रेनिंग पुरी करने के बाद लंदन में ही "एसोसियेट ऑफ द ड्रामा बोर्ड" से भी नाट्य प्रशिक्षण की डिग्री भी प्राप्त किये और वापस वतन आने से पहले यूरोप के विभिन्न देशों का यात्रा किये और वहाँ के नाटकों को समझे एवं नाटककारों से भी मिले। 1957 में जब विदेश से वापस दिल्ली आये तो "हिंदुस्तान थियेटर" में निदेशक के रूप में कार्य किये। 




             1958 में तनवीर जी  वापस रायपुर (छत्तीसगढ़) आ गए और ये संयोग ही था कि उसके घर के निकट रात में छत्तीसगढ़ के लोकनाट्य नाचा का कार्यक्रम हो रहा था। और तनवीर जी रात भर  नाचा देखते रहे। हबीब तनवीर जी के मन में एक बात घर कर गई कि बिना प्रशिक्षण के भी हमारे छत्तीसगढ़ के नाचा कलाकार इतनी अच्छे से अभिनय कर लेते है। और तनवीर जी नाचा के कलाकारों को लेकर दिल्ली में मोनिका मिश्रा के साथ 1959 में "नया थियेटर" ग्रुप की स्थापना की जो छत्तीसगढ़ के कलाकारों के लिए एक स्वर्णिम संस्था साबित हुए। तब छत्तीसगढ़ के नाचा कलाकार मदन निषाद,ठाकुर राम, भुलवा राम, बाबूदास,लालूराम जैसे नौ कलाकार साथ में थे। तब नया थियेटर की पहली प्रस्तुति हबीब तनवीर द्वारा लिखी "सात पैसे" थी। जिसका निर्देशन मोनिका मिश्रा ने किया था। 1961 में हबीब तनवीर और मोनिका मिश्रा ने विवाह कर लिया और एक साथ मिलकर गरीबी से लड़ते हुए नाटक की दुनिया में कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़े। बाद में आप ने छत्तीसगढ़ के घुमंतू जनजाति देवार जनजाति के कलाकरों को भी अपने नये थियेटर में स्थान दिए जिनमें फिदाबाई, मालाबाई, और पूनम जैसे कलाकार प्रमुख रहे। 1960 में राजनांदगांव संस्काधनी से पद्मश्री गोविंदराम निर्मलकर जी तनवीर जी के नये थियेटर में जुड़े और तनवीर जी के बहुचर्चित नाटक "चरणदास चोर" में नायक का अभिनय भी किया। बात चरणदास चोर की करे तो मदन लाल पहले कलाकार थे जो चरणदास चोर का अभिनय किया।

       1982 में फ्रांस के अंतर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह में "चरणदास चोर" को सर्वश्रेष्ठ नाट्य प्रस्तुति का सम्मान प्राप्त हुआ। और छत्तीसगढ़ के  लोकनाट्य को वैश्विक पटल पर पहिली बार पहचान मिली। ऐसे तो तनवीर जी ने भारतीय रंगमंच को एक दर्जन से भी अधिक सफल नाटक दिए जिनमें प्रमुखतः नाम आते है - मिट्टी की गाड़ी, गाँव के नाव ससुराल मोर नाव दामाद, लाला शोहरत बेग, आगरा बाजार,बहादुर कलारिन। बहादुर कलारिन एक सच्ची घटना पर आधारित नाटक है जिसके प्रमाण और साक्ष्य आज भी मौजूद है जिसे नाट्यरूप देकर मंच पर जीवंत बनाने का साहस तनवीर जी ने किया और सफल भी रहे। हबीब तनवीर के रंग संसार पर पहला पीएच.डी. करने वाले डॉ. अभिजीत मण्डल है। और आज भी कई ऐसे शोधकर्ता है जो आप के रंगमंच के प्रति किये गये योगदान के ऊपर पीएच.डी. कर रहे है।

         1972 में हबीब तनवीर का मनोनयन "राज्य सभा" में हुआ। आपको रविशंकर विश्विद्यालय रायपुर के पं. सुन्दरलाल शर्मा पीठ के 1981 से 1984 तक विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे।

     हबीब तनवीर जी को रंगमंच के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए बहोत सारे सम्मान मिले जिनमें प्रमुख रूप से 1969 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1975 शिखर सम्मान, 1982 अंतराष्ट्रीय नाट्य महोत्सव में फ्रिंज फर्स्ट एवार्ड, भारत सरकार द्वारा 1982 में पद्मश्री 2002 में पद्मविभूषण, 1983 में इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय द्वारा डी. लिट्.की मानद उपाधि, 1990 कालिदास सम्मान, 1993  रवीन्द्र भारती यूनिवर्सिटी कलकत्ता द्वारा  डी. लिट्.की मानद उपाधि, और 2002 में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा दाऊ मंदराजी सम्मान से सम्मानित किया गया।

          आपने भारतीय रंगमंच के प्रति जो स्वर्णिम कार्य किये है उन कार्यो के लिए आपको हमेशा याद किया जाएगा। रंगमंच का चमकता सितारा एक रंगकर्मी अभिनेता, नाटककार, रंग सिद्धांतकार हमेशा-हमेशा के लिए अपनी रचनात्मक कृतियों और नाटकों के साथ हम सब को छोड़ कर इस दुनिया से 08 जून 2009 को गीतकार- गंगाराम शिवारे द्वारा लिखित गीत जो उन्ही के नाटक के लिए लिखा गया था की ये पंक्तियां दोहराते हुए चले चले गये "चोला माटी के हे राम, येखर का भरोसा चोला माटी के हे राम"।
             
          




दुर्गेश सिन्हा "दुलरवा"
दुर्रे बंजारी (छुरिया)
राजनांदगांव

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