संघर्षो से उपजे जनकवि : कोदूराम दलित (28 सितम्बर पुण्यतिथि पर विशेष)



28 सितम्बर  पुण्यतिथि पर विशेष

छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय के नाम से मशहूर जनकवि कोदूराम "दलित" जी का जन्म 5 मार्च 1910 को ग्राम-टिकरी (अर्जुन्दा) जिला दुर्ग के  साधारण किसान परिवार में हुआ था। किसान परिवार में पालन पोषण होने के कारण पूरा बचपन किसानों और बनिहारों के बीच में बीता ।आजादी के पहले और बाद में भी उन्होंने कालजयी रचनाओं का सृजन किया । समतावादी विचार, मानवतावादी दृष्टिकोण और यथार्थवादी सोच के कारण आज पर्यन्त वे प्रासंगिक बने हुए हैं।

दलित जी के कृतित्व में खेती-किसानी का अदभुत चित्रण मिलता है। खेती-किसानी को उन्होंने करीब से देखा और जिया है, इस कारण उनके गीतों में जीवंत चित्रण मिलता है :-
पाकिस धान-अजान,भेजरी, गुरमटिया,बैकोनी,
कारी-बरई ,बुढ़िया-बाँको, लुचई, श्याम-सलोनी।
धान के डोली पींयर-पींयर, दीखय जइसे सोना,
वो जग-पालनहार बिछाइस, ये सुनहरा बिछौना।
दुलहिन धान लजाय मनेमन, गूनय मुड़ी नवा के,
आही हँसिया-राजा मोला, लेगही आज बिहा के।

स्वतंत्रता आंदोलन के समय लिखे उनके प्रेरणादायी छन्दों ने लोगों को जागृत करने का काम किया :-
अपन देश आजाद करे बर, चलो जेल सँगवारी,
कतको झिन मन चल देइन, आइस अब हमरो बारी।

गाँधीजी की विचारधारा से प्रभावित उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत खिलाफ साहित्य को अपना हथियार बनाया। सरकारी शिक्षक होते हुए भी लोगों को जागृत करने के लिए राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत राउत दोहा लिखकर उन्हें आजादी के आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया :-
हमर तिरंगा झंडा भैया, फहरावै असमान।
येकर शान रखे खातिर हम, देबो अपन परान।

अपने मन के उद्गार को बेबाक होकर लिखने वाले  दलित जी की रचनाएँ, कबीर के काफी नजदीक मिलती है । जैसे फक्कड़ और निडर कबीर थे वैसे ही दलित जी। समाज में व्याप्त पाखण्ड का उन्होंने खुलकर विरोध किया। एक कुण्डलिया देखिए :-

ढोंगी मन माला जपैं, लम्हा तिलक लगायँ ।
हरिजन ला छीययँ नहीं, चिंगरी मछरी खायँ।।
चिंगरी मछरी खायँ, दलित मन ला दुत्कारैं।
कुकुर-बिलाई ला  चूमयँ चाटयँ पुचकारैं।
छोड़-छाँड़ के गाँधी के, सुग्घर रसदा ला।
भेद-भाव पनपायँ , जपयँ ढोंगी मन माला।

कोदूराम "दलित" को जनकवि कहने के पीछे  खास वजह यह भी है कि उनकी रचनाओं में आम जनता की पीड़ा है, आँसू है, समस्यायें है। उनकी कविता सुनने के बाद आम और खास दोनो ही प्रभावित हुए बिना नइ रह पाये। उनकी कवितायें लोगों को मुँह जुबानी याद रहती थी। उनकी रचनायें समाज में व्याप्त बुराईयों पर सीधे चोट करती थीं । उन्होंने जो भी लिखा बिना कोई लाग-लपेट के लिखा । बातों को घुमा फिराकर लिखना उनके व्यवहार में नहीं था। छत्तीसगढ़ियों की पीड़ा को दलित जी ने अपने जीवनकाल में ही उकेर दिया था जो आज भी प्रासंगिक है। उनके छन्दों में आम छत्तीसगढ़ियों के हक की बात होती थी :-
छत्तीसगढ़ पैदा करय, अड़बड़ चाँउर दार।
हँवय लोग मन इहाँ के, सिधवा अउ उदार।।
सिधवा अउ उदार, हवँय दिन रात कमावयँ।
दे दूसर ला भात , अपन मन बासी खावयँ।
ठगथयँ बपुरा मन ला , ये बंचक मन अड़बड़।
पिछड़े हवय अतेक, इही करन छत्तीसगढ़।

कवि हृदय प्रकृति के प्रति उदात्त भाव रखता है क्योंकि उनका मन बहुत कोमल होता है । दलित जी का प्रकृति प्रेम भी किसी से छुपा नहीं था। उनकी एक घनाक्षरी में प्रकृति का अदभुत चित्रण और संदेश मिलता है :-

बन के बिरिच्छ मन, जड़ी-बूटी, कांदा-कुसा
फल-फूल, लकड़ी अउ देयं डारा-पाना जी ।
हाड़ा-गोड़ा, माँस-चाम, चरबी, सुरा के बाल
मौहां औ मंजूर पाँखी देय मनमाना जी ।
लासा, कोसा, मंदरस, तेल बर बीजा देयं
जभे काम पड़े, तभे जंगल में जाना जी ।
बाँस, ठारा, बांख, कोयला, मयाल कांदी औ
खादर, ला-ला के तुम काम निपटाना जी ।

एक आदर्श विद्यालय का सपना उनकी कविता में कुछ ऐसा था--
अपन गाँव मा शाला-भवन, जुरमिल के बनाव
ओकर हाता के भितरी मा, कुँआ घलो खनाव
फुलवारी अउ रुख लगाके, अच्छा बने सजाव
सुन्दर-सुन्दर पोथी-पुस्तक, बाँचे बर मँगवाव ।

खादी कुर्ता, पायजामा, गाँधी टोपी और हाथ में छाता देखकर कोई भी व्यक्ति दूर से ही उनको पहचान लेता।  हँसमुख और मिलनसार दलित जी का कविकर्म व्यापक था । गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित होने के कारण "सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय " का संदेश अक्सर वे अपनी रचनाओं में दे जाते थे। हास्य व्यंग्य का स्थापति कवि होने के कारण समाज की विसंगतियों को उन्होंने अपने व्यंग्य का हिस्सा बनाया। राजनीति पर धारदार व्यंग्य देखिए :-
तब के नेता जन हितकारी ।
अब के नेता पदवीधारी ।।
तब के नेता काटे जेल ।
अब के नेता चौथी फेल ।।
तब के नेता लिये सुराज ।
अब के पूरा भोगैं राज ।।

दलित जी ने अपने काव्य-कौशल को केवल लेखन तक ही सीमित नहीं रखा वरन् मंचों में प्रस्तुत कर खूब नाम कमाया । अपने समय मे वे मंच के सरताज कवि हुआ करते थे। सटीक शब्द चयन, परिष्कृत भाषा और व्याकरण सम्मत रचनाओं के कारण उनकी प्रस्तुति प्रभावशाली होती थीं । कविता की सबसे सटीक परिभाषा दलित जी ने  मात्र दो लाइनों में दी थीं  : -
जइसे मुसुवा निकलथे बिल से,
वइसने कविता निकलथे दिल से।

छत्तीसगढ़ी कविता को मंचीय रूप देने का श्रेय पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी "विप्र" और कोदूराम "दलित" को जाता है । 50 के दशक में दलित जी की छत्तीसगढ़ी कविताओं का  प्रसारण आकाशवाणी भोपाल, इंदौर,ग्वालियर और नागपुर से लगातार हुआ जिसके कारण छत्तीसगढ़ी को नई ऊँचाई मिली। समाज सुधारक के रूप में दलित जी का संदेश अतुलनीय है -

भाई एक खदान के, सब्बो पथरा आँय।
कोन्हों खूँदे जाँय नित, कोन्हों पूजे जाँय।।
कोन्हों पूजे जाँय, देउँता बन मंदर के।
खूँदे जाथें वोमन फरश बनयँ जे घर के।
चुनो ठउर सुग्घर मंदर के पथरा साँही।
तब तुम घलो सबर दिन पूजे जाहू भाई ।।

दलित जी की तेरह कृतियों का उल्लेख मिलता है- (१) सियानी गोठ (२) हमर देश (३) कनवा समधी (४) दू-मितान (५) प्रकृति वर्णन (६)बाल-कविता - ये सभी पद्य में हैं. गद्य में उन्होंने जो पुस्तकें लिखी हैं वे हैं (७) अलहन (८) कथा-कहानी (९) प्रहसन (१०) छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियाँ (११) बाल-निबंध (१२) छत्तीसगढ़ी शब्द-भंडार (13) कृष्ण-जन्म (हिंदी पद्य) है।  दुर्भाग्य से उनके जीवनकाल में केवल एक कृति- "सियानी-गोठ" ही प्रकाशित हो पायी जिसमें 76 हास्य-व्यंग्य की कुण्डलियाँ संकलित है। बाद में बहुजन हिताय बहुजन सुखाय और ‘छन्नर छन्नर पैरी बाजे‘ का प्रकाशन हुआ।  विलक्षण प्रतिभा का धनी होने के बावजूद भी दलित जी आज भी उपेक्षित हैं यह छत्तीसगढ़ी साहित्य के लिए चिंतन का विषय है।  प्रचुर मात्रा में साहित्य उपलब्ध होने के उपरांत भी दलित जी पर जितना काम होना था वह नहीं हो पाया है।

दलित जी साहित्यकार के साथ आदर्श शिक्षक, समाज सुधारक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और संस्कृत के विद्वान भी थे । वे छत्तीसगढ़ी के साथ हिंदी के भी सशक्त हस्ताक्षर थे।  साक्षरता और प्रौढ़ शिक्षा के वे प्रबल पक्षधर थे । जब तक जीवित रहे तब तक दबे कुचले लोगों की पीड़ा को लिखते रहे । 28 सितम्बर 1967 को अपनी नश्वर देह को त्यागकर वे परमात्मा में विलीन हो गये किंतु अपनी रचनाओं  के माध्यम से वे आज भी अपनी मौजूदगी का अहसास कराते हैं। दलित जी का जीवन बहुत ही संघर्षपूर्ण और अभावों में बीता, शायद इसी वजह से वे अपनी कविताओं का प्रकाशन नहीं करा सके। आज जरूरत इस बात की है कि वर्तमान पीढ़ी उनके साहित्य को गंभीर होकर अध्ययन करें।





अजय अमृतांशु
भाटापारा (छत्तीसगढ़)

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