डॉ बलदेव प्रसाद मिश्र की पुण्यतिथि (4 सितंबर) पर विशेष

डॉ बलदेव प्रसाद मिश्र की पुण्यतिथि (4 सितंबर) पर विशेष


शीर्षक:-   तुलसी दर्शन के मीमांसक बलदेव प्रसाद मिश्र

      'श्री राम' के भक्त कवियों की एक समृद्ध परंपरा हिंदी साहित्य में है। सब ने श्रीराम को अपनी दृष्टि से देखते हुए उनकी महिमा का गुणगान किया है। राम काव्य परंपरा में भी कुछ ऐसे मनीषी कवि हुए हैं जिन्हें हिंदी साहित्य के लेखकों एवं समीक्षकों ने पूरी ईमानदारी के साथ रेखांकित नहीं किया है। जबकि इन लेखकों और कवियों का व्यक्तित्व और कृतित्व राम काव्य परंपरा के स्थापित कवियों या लेखकों से कम नहीं है। ऐसे ही कवियों में संस्कारधानी राजनांदगांव की उर्वर साहित्यिक भूमि में 12 सितंबर सन 1898 को जन्मे स्वनामधन्य डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र हैं। आज यानी 4 सितंबर को उनकी पुण्यतिथि है। डॉ. मिश्र साहित्य साधना को विशुद्ध ईश्वर की साधना मानते थे। उन्होंने इसके माध्यम से 'ब्रह्मानंद' को अनुभूत किया। इसलिए भी प्रचार प्रसार से सर्वथा दूर रहे। यह भी एक कारण हो सकता है कि उनकी साहित्यिक आभा हिंदी साहित्य के लेखकों, समीक्षकों एवं आलोचकों तक ना पहुंच पाई हो।
      अब इस आलेख के आलोक में हम डॉ. मिश्र की रचना 'तुलसी दर्शन' पर विचार करेंगे। उनका यह ग्रंथ हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उनके इसी ग्रंथ पर उन्हें नागपुर विश्वविद्यालय द्वारा सन 1939 में शिक्षा क्षेत्र की सर्वोच्च उपाधि डी. लिट. प्रदान की गई थी। अपने इस शोध ग्रंथ को डॉ. मिश्र ने विशुद्ध निबंध माना है। तब मिश्र जी ने परंपरा को तोड़कर अंग्रेजी के स्थान पर अपना शोध प्रबंध हिंदी में प्रस्तुत किया था। 'तुलसी दर्शन' में गोस्वामी तुलसीदास के मानस दर्शन की तर्क सम्मत व्याख्या डॉ.मिश्र ने की है। तुलसी मत की विशेषताएं गिनाते हुए कहा कि 'रामचरितमानस' में तुलसी के विचार उत्तम सिद्धांत हैं। उसमें बुद्धिवाद और हृदय वाद का सुंदर सामंजस्य है। सारे सिद्धांत सतर्क हैं ।अद्वैतवाद है ।तुलसी का मत सनातन हिंदू धर्म का विशुद्ध रूप है।
      गोस्वामी तुलसीदास के गूढ़ दार्शनिक विचारों, सिद्धांतों और मतों का सूक्ष्म विवेचन और विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए डॉ. मिश्र ने यह सिद्ध कर दिया कि 'रामचरितमानस' समग्र हिंदू धर्म और संस्कृति का निचोड़ ग्रंथ है। हिंदी के मूर्धन्य विद्वान डॉ.भगीरथ मिश्र ने अपने ग्रंथ 'मध्यकालीन हिंदी साहित्य और तुलसीदास : शोध की दिशाएं' में मिश्र जी के ग्रंथ 'तुलसी दर्शन' की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- "अन्य सभी ग्रंथों से इसकी विशेषता इस बात में है कि इसके अंतर्गत तुलसी दर्शन का मौलिक स्वरूप दर्शित किया गया है। जहां पर अन्य दार्शनिक अध्ययनों में विभिन्न दर्शनों के आधार को गोस्वामी जी की रचनाओं में ढूंढने का प्रयत्न किया गया है ,वहां इस ग्रंथ में गोस्वामी जी का अपना विशिष्ट दर्शन क्या है, इसकी मीमांसा है और उनके दर्शन का सर्वांगीण स्वरूप प्रस्तुत करने का सफल प्रयत्न है।" डॉ. मिश्र के इस ग्रंथ का विशेषकर युवा पीढ़ी को अवश्य ही अध्ययन -मनन करना चाहिए । उन्हें यह समझते देर नहीं लगेगी कि डॉ. मिश्र किस कोटि के विद्वान और राम काव्य परंपरा केअग्रगण्य कवि थे। पाठक वर्ग को तो उनके तीन महाकाव्यों (कोशल- किशोर,साकेत संत और रामराज्य) का भी अध्ययन करना चाहिए। उनके तीनों महाकाव्य हिंदी साहित्य की धरोहर हैं।
      डॉ. मिश्र की एक अन्य रचना 'मानस के चार प्रसंग' भी है। इसके अंतर्गत विभीषण प्रसंग की कुछ पंक्तियों का विशेष रुप से हम उल्लेख कर रहे हैं। इसे पढ़कर यह स्पष्ट हो जाता है कि 'श्री राम' को प्रिय कौन हो सकता है !
      "काम के रहे जो वे रहे न किसी काम के हैं,
      काम के हुए वे जो कि राम के कहाये हैं ।
      एक बार राम की दिशा में झुकिये तो बंधु,
      देखिएगा प्रभु तुम्हें हृदय लगाये हैं ।"

     

 डॉ.लोकेश शर्मा, गायत्री नगर, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

     

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