राष्ट्र निर्माण में महती भूमिका निभाने वाले स्वंतत्रता संग्राम सेनानी-नरसिंगदास चितलाँग्या जी



स्वतंत्र भारत की स्वंत्रत सांस हम संस्कारधानी में ले रहे है उसके स्तंभकार यदि नरसिंगदास चितलाँग्या जी को माना जाएं तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है।सन् 1930 को संस्कारधानी कि पावन भूमि पर कालूराम गणेशराम चितलाँग्या फर्म के बडे़ भाई श्री कालूराम जी एवं उनकी धर्म पत्नी मिनी बाई के घर पर एक पुत्र ने जन्म लिया जिसका नाम नरसिंगदास रखा गया।समयांतर नरसिंग जी के जन्म के कुछ महिनों बाद कालूराम जी का असामयिक निधन हो गया।काका गणेशराम जी कि कोई संतान नही थी।अतः उन्होंने नरसिंगदास जी को पुत्रस्नेह देकर उनका पालन-पोषण किया।चूंकि पितृविहीन बालक को वे कहीं से भी पिता की कमी महसुस नहीं होना देना चाहते थे।इसी तारतम्यता में उन्होंने बालक नरसिंग दास को सद्व्यवहार, सद्गुण, सद्आचरण आदि के साथ साथ व्यापार की बारीकियों से भी अवगत कराते गए।लगभग 5 वर्ष की उम्र में ही इन्होंने विधारंभ किया और अंग्रेजी मिडिल तक पढ़कर उन्होंने अपनी फर्म मेसर्स कालूराम गणेशराम का कार्य संम्हाल लिया।


व्यवसाय, धार्मिककता की अभिव्यक्ति...

व्यापार को सम्भालने के साथ साथ उन्हें अपने पिता कालूराम जी मृत्यु का कारण भी मालूम पडा़ और मृत्यु के कारण को जानने के बाद नरसिंगजी ने यह ठान लिया था कि पूर्वजों द्वारा प्रारंभ किये गए सद् कार्यो को निरंतर जारी रखना है।श्री कालूराम जी वैध थे।उनका सिंद्धांत था कि कोई गरीब व्यक्ति दवाइयों के कारण मृत्यु के कालग्रास में ना समा जाए इसलिए वे अपनी चिकित्सा मुक्त प्रदाय करते थे।श्री नरसिंगदास जी बहुत ही धर्मपरायण व आस्तिक वृत्ति के व्यक्ति थे।शिव भक्त चितलाँग्या रोज सुबह सुरज उगने के पूर्व उठकर अपने नित्य कर्मो से निवृत्त होकर दो किलोमीटर दूर स्वंय के निर्मित बसंतपुर स्थित बगीचे में जाते थे ततपश्चात वे एकांत में बैठकर पूजा अर्चना किया करते।पूजा अर्चना करके दोपहर 1 बजे भोजन करके दुकान पर आ जाते थे।उन्हीं दिनों कुछ प्रमुख उत्साहित जनों ने मिलकर "राम समाज"नाम की संस्था का गठन किया।वे लोग ब्रम्हचारी मंदिर (कामठी लाईन स्थित नरसिंग मंदिर) में नियमित रामायण का पाठ किया करते थे।कालांतर में बाल समाज गणेशोत्सव समिति के माध्यम से इन्होंने भारतवर्ष के चोटी के संत प्रवचनकर्ताओं,टीकाकारों, अध्यात्मिक व्यक्तियों को स्वयं के निवास स्थान शंकर भवन में बुलाया था।जिनमे श्री बच्चु सूर,श्री संत तुकडोजी,श्री कृपालु जी,श्री बिन्दु जी महाराज के प्रवचन सुनने जनमानस उमड पडता था।चितलाँग्या जी का उद्देश्य नगर की जनता को अध्यात्मिक एवं मानसिक रूप से समृद्ध बनना था।

चलते चलते...

नरसिंग जी का व्यक्तितत्व सहज सरल,समानता के पक्षधर, राजा साहब से मित्रता, नगर पालिका मे प्रतिनिधितत्व,शिक्षा से प्रेम, कुरीतियों का नाश,बाल समाज की स्थापना, नगर की धार्मिक, सांस्कृतिक में चेतना, जमादारों की हड़ताल, डाकियों की हडताल, श्री महेश्वरी पंचायत राजनांदगांव की स्थापना,गौशाला पिंजरापोल की अध्यक्षता इत्यादि कई अविस्मरणीय कार्यो में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।राजनांदगाँव संस्कारधानी इनकी सेवा व सर्मपण को सदैव इतिहास में जीवित रखेगी।भावपूर्ण श्रद्धांजलि के साथ...सादर नमन,वंदन 

स्मृति ग्रंथ "माटी के सपूत" व श्री आशीष चितलाँग्या से साभार.....

       रवि रंगारी
     ( ब्यूरो चीफ)
    लोककला दर्पण
      राजनांदगांव
 मो-93026-75768

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