हमर छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति के अंतरगत गोपालन के गोधन रूप मा वोकर महत्व अउ उपयोगिता सम्बंधित छत्तीसगढ़ी आलेख



बरदी , बरदिहा अउ बरवही 

                             
              हमर सम्पूर्न भारतीय लोकसंस्कृति मं गोपालन अउ गोधन के बड़ा महत्व हे। बेद , पुरान जइसे अउ कतको धारमिक ग्रंथ मं गउसेवा अउ वोखर परिनाम के जिक्र होथय। महर्षि वशिष्ठ के नंदनी कभू ये संसार मं मनवांछित फलदायिनी गौमाता के रूप मं वंदनीय रिहिस। ब्रम्हा , महेश अउ जम्मों देंवता मन ह लंकापति रावण के अतियिचार के जिक्र करे खातिर माता पिरथी ल गउमाता के रूप मं ले के विष्णुलोक पधारिन। गउरूप मं धरती महतारी के बिनती ह बड़ा प्रभावकारी सिद्ध होइस। श्रीकृष्ण के गोपालन गउ गोचारन के सांस्कारिक सिक्छा ह जगजाहिर हे। सरगलोक के सुरभि अउ कामधेनु के कथा-प्रसंग घलोक सुने ला मिलथय। आज घलोक , " सुरहींन गइया के गोबर मंगई के , खुँटधर अंगना लिपाय हो......" जइसे आंचलिक लोकगीत के बोल  ह गोधन के महत्व अउ उपयोगिता सिद्ध करथय। जब अइसन लोकगीत के रचना हमर छत्तीसगढ़ मं होय हवय , तो निस्चित हे की छत्तीसगढ़ी-संस्कृति मं गो-पालन जइसे सुभकारज होय हावय। येमा कोनों दो मत के बात नइ हे।


बरदी अउ बरदिहा : एक परिभासित सब्द के रूप मा :-
    
                    जब हमर छत्तीसगढ़ मं गोपालन के सुरूआत होइस होही त लोगन ह अपन जम्मों गरुवा ल एक ठउर मं एकट्ठा करिस होही , अउ वो गरुवा के देख-रेख करे बर राऊत-जाति के मनखे ल ही चयन करिन होही , तब सायद वो राऊत ह जम्मों गरुवा ल अपन मन-मुताबिक अउ सुविधा अनुसार सम्भवतः " बर " रूख के खाल्हे मं ले गीस होही। इही बर-रूख के छइँहा मं सकलाय गरुवा के समूह ल देख के राऊत या फेर कोनों जनसामान्य के जुबान ले निकल गीस होही - " बरदी "। अउ तभे बरदी के परिभासित अभिप्राय - " बरगद पेंड़ के खाल्हे मं रहे ,  ' गरुवा के समूह ' ले होइस। बीतत बखत के संगे-संग बिहनिया बेरा सकलाय गरुवा के जगा ह बरदी-ठऊर या खेरखाडार अउ गोठान के नाँव ले जाने गियीस होही।
                    अइसने ढंग ले गो-समूह अरथात बरदी के संरक्छक याने देख-रेख करइया राऊत ल " बरदिहा " कहे गीस होही। पर आहू धियान रखे के बात आय की ' गौ " अरथात गरुवा-समूह , जेमा कम से कम बीस-पच्चीस के संख्या मं गरुवा एक निरधारित ठऊर मं रहिथय , तेन ल ही बरदी कहे जाथय। कोनों दिगर पसु के समूह ल न तो बरदी कहे जाय अउ न तो वोखर देख-रेख करइया ल बरदिहा। बरदी के चरइया ल ही बरदिहा कहे जाथय। भले ही गुजरत समय के साँथ ये बरदिहा हर " पहट " याने बिहनिया ले उठे खातिर  " पाहटिया " नाँव घलोक पा लीस। अऊ तभे तो ये पाहटिया मन बर ऊँखर लकर-धकर रेंगई अउ काम-बुता के निपटई ले ,  " येती आना... लकर-धकर काँह जा थस....ये बरदी चरइया पाहटिया.....", जइसे लोकप्रिय गीत के रचना होय हवय।

मालिक अउ बरदिहा के आत्मीयता के प्रतीक : बरवही :-
   
                  बरदी-चरइया याने बरदिहा ह अपन मालिक माने ठाकुर घर के गाय ल दूहथे। दूहनी ( कसेली ) ल घर के कोनों सदस्य ल देथय ; अउ नहिँ ते अपने हर रंधनी-खोली मं सुरक्छित मढ़ा देथय। बरदिहा सरलग पाँच दिन के बाद चौंथा दिन अपन दूहनी मं दूध दूहके कुछ मात्रा मं दूध घर-मालिक ल दे देथय ; अउ फेर बाँकी ल ,जेन ह जादा मात्रा मं रहिथे , तेन ल अपन उपयोग बर ले जाथय। अउ पठेरा मं माढ़े बीड़ी ल कान मं खोंचत , नहि  ते सुल्गावत निकलथय। बरदिहा ले अपन उपयोग खातिर घर लेगय दूध ह ही  " बरवही " कहलाथय।
                घर-मालिक अउ बरदिहा दूनों के आपसी प्रेम अउ आत्मीयतापूरवक बातचीत ले ही बरवही के लेवई-देवई तय होथय। मालिक घलोक चाहथय की जेन हर गउमाता के सेवा करथय , तउन ल घलोक दूध के रूप मं वोखर सेवाफल मिलना चाही। बरदिहा ह अपन मालिक के प्रति अपन निस्ठापूरवक सेवाभाव ल बरवही के जरिये बनाये रखथय। तभे तो मालिक ल कभू-कभू दूध के जरूरत परथय त बरवही-दूध ल अपन मालिक याने ठाकुर ल दे देथय। येखर ले मालिक अउ नौकर के आपसी मया अउ अपनत्व झलकथय।

गो-धन ही गाँव-धन --
  
                   हमर गाँव-देहात मं सियान मन ले सुने बर मिलथय - " घर मं गऊ हे , त कुछू अऊ हे "। अइसना घलोक कथय -- " गो-धन ही गाँव-धन "। इस्पस्ट हे की गोपालन अउ गोचारन ले गाँव-गवँई के आरथिक सम्पन्नता सुदृढ़ होवत देहाती सम्पूरनता ह सारथक होथय। अइसने ढंग ले हमर बरदिहाभाई मन अपन मालिक घर ले गाय के दूध ल बरवही रूप मं पा के अपन आरथिक-इस्थिती ल मजबूत कर पाथँय।
गौ-सेवक के रूप मं बरदिहाभाई मन बरवही पा के गौमाता के किरपा अउ असीस पाथँय।
              

@ टीकेश्वर सिन्हा " गब्दीवाला "
      घोटिया -बालोद ( छ.ग.)

टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां