पूण्यतिथि पर विशेष : राजा चक्रधर सिंह के दरबार में मंदराजी दाऊ के नाचा की धमक



24 सितम्बर पूण्यतिथि पर विशेष

० राजा के दरबार में सजती थी संगीत की महफिले
० राग-रागनियों की उड़ती थी फुहारे
राजनांदगांव। संस्कारधानी के नाम से सुप्रसिद्ध नांदगांव  नगरी कला-साहित्य खेल के साथ-साथ विद्धता के क्षेत्र में भी दूर तक विख्यात रही है। इस संस्कार धानी नगरी की विद्धता व गुण प्रियता की गूंज रायगढ़ के राजा चक्रधर सिंह के राज दरबार तक थी मानस मर्मज्ञ कहे जाने वाले विद्धान डॉ. बल्देव प्रसाद मिश्र और छत्तीसगढ़ी लोक रंग शैली के पितामह मंदराजी दाऊ अपने इन्ही गुणों के बदौलत रायगढ़ के राज दरबार तक धमक दी थी। राजनांदगांव के तीन अनमोल साहित्य रत्नों में से एक डॉ. बल्देव प्रसाद मिश्र जी ने तो रायगढ़ के दीवान पद को सुशाभित किया वही दूसरे कला रत्न दाऊ दुलार सिंह मदरांजी ने अपने छत्तीसगढ़ी रंग शैली ''नाचाÓÓ के बदौलत रायगढ़ के राज दरबार में अपनी शान बिखेरी और कला-संगीत के गुणी राजा चक्रधर सिंह व उनके नृत्य गीत, प्रवीण कलाकारों के सामने छत्तीसगढ़ी नाचा के गीत-संगीत व नृत्य की प्रस्तुति कर ऐसी धाक जमाई कि लोग वाह वाह कर उठे। दाउ मंदराजी व उसके नाचा कलाकारो के मोह पास से समूचा राज दरबार ऐसा बंधा रहा व कई-कई दिनों तक छत्तीसगढ़ी नाचा के अलावा राज दरबार में गीत व संगीत की प्रस्तुति होती रही। बताया तो यहां तक जाता है कि राजा चक्रधर सिंह के अनुरोध पर दाऊ मंदराजी राज दरबार में संगीतिक बैठकी की महफिल जमाते थे। इस दौरान राजा चक्रधर सिंह के राज दरबार में कार्तिक राम फिरतुराम कल्याण दास जी बर्मन लाल जी जैसे नृत्याचार्य हुआ करते है। चारो नर्तक हमारे छत्तीसढिय़ा भाई थे लेकिन वे शास्त्रीय नृत्य के मामले में दूर-दूर तक विख्यात थे। छत्तीसगढ़ के इस रायगढ़ राजदरबार के  शान माने जाने वाले इन कलाकारों में मंदराजी दाऊ के नाचा के प्रति बड़ी ललक थी अत: कला संगीत के गुनी राजा चक्रधर सिंह के समक्ष मंदराजी दाऊ के नाचा का गुणगान कर दाऊजी के नाचा को रायगढ़ के राजदरबार तक बुलवाया गया। सन 40 के दशक में दाऊजी की नाचा पार्टी रवेली साज की पूरे छत्तीसगढ़ में तूती बोलती थी। छत्तीसढ़ की वर्तमान राजधानी रायपुर में जब उस समय दाऊजी का नाचा कार्यक्रम हुआ करता था तो सिनेमा के शो बंद हो जाया करते थे। दाऊजी के नाचा को देखने लोगों की भारी भीड़ उमड़ती थी। आलम यह रहता था कि रायपुर में तवायफो के कोठो में कई-कई दिनों तक ताला लग जाया करता था। रायपुर के विभिन्न मुहल्लो व आसपास के गांवों में जब नाचा हुआ करता था तो गांव के दर्शक शहर में व शहर के दर्शक गांवों में नाचा देखने झुण्ड के झूण्ड उमड़ पड़ते थे। दाऊजी के नाचा के परी-जोकरो जनाना व साजिन्दो के गीत संगीत व नृत्य का ऐसा बेजोड़ प्रदर्शन होता था कि लोग बाग-बाग हो जाते थे और पेट रंमज-रंमज कर हसते हुए रात-रात भर जाग कर नाचा का लुत्फ उठाते थे।



नाचा का आकर्षण

दाऊ जी के इस लोकप्र्रिय नाचा पार्टी की गूंज रायगढ़ के राजा चक्रधर सिंह के कामों पर पड़ी तो वह भी अपने नृत्य कलाकारों के नाचा के प्रति आकर्षण को देख कर मंदराजी दाऊ का नाचा अपने राज में कराने का निर्णय लिया और बढ़े आदरभाव से दाऊजी को आमंत्रण भेज कर दाऊजी के नाचा पार्टी को राज दरबार तक बुलवाया। पहले भी बताया जा चुका है कि मंदराजी दाऊजी का नाचा रात में राजदरबार से बाहर आम जनों के लिए होता था। वहीं दिन में राजा जी के सान्निध्य में मंदराजी दाऊजी के साथ राज दरबार में संगीत की महफिल सजती थी। दाऊजी ब्रहमानंद के भजनों के अलावा शास्त्री रागो पर आधारित गीतों की भी प्रस्तुति देते थे। इनमें से खासकर यमन राग कलावती खमाज, भैरव, मालकौस, भरैवी राग का नाचा में खुलकर प्रदर्शन होता था। दाऊजी राज दरबार के संगीतिक बैठकी में इन शास्त्रीय रागों का बेजोड़ प्रदर्शन कर राजा सहित राज दरबारियों से वाहवाही पाते थे। चुंकि रवेली पार्टी अन्य नाचा कलाकार ज्यादातर शास्त्रीय रागों से परिचित नहीं थे इसलिए राजा जी केवल राज दरबार के सांगीतिक बैठकी में सिर्फ दाऊजी को बुलाते थे। वहां उसकी अच्छी आवभगत होती थी। इस बात को सुप्रसिद्ध नाचा कलाकार मदन निषाद अच्छी तरह जानते थे। इसलिए अच्छा-अच्छा खाने-पीने की चाह में वह प्राय: दाऊजी के साथ हो लिया करता था। एक से दो भले सोच कर मंदराजी दाऊ उसे साथ ले लिया करते थे। राज दरबार में जब संगीत की महफिल जमती थी तो राग-रागनियो की फुहारे उड़ा करती थी। शास्त्रीय तालों की गमक में राजा जी के नृत्य कलाकार थिरक उठते थे।

गणेश मेला का आयोजन

संस्कारधानी नगरी में विगत 25-30 वर्षों से श्री चक्रधर कत्थक कल्याण केन्द्र नाम से नृत्य संगीत का विद्यालय चलाने वाले डॉ. कृष्ण कुमार सिन्हा ने बताया कि गीत संगीत व नृत्य के गुणी राजा चक्रधर सिंह गणेशोत्सव पर्व के दौरान रायगढ़ में 10 दिनों तक गणेश मेला आयोजन करते थे जिसमें दूर-दूर से नामी कलाकारों को बुलाकर उनकी कला का प्रदर्शन करवाते थे। रवेली नाचा पार्टी के संचालक दाऊ मंदराजी के नाचा की ख्याति सुनकर उन्हें भी आमंत्रित किया जाता था। रायगढ़ में मंदराजी दाऊ के नाचा की धूम हुआ करती थी। समय के आधार पर राग-रागनियों के चयन में माहिर मंदराजी दाऊ को राजा चक्रधर सिंह राज दरबार में बुलाकर अपने संगीतज्ञों के साथ महफिल सजा कर गीत-संगीत की धारा में डूबते उतराते थे। इससे छत्तीसगढ़ के हर कलाकारों को गर्व होता है कि उनके नाचा के पिता मह दाऊ मंदराजी अपने बेजोड़ गीत-संगीत के माध्यम से रायगढ़ राज दरबार धमक बनाए हुए थे। आज ऐसे नाचा पितामह को उनकी पुण्य तिथि पर कृतज्ञता पूर्वक याद किया जा रहा है।

० मंदराजी दाऊ और दुर्घटनाएं

नाचा के कलाकारों को अपने नाचा कला के प्रदर्शन के लिए एक गांव से दूसरे गांव वाहनों के माध्यम से जाना पड़ता था। सन् 40-50 के दशक में नाचा कार्यक्रम के लिए नदी पार कर उक्त गांव जाना था। नदी को पार करने ड्रमो को बांध कर नाव बनाया गया था। नाव के बीच नदी में जाते ही रस्सी टूट गई सारे ड्रम बिखर गये फिर क्या था नाचा के सभी कलाकार नदी में डूब गये। हारमोनियम पेटी, तबला, ढोलक आदि सभी नदी के अंदर। लोगों ने तैरकर नाचा कलाकारों को नदी में डूबने से बचाया। सर्दी के समय थी मंदराजी दाऊ मदन, जयंती यादव, गन्नु यादव, फिदा बाई, माला बाई, फागुदास व अन्य कलाकारों को रात भर अंगेठा जला कर गर्मी प्रदान किया गया। उस रात नाचा नहीं हो सकी। सबेरे नदी से वाद्य यंत्रो को  निकलवा गया और उसे ठीक ठाक कर दूसरे दिन नाचा कार्यक्रम किया गया। दाऊजी अपने आखिरी समय में नवागोदा नाचा पार्टी में जाते थे। नाचा कलाकार नाचा करने के लिए एक गांव से दूसरे गाव टेम्पो से जाया करते थे। गुण्डरदेही से नाचा कार्यक्रम कर आते समय सीताराम नामक टेम्पो चालक जो थोड़ा लगड़ा था। गाड़ी फूल स्पीड में चला रहा था। गाड़ी के बोनट में लगा फूंदरा हवा में उड़कर जाली में फस गई उसे वह लगड़ा एक टांग तिरछा कर चलती गाड़ी में निकाल रहा था बैलेस बिगड़ते ही गाड़ी सड़क किनारे जा कर पलटी। मंदराजी दाऊ का इसमें कान कट गया व माथे पर जोरो की चोटे आई नींद में डूबे कलाकार इस घटना से सन्न रह गये। उन्हें भी चोटे आई। जामुल फैक्टरी में हम लोगों का कार्यक्रम था। दाऊजी को पता चलने पर वे वहां सायकल से ही धमक पड़े। रास्ते में लघुशंका के लिए बैठे थे। किसी तेज रफ्तार वाहन चालक ने उसे रौन्द दिया। खून बहते हालत में लंगड़ाते हुए नाचा स्थल पर पहुंचे व रात भर जख्मी टांग को आड़ा रख कर हारमोनियम बजाया। ऐसे जीवट कलाकर एवं नाचा विद्या के लिए समर्पित व्यक्तित्व अब खोजे नहीं मिलता। आज उनकी पूण्य तिथि पर उन्हें शत्-शत् नमन है।





आत्माराम कोशा ''अमात्य"
राजनांदगांव

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