क्रातिकारी गीतकार : लक्ष्मण मस्तुरिया ("3 नवंबर पुण्यतिथि विशेष")



"3 नवंबर पुण्यतिथि विशेष"


"जागो रे जागो बागी बलिदानी मन..
धधकव रे धधकव सुलगत आगी मन..."

अइसन गीत के एक-एक पंक्ति अउ एक-एक शब्द अन्तस्  ल झकझोर देथे। छत्तीसगढ़ी गीत मा क्रांति के अइसन आह्वान करने वाला क्रांतिकारी गीतकार केवल लक्ष्मण मतुरिया ही हो सकथे कइहूँ ता गलत नइ होही। छत्तीसगढ़िया मन के स्वाभिमान जगइया मस्तुरिया जी के कलम ले क्रांति के चिंगारी निकलय। अन्याय,अत्याचार, जमाखोरी, बेरोजगारी, पलायन अउ नपुंसक राजनीति उपर घलो उँमन निडर हो के कलम चलाइन ।

मस्तुरिया जी जब आह्वान करत कहिथे :-
   "धधकव रे धधकव रे सुलगत आगी मन"
तब अन्याय के खिलाफ़ खड़ा होने वाला मन के रुंआँ कइसे खड़ा नइ होही। बागी अउ बलिदानी मनखे म केवल पुरुष वर्ग बल्कि मातृ शक्ति ल घलो मस्तुरिया जी आह्वान करथे :-
"महाकाल भैरव लखनी
महामाया दुर्गा काली मन ...."

ओज ले भरे अइसन गीत ल सुनके काकर तन म बिजली के लहर नइ दउड़ही ? दमदार लेखनी के संग वजनदार प्रस्तुति म मस्तुरिया के कोनो मुकाबला नइ रहिस। जेन मनखे एक घव
मस्तुरिया जी ल सुन लय आजीवन वोला नइ भुलाय। छत्तीसगढ़ी के अमर गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया शोषित वर्ग के प्रतिनिधि कवि/गीतकार रहिन। शोषक मन के खिलाफ जब उमन मुखर होके लिखथे तब खून मा उबाल आना स्वाभाविक हे :-
"लंद फंद वाले मालामाल हे
सिधवा बर रोजे अकाल हे
अउ गोहार परत हे नाचे
छानही चढ़ चढ़ पापी मन..."

नपुंसक राजनीति के खिलाफ खुल के लिखे बर करेजा चाही,मस्तुरिया जी निडर होके लिखिन-
"भीख माँग म जिनगी के
अधिकार कोनो ल मिलय नही..
कुंडली मारे साँप सिंहासन
आगी आँच बिन हिलय नहीं...।"
अइसन बात ल लिखना अउ मंच म पढ़ना तलवार के धार म चलना हवय। फेर कबीर के रददा म रेंगइया मन ककरो परवाह कहाँ करथे ।

जमाखोरी तब भी रहिस अउ आज भी ये विकराल समस्या हे जेला जड़ ले उखाड़ना जरूरी हवय। जमाखोर मन के ख़िलाफ़ उँकर आक्रोश देखव-
"लहू ले माँहगी तेल गुड़
निर्दयी होगे बैपारी मन ..जागो रे.."

अपन फर्ज ले विमुख, देश, समाज के प्रति उदासीन अउ केवल अपन म मस्त मनखे मन ला जगावत/लताड़त मस्तुरिया जी कहिथें -
"मुर्दा जागव मरद बनव रे
छाती बाँख म गरब भव रे
देश धरम पुरखा पीढ़ी बर
मरव खपव जीवदानी मन" जागो रे..

मस्तुरिया जी कालजयी गीतकार रहिन। उँकर गीत के प्रासंगिकता तब ले जादा आज महसूस होथे।सम्मान के साथ जीना ही उँकर फितरत रहिस।  कृति "सोनाखान के आगी" के पंक्ति देखव :- 
"बिना सुराजी के जिनगानी
मुरदा हे तन मरे परान
बिना मान सभिमान के मनखे
गाय गरु अउ कुकुर समान"

सिधवा छत्तीसगढिया मन ला अपन स्वाभिमान के
रक्षा करे खातिर मस्तुरिया जी घेरी भेरी चेताथे :-
अरे नाग तैं काट नहीं त
जी भर के फुफकार तो रे
अरे बाघ तै मार नहीं त
गरज-गरज धुत्तकार तो रे

छत्तीसगढ़ के पावन माटी सब ला शरण दिस। अलग अलग राज के मनखे आके इँहे के हो के रहिगे। फेर कुछ लोगन छत्तीसगढ़िया मन के अस्मिता अउ स्वाभिमान सँग आज घलो खेलत हवय,उँनला मस्तुरिया जी खुला चुनौती देथे :-
"एक न एक दिन ए माटी के
पीरा रार मचाही रे ..
नरी कटाही बइरी मन के
नवा सुरुज फेर आही रे।"

येहू कटु सत्य आय कि मस्तुरिया जी आजीवन अपन स्वाभिमान के साथ कभू समझौता नइ करिन। छत्तीसगढ़,छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िया के पीरा ला जीवन पर्यन्त लिखिन। मनखे के सीना ल धधका दय अइसन अमर गीतकार सदियों मा एकाद होथे। उँकर पुण्यतिथि मा मस्तूरिहा जी ला शत शत नमन ।

अजय अमृतांशु
भाटापारा (छत्तीसगढ़)

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