संपादकीय - बेरा आगे मेला मड़ई के



संगी हो...ऐसो के बेरा हा कब कइसन काय हो जाही तेला कोनो बता नी सकय, अइसन उदीम अउ बेवसथा ल हमन देखत आवत हन। कोनो ह असिन बेरा कोरोना काल के देखे ल झन मिलय इही सोचत हावे। बीते कुछ दिन पहिली हमन देवारी अउ मातर तिहार मनाय हन। कतको गांव म देवारी अउ मातर तिहार नी मनाय हे। वइसने जेठौनी ल घलो बने ढंग ले कतको गांव म नी मनाय गे हवय। ऐसो के तिहार ह तिहार बरोबर नी लगे हे। आधा डर आधा बल इही ऐसो र होवत आवत हे। कोरोना के पीक ह अउ बाढ़त हे, त अइसन म मेला मड़ई के परभाव कइसन होही हमर उपर तेन हा सोचे के बात आय।

बस्तर अंचल अउ मैदानी इलाका म मड़ई के स्वरूप म थोरिक बदलाव देखे ल मिलथे। धान कटई के बाद किसान मन के इही मनोरंजन के बड़का साधन आय। लोगन मन के अपन अउ दूसर गांव के मड़ई जाय के पाछु बहुत अकन कारन रहिथे। उत्साह, उमंग, हर्षोउल्लास सबो समाहित रहिथे हमर मेला मड़ई म। मन ला ताजगी ले र देथे मेला मड़ई हा। येकरे सेती गांव के मनखे ल मेला मड़ई के अगोरा रहिथे। लइका सियान सबो के उमंग मेला मड़ई म समाहित होथे।

बर बिहाव खातिर बहू-दमाद खोजे अउ देखे के घलो ये अच्छा बेरा होथे। लोगन ल अलग से ऐ बेरा बर समय देके जरूवत नी परे। अइसन अउ छोटे छोटे महत्व मेला-मड़ई म देखे ल मिल जथे। आजो गांव-गंवई म मड़ई मेला के बड़ महत्व हे। कतको झन के रोजगार मेला मड़ई ले जुरे रहिथे। त मेला मड़ई हमर अंचल के एक बड़े व्यावसायिक अवस्था के मापदंड आय। बहिनी माई मन घलो इही बखत ल मेल मिलाप खातिर बने मानथें। त देखे जाय त मेला मड़ई ले फायदा ही होथे, नुकसान के कोनो बात नी रहाय।

मेला मड़ई म जाय के पहिली अपन सुरक्षा खातिर ए बखत धियान जरूरी हावे। बेरा ल देखत कम से कम बाहिर निकले के परयास करन। मेला मड़ई ल तो आज नहीं ते काली मान सकथन। ऐकर खातिर हमर जान माल के रक्षा करना जादा जरूरी हे। अपन संग तीर तखार मन के मनखे मन ला घलो सोरियान कि ऐहतियात बरतयं। अपन संग परिवार खातिर सोचयं। जतका होवय सावधानी रखे के परयास करे म ही सबके लई हे...हम मुखिया सुरक्षित रहिबो त परिवार सुरक्षित रहही। त अइसन खातिर कुछ तियाग करे ल पर जाय त हमन ल पाछु नी हटना हे अपन करतब के निर्वहन बने ढंग ले करना हे...जय जोहार...।  


संपादक

गोविन्द साहू (साव)

लोक कला दर्पण 

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