साहित्य अउ संस्कृति के सुघ्घर मेल दिखथे हमर अंचल मा



छत्तीसगढ़ी साहित्य मा चउमास के गजब वरनन मिलथे। आषाढ़, सावन, भादो, कुवाँर ये चार महीना चउमासा कहाथे। छत्तीसगढ़ के धरती आदिकाल ले साहित्य मा अगुवा रहे हे फेर मौन साधक प्रकृति के सेती इहां के आभा मंडल ले दुनिया ओतेक परिचित नइ होय पाय हे। आदि कवि बाल्मीकि तुरतुरिया मा बइठ के इहें रामायण रचिस। सरगुजिहा महाकवि कालिदास के मेघदूत मा बादर हा मया पीरा के संदेश वाहक दे बन के पिरीत के बरसा करे हे। इन दूनों कवि के साहित्य मा चउमास के विपुल वर्णन हे  इंकर साहित्य संस्कृत मा हे, फेर प्रेरित साहित्य छत्तीसगढ़ी मा बहुत मिलही। पं. सुंदर लाल शर्मा ले लक्ष्मण मस्तुरिया तक अउ वर्तमान कवि साहित्यकार मन घलो खूब लिखे हें। आसाढ़ ले कुवाँर तक तीज तिहार के साथ इहां के संस्कृति के निराला झलक देखे मा आथे। रजुतिया, जुड़वास, गुरू पूर्णिमा, हरेली, नाग पंचमी, भोजली, राखी, बहुरा चौथ, कमरछठ, आठे कन्हैया, पोरा, तीजा, गणेश चतुर्थी, पितर पाख, नवरात्रि, जंवारा, दसहरा, शरद पुन्नी - ये जम्मो चउमासा के परब आय। साथी हो छत्तीसगढ़ी साहित्य मा चउमासा के गोठ बात के दिन हरे आज। महाकवि कालिदास ह मेघ ल संदेश वाहक बनाए रिहिस अउ छत्तीसगढ़ के नारी मन सुवा ला संदेश वाहक बनाय हे। विरही मन का काहत हे-




तरी नरी नना ना री नहा नारी ना ना

रे सुवना कहां हवय धनी रे तुम्हार...?

लागिस असाढ़ बोलन लागिस मेचका

रे सुवना कोन मोला लेवय उबार...

सावन रिमझिम बरसय पानी

रे सुवना कोन सउत रखिस बिलमाय...

भादो कमरछट तीजा अउ पोरा

रे सुवना कइसे के देइस बिसार...

कुआंर कलपना ला कोन मोर देखय

रे सुवना पानी पियय पीतर दुआर....

रे सुवना कहां हवय धनी रे तुम्हार...?

रवि शंकर शुक्ल जी के ये अमर गीत मा अभिव्यक्ति देखौ-

झिमिर झिमिर बरसे पानी।

देखो रे संगी देखो रे साथी।

चुचुवावत हे ओरवाती।।

मोती झरे खपरा छानी।

ये गीत के एक अंतरा के बानगी देखौ-

किचिर काचर चिखला मातिस ।

धरती के भाग जागिस।।

नदिया नरवा डबडबा गे।

भुइयाँ के लुगरा हरियागे।।

मगन होगे सबो परानी।

झिमिर झिमिर बरसे पानी।

कवयित्री डॉ निरूपमा शर्मा जी आय असाड़ ल देख संसो करथें-

घर के छानी ह अबले छवाये नइये।

आँसो बेटी के भांवर देवाये नइये।

मोर पिलवा के पेट ह अघाय नइये।

कइसे मानंव रे आगे असाढ़।

मन के दुख होगे दुगुन अउ गाढ़।

लक्ष्मण मस्तुरिया जी के ऐ मेर बारहमासी गीत म प्रकृति के वर्णन अइसे देखे बर मिलथे-

चिटिक अंजोरी निरमल छइहाँ

गली गली बगराबो रे

पुन्नी के चंदा मोर गांव मा




अपन काव्य संग्रह रउनिया जड़काला के, मा कवि चोवाराम वर्मा बादल सावन के गीत मा का कहे हे सुनौ -

धरती दाई करै अपन

सोला सिंगार,

नदिया नरवा खुलखुल हांसय,

बईहा मा बईंहा डार।

बादर रिमझिम बरसै,

जोगनी जुगजुग चमकै।

मेचका गावैं बने सुरताल म,

अबड़ दुख ल भोगे हन दुकाल म।

'ममहावत गीत' मा गीतकार के के पाटिल के ये गीत घलो असाढ़ के अगवानी करत मधुर स्वर लहरी पैदा करथे-

खोंचका डबरा डबडबाही,

डबरी तरिया लबलबाही,

सुनता के गीत गाही,

मंजा आही ऐसो के असाढ़ मा।

सावन उत्सव परब भोजली छत्तीसगढ़ मा आदिकाल ले मनावत आवत हे । पारंपरिक भोजली गीत ला आप सबो जानत हव -

देवी गंगा, देवी गंगा,

लहर तुरंगा हो लहर तुरंगा... ।

हमर भोजली दाई के भींजे आठो अंगा... ।

हरेली तिहार बड़ सुग्घर तिहार हरे फेर बइगा गुनिया मन डरावना बना डरथे -

अंधियारी रात हे अमावस हे।

झिमिर झिमिर बरसत हे पावस हे।।

जुगुर जुगुर जोगनी बरै झाड़ मा।

झूपत हावै पेड़ हा पहाड़ मा।।

हीरु बिच्छु खोजन लगै अहार।

आगे ग संगी हरेली तिहार।

हरियर दिखै हमरो खेतखार।

आगे.... ।





कुवाँर नवरात्रि ह शक्ति अउ साधना के परब आय। लोक साहित्य मा माता सेवा अउ जसगीत के सैकड़ों रचना पारंपरिक रूप मा मिलही अउ अभी के रचनाकार मन के घलो जसगीत प्रसिद्ध होय हें। एक जस गीत -

तुम खेलव दुलरवा रन बन रन बन हो

का तोर लेवय रइंय बरमदेव, का तोर ले गोरइया

का लेवय तोर बन के रक्सा, रन बन रन बन हो...

नरियर लेवय रइंया बरमदेव, बोकरा ले गोरइया

कुकरा लेवय बन के रक्सा, रन बन रन बन हो...

किसान के कर्मयुद्ध के दिन होथे। असाढ़ ले ले के कुवाँर सरद पूर्णिमा तक बीजारोपण ले फसल के पोटरियाय तक किसान के अथक परिश्रम के कोनों सानी नइ हे। फेर आथे फसल ला लुवे के दिन। अन्न के भंडार रे के दिन। तभे तो कवि प्यारे लाल गुप्त छत्तीसगढ़ के बेटा-बेटी मन ला आसीस देवत सुग्घर लिखे हे-

रास रचाही चंदा रानी

करपा उपर रात गा

संग चंदैनी सखी सहेली

रस बरसाही रात गा।

सोनहा घुंघरू पायजेब के

छटक बगरही खेत मा

सीला बिनही लइका लइकी

होत बिहनिया खेत मा।

                                                                                                                         लेखक

                                                                   बलराम चंद्राकर

           भिलाई

           मो.-75870-41253                     

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