छत्तीसगढ़ी भाषा म साहित्य के उपलब्धता



उचित साहित्य लेखन म ही सार्थकता

लेखन म कुछ न कुछ भाव दिखय


छत्तीसगढ़ी साहित्य के उपलब्धता अगर देखे जाय तव ना पहिली रहिस ना अभी हे...काबर के कहुँ शहर भर मा एकाक ठन दुकान मा चार किसम के पुस्तक मिल जथे तव वोला सहीं मायने मा उपलब्धता नई कहे जाय...हाँ कहूँ ऐही हा चार दुकान मा मिल जाय तव कहे जा सकत हे...! अब सवाल उठथे के आखिर छत्तीसगढ़ी साहित्य बजार मा उपलब्ध काबर नई ये... तव सबले बड़े बात आथे के बिक्रेता कोनो भी किताब ला तभे राखही जब वोहा कमाई दिही...मतलब बेंचाही...! अब बात आथे के छत्तीसगढ़ी किताब बेंचावय काबर नही? तव मैं सबले पहिली कहिहूँ के छत्तीसगढ़ी के बहुत अकन पुस्तक बिना मुड़ गोड़ के लिखाय हे...जेखर सेती समान्य पाठक के पल्ले नई परय...अऊ फेर अईसनेच हमर छत्तीसगढ़ी भासा के पढईया कम हें...चाहे किस्सा कहानी के बात होय चाहे गीत कविता के...सब मा छत्तीसगढ़ी के मजाक बना देहे गय हे।

समझ म फेर दिखथे

ठीक ओईसनहे जईसे मोला एक गीत के सुरता आवत हे बड़ सुग्घर गीत हे-

सुग्घर दिखत हावय रमकेरिया चानी

राखे हावँव बईहा ऐमा

छींच छींच के पानी 

ऐ गीत बहुत सुने गय हे पर ऐ गीत संदेश का देवत हे...?  ऐ बजार मा रमकेरिया बेचे के बात तो हे लेकिन का रमकेरिया चान पउल के कोहँड़ा कटहर असन बेंचे जाथे? या फेर भाजी भाँटा असन पानी छींच छींच के बेंचे जाथे...? एक गीत-पहिराहूँ तोला ओ नवलखिया के हार जबके ऐला होना रहिस, पहिराहूँ तोला ओ मैं नवलखिया हार  या फेर नवलख्खा हार काबर के, नवलखिया शब्द अपन आप मा पूर्ण हे फेर के ल जबरन बईठारे के जरुरत काबर आईस...ऐ सोचे के बात हे...। अब काय सोच के अईसन लिखे अऊ गाय गय हे ... ऐ तो ओही मन जानँय, लेकिन पहिली गीत मा तो एकदमेच उल्टा बताय गय हे। अगर सही गीत रचना रहे हे तव वो सिरिप अऊ सिरिप सूरसिंगार मा बाजे गीत ही रहे हे, ओखर बाद जैन भी गीत सुने हन ओमा के हर तीसरा चौथा गीत मा कमीच ही देखाऊ देहे हे..। राजभाषा आयोग ले छपे कतको किताब देखे जाय तव अपन भीतर कतको कमी ल चटकाय दिखथे। फेर प्राईवेट परकासन के तो बाते अलग हे...आखिर अईसन हड़बड़ी काबर...? का छत्तीसगढ़ी भासा के अपमान हमर अधिकार होगे हे? जईसन बनय तईसन लिखी अऊ वोला परकासित करी...? साधे साध मा लिखईया मन उल्टा सीधा रचना परकाशित करके महौल ला कँचरा बना डारें हें जेखर सेती घलाव किताब बेंचाय नही..।

उचित साहित्य के अभाव दिखथे

अब बात आथे के का करे जाय ...तव सबले पहिली मोला अईसे लगथे के  गलत रचना मा बिरेक लगय ...ऐखर बर छेंका बेंड़ा के तियारी करे जाय ...गीत कविता कहानी सनीमा नाटक सब मा काबर के आज जऊन सिरिप पईसा के लालच मा हमर मयारुक छत्तीसगढ़ी के नाका कान छोलावत हे इन तमाम माध्यम ले...वोला रोक के मलहम लगाय जाय ताके साहित्य अपन सहीं सुघराई मा पाठक श्रोता अऊ दर्शक तक सहीं ढंग ले पहुँचय...। दूसर मा शासन कोती ले पुस्तक प्रकाशन के जघा मा या फेर ओखर सँगे सँग पुस्तक ला बेंचवाय के परयास करे जाय..काबर के प्रकाशन मुस्कुल बूता नोहँय मुस्कुल बूता तो वोला बेंचना हर आय...। तीसर मा जेन सबले जादा जरुरी बूता हे ....पहिली कक्षा ले ही छत्तीसगढ़ी मा पाठ्यक्रम ला लागू करे जाय...ताके अपन भासा बर लईकन के मयाँ पहिलीच ले उबजय..। ऐ सब के बिना छत्तीसगढ़ी साहित्य के थिरबाँव नई दिखत हे...।


लेखक
राधेश्याम पटेल
तोरवा - बिलासपुर 

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